ब्लॉग: शिक्षा में सुधार से ही बढ़ेंगे रोजगार के अवसर

By भरत झुनझुनवाला | Published: December 21, 2021 10:21 AM2021-12-21T10:21:56+5:302021-12-21T10:25:31+5:30

दि मान भी लें कि 2018 में 70 लाख नए रोजगार बने तो भी बेरोजगारी की समस्या का निदान नहीं होता है क्योंकि अपने देश में हर वर्ष 120 लाख नए युवा श्रम बाजार में प्रवेश कर रहे हैं. इनमें से यदि 70 लाख को रोजगार मिल भी गए तो भी 50 लाख युवा बेरोजगार ही रह जाएंगे.

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Highlightsप्रॉविडेंट फंड की सदस्यता में वृद्धि और रोजगार में वृद्धि दो अलग-अलग बातें हैं.2012 एवं 2018 के बीच अपने देश में शहरी बेरोजगारी में तीन गुना वृद्धि हुई है.2012 से 2018 के बीच वेतन में भी गिरावट आई है.

केंद्र सरकार का कहना है 2018 में प्रॉविडेंट फंड की सदस्यता लेने वाले श्रमिकों में 70 लाख की वृद्धि हुई है. लेकिन प्रॉविडेंट फंड की सदस्यता में वृद्धि और रोजगार में वृद्धि दो अलग-अलग बातें हैं. 

2018 का समय नोटबंदी और जीएसटी का था. इन नीतियों के कारण छोटे उद्योग कम हुए थे और बड़े उद्योग बढ़े थे. छोटे उद्योग ही ज्यादा रोजगार बनाते थे. इसलिए यदि छोटे उद्योगों में 100 कर्मी बेरोजगार हुए तो हम मान सकते हैं कि बड़े उद्योगों में 50 रोजगार बने होंगे. कुल रोजगार में 50 की गिरावट आई. 

लेकिन जिन 50 को रोजगार मिला वे प्रॉविडेंट फंड के सदस्य बने चूंकि वे बड़े उद्योगों में कार्यरत थे इसलिए प्रॉविडेंट फंड की सदस्यता में 50 सदस्यों की वृद्धि हुई जबकि साथ-साथ कुल रोजगार में 50 श्रमिकों की गिरावट आई. 

इसीलिए केंद्र सरकार द्वारा किए गए सामयिक श्रम सर्वे में कहा गया कि 2012 एवं 2018 के बीच अपने देश में शहरी बेरोजगारी में तीन गुना वृद्धि हुई है. 

ज्यादा गंभीर विषय यह है कि यदि मान भी लें कि 2018 में 70 लाख नए रोजगार बने तो भी बेरोजगारी की समस्या का निदान नहीं होता है क्योंकि अपने देश में हर वर्ष 120 लाख नए युवा श्रम बाजार में प्रवेश कर रहे हैं. इनमें से यदि 70 लाख को रोजगार मिल भी गए तो भी 50 लाख युवा बेरोजगार ही रह जाएंगे.

समस्या के गंभीर होने के दूसरे संकेत उपलब्ध हैं. केंद्र सरकार द्वारा जारी उपरोक्त सामयिक श्रम सर्वे के अनुसार 2012 से 2018 के बीच शहरी बेरोजगारी की दर में 3 गुना वृद्धि हुई है. 

इसी सर्वे के अनुसार 2018 में अपने देश में 15 से 24 वर्ष के लोगों में 28.5 प्रतिशत बेरोजगार थे जो कि विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अधिकतम था. इसी सर्वे के अनुसार 2012 से 2018 के बीच वेतन में भी गिरावट आई है. 

जैसे मान लीजिए आपका 2012 में वेतन 100 रुपए प्रतिदिन था. वृद्धि हुई और 2018 में आपका वेतन 110 रुपए प्रतिदिन हो गया. वेतन में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई. लेकिन मान लीजिए इसी अवधि में जो टॉफी 2012 में एक रुपए में मिलती थी वह 2018 में 1.50 रुपए में मिलने लगी. ऐसा हुआ तो आपके वास्तविक वेतन में कटौती हुई.

2012 में आप एक दिन के वेतन में 100 टॉफी खरीद सकते थे. 2018 में एक दिन के वेतन में आपको केवल 55 टॉफी मिलेंगी चूंकि वेतन में वृद्धि कम और टॉफी के दाम में वृद्धि ज्यादा हुई है. 

इसलिए केंद्र सरकार द्वारा किए गए सर्वे में कहा गया कि 2012 से 2018 के बीच वास्तविक वेतन में 1.7 प्रतिशत की गिरावट आई है. अत: बेरोजगारी की समस्या को झुठलाने से काम नहीं चलेगा. इसके मूल कारणों का निवारण करना होगा.

बेरोजगारी की समस्या का प्रमुख कारण तकनीकी बदलाव है. जैसे पूर्व में बैंक में खाते क्लर्कों द्वारा रखे जाते थे. अब यह कार्य कम्प्यूटर से होने लगा है. बैंक की कई शाखाओं में केवल दो या तीन कर्मी काम करते हैं. 

कम्प्यूटर ने श्रमिकों की जरूरत को कम कर दिया है. लेकिन साथ-साथ बैंकों का प्रसार बढ़ा है और शाखाओं की संख्या बढ़ी है. इनमें नए रोजगार उत्पन्न हुए हैं. 
इतिहास पर गौर करें तो किसी समय यातायात का प्रमुख साधन घोड़ा गाड़ी हुआ करती थी. इसके बाद कार का आविष्कार हुआ जिसके कारण घोड़ा गाड़ी चलाने वाले बेरोजगार हो गए. 

लेकिन कार के चलन का विस्तार हुआ, इनके उत्पादन और मरम्मत में नए रोजगार बने. इनके लिए सड़क और फ्लाईओवर बनाने में भी रोजगार बने. इसलिए घोड़ा गाड़ी में रोजगार में गिरावट के बावजूद यातायात क्षेत्र में कुल रोजगार बढ़े. 

वर्तमान समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का खतरा हमारे सामने है. लेकिन जिस प्रकार घोड़ा गाड़ी के समाप्त होने के बावजूद कार के चलन से कुल रोजगार में वृद्धि हुई; उसी प्रकार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तमाम नए उत्पाद बन सकते हैं जैसे आपके मनपसंद प्लॉट का सिनेमा बनाना अथवा वीडियो मिक्स करना इत्यादि. अत: हमें अपने युवाओं को रोजगारों की इन नई संभावनाओं को पकड़ने को प्रशिक्षित करना होगा.

यहां प्रमुख समस्या हमारी शिक्षा व्यवस्था की है. वर्तमान में युवाओं का रुझान सरकारी नौकरियों की तरफ बना हुआ है, बावजूद इसके कि सरकारी नौकरियों की संख्या में कमी आई है. 

लेकिन सामान्य शिक्षा वाले प्राइमरी सरकारी स्कूल के टीचर को आज 50 से 70 हजार रुपए प्रति माह मिलता है जबकि एक ट्रेंड नर्स अथवा डाटा एंट्री ऑपरेटर को बमुश्किल 15 हजार रुपए प्रति माह मिलता है. 

इसलिए युवाओं को नर्स अथवा डाटा एंट्री ऑपरेटर की क्षमता हासिल करने में रुचि नहीं है. उनका पूरा ध्यान सरकारी नौकरी हासिल करने की तरफ मात्र रहता है. 

वास्तविक शिक्षा ग्रहण करने में उनकी रुचि नहीं है. सरकार को चाहिए कि सरकारी कर्मियों और साधारण नागरिकों जैसे नर्स के वेतन के बीच संतुलन स्थापित करे जिससे सरकारी नौकरी का मोह कम हो और युवा सच्ची पढ़ाई पर ध्यान दें.

Web Title: education reform employment opportunity

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