काम के बोझ से अभिजात वर्ग की नींद उड़ी!, हर दिन 20 घंटे तक काम?

By हरीश गुप्ता | Updated: March 25, 2026 05:24 IST2026-03-25T05:24:10+5:302026-03-25T05:24:10+5:30

भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के पारंपरिक रूप से अलग-थलग रहने वाले अभिजात वर्ग ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी घटनाओं के दौरान थोड़े समय के दबाव को छोड़कर, सीमित व्यवधान के साथ काम करना जारी रखा.

delhi pm narendra modi pmo Workload makes elite lose sleep Working up to 20 hours a day blog harish gupta | काम के बोझ से अभिजात वर्ग की नींद उड़ी!, हर दिन 20 घंटे तक काम?

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Highlightsविदेश मंत्रालय को एक सख्त और तीव्र गति वाले वातावरण में धकेल दिया है. प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) है, जो अत्यधिक सक्रियता से काम कर रहा है और तत्काल प्रतिक्रिया की मांग कर रहा है.राजनयिक माध्यमों से घंटों - या कभी-कभी पूरा दिन - लग जाता था, अब मिनटों में पूरी हो गई.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद से ही भारत की नौकरशाही अपने कम्फर्ट जोन से बाहर हो गई है. प्रधानमंत्री की अथक कार्यशैली-जो अक्सर दिन में लगभग 20 घंटे तक काम करते हैं-ने सभी मंत्रालयों में अपेक्षाओं को धीरे-धीरे बदल दिया है. हालांकि अधिकांश विभागों ने इस बदलाव को जल्दी ही महसूस कर लिया, लेकिन भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के पारंपरिक रूप से अलग-थलग रहने वाले अभिजात वर्ग ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी घटनाओं के दौरान थोड़े समय के दबाव को छोड़कर, सीमित व्यवधान के साथ काम करना जारी रखा.

वह सुरक्षा कवच अब टूट चुका है. एक जटिल वैश्विक संकट - जिसमें भारत भागीदार नहीं है, फिर भी बच नहीं सकता - ने विदेश मंत्रालय को एक सख्त और तीव्र गति वाले वातावरण में धकेल दिया है. केंद्र में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) है, जो अत्यधिक सक्रियता से काम कर रहा है और तत्काल प्रतिक्रिया की मांग कर रहा है.

प्रोटोकॉल और प्रक्रियाओं में डूबी इस सेवा के लिए यह बदलाव बहुत बड़ा रहा है. हाल ही का एक उदाहरण लीजिए : विदेशों में तनाव बढ़ने पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक प्रमुख वैश्विक नेता से तत्काल बातचीत करने की कोशिश की. जिस बातचीत में पहले राजनयिक माध्यमों से घंटों - या कभी-कभी पूरा दिन - लग जाता था, अब मिनटों में पूरी हो गई.

वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल (आईएफएस) अधिकारी आधी रात के बाद तक फोन पर लगे रहे, अलग-अलग टाइम जोन में फोन पर संपर्क साधने के लिए भागदौड़ करते रहे. सुनियोजित कूटनीति की पुरानी लय अब परिणाम-उन्मुख और समयबद्ध दृष्टिकोण में तब्दील हो रही है.

अलग-अलग टाइम जोन में होने वाली बातचीत के चलते अधिकारी 18-20 घंटे प्रतिदिन काम कर रहे हैं, जो शीर्ष स्तर पर निर्धारित गति के अनुरूप है. थोड़ी सी देरी होने पर भी प्रधानमंत्री कार्यालय से सीधे फोन आते हैं और स्पष्टीकरण मांगा जाता है. यही अब न्यू नाॅर्मल है. विदेश मंत्रालय के लिए यह चौबीसों घंटे चलने वाली कार्यसंस्कृति अभूतपूर्व है.

यह औपचारिक कूटनीति से हटकर मिशन-आधारित क्रियान्वयन की ओर एक बदलाव का संकेत है, जहां औपचारिकता से अधिक परिणाम महत्वपूर्ण हैं. भारत के उच्चवर्गीय राजनयिकों के लिए, जो लंबे समय से संयमित गति और पदानुक्रम के आदी हैं, संदेश स्पष्ट है: या तो बदलाव अपनाएं या पीछे छूट जाएं. ऐसा लगता है कि अभिजात वर्ग को अब नींद नहीं आ रही है.

राहुल की सुनियोजित राजनीति, अप्रत्याशित नुकसान

लोग अक्सर पूछते हैं कि राहुल गांधी के भाषण कौन लिखता है. इसका आम जवाब है: हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड के कुलीन सहायक. लेकिन भाषण लिखने वाले तो हर जगह होते हैं - प्रधानमंत्री से लेकर नीचे तक. असली सवाल जजमेंट का है, न कि ड्राॅफ्टिंग का. राहुल गांधी को व्यापक रूप से निडर, ईमानदार और सरकार के सामने अडिग माना जाता है.

ठीक है. लेकिन चुनाव केवल नैतिकता के आधार पर नहीं जीते जाते. अगर ऐसा होता, तो कम्युनिस्ट पार्टियां - जो उतनी ही मुखर और जुझारू हैं - हर जगह हावी होतीं. जीत के लिए राजनीतिक सूझबूझ और निरंतर परिश्रम की आवश्यकता होती है, जिसमें राहुल गांधी अभी भी कमजोर नजर आते हैं. लखनऊ में कांशीराम की जयंती के अवसर पर दिए गए उनके हालिया बयान से समस्या और भी स्पष्ट हो जाती है.

उन्होंने कहा कि अगर जवाहरलाल नेहरू जीवित होते तो कांशीराम मुख्यमंत्री बन जाते. यह बयान लापरवाही भरा और अपमानजनक प्रतीत होता है. कांशीराम को कांग्रेस के संरक्षण की आवश्यकता नहीं थी - उन्होंने अपना आंदोलन स्वयं खड़ा किया और विशुद्ध राजनीतिक दांव-पेंच के बल पर मायावती को कई बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया. यह बयान एक पुरानी रणनीति को भी उजागर करता है:

नेहरू युग के दलित, मुस्लिम और ब्राह्मणों के कांग्रेस गठबंधन को पुनर्जीवित करना. यह समीकरण अब कारगर नहीं है. वास्तव में, यह सवाल खड़ा करता है कि कांग्रेस ने वास्तव में कितने दलित मुख्यमंत्री बनाए? इसका जवाब असहज करने वाला है. व्यापक शासनकाल के बावजूद, कांग्रेस ने मुट्ठी भर दलित मुख्यमंत्री ही बनाए. सबसे हालिया उदाहरण पंजाब के चरणजीत सिंह चन्नी हैं. यहां तक कि भाजपा ने भी अभी तक किसी दलित मुख्यमंत्री को नियुक्त नहीं किया है. नेहरू ने 17 वर्षों तक शासन किया और केवल एक दलित मुख्यमंत्री बनाया.

इस रिकॉर्ड को देखते हुए, कांशीराम को मुख्यमंत्री बनाने के लिए उनका हवाला देना खोखला लगता है. राहुल गांधी के लिए सबक सीधा है: बयानबाजी कम, अनुशासन ज्यादा. अस्पष्ट बयानबाजी न केवल लक्ष्य से भटकाती है, बल्कि विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाती है. सूत्रों के अनुसार, मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक बार राहुल गांधी से इस विषय पर बात करने का सोचा था, लेकिन वे हिम्मत नहीं जुटा पाए.

‘टपोरी’ : राजनीति का नया बम्बइया रूप

कंगना रनौत द्वारा राहुल गांधी को ‘टपोरी’ कहने के बाद भारतीय राजनीति में मुंबई की बोलचाल की भाषा का हल्का सा प्रभाव देखने को मिला. यह शब्द संसद की चर्चाओं के बजाय बॉलीवुड की नोकझोंक में ज्यादा इस्तेमाल होता है. इस टिप्पणी पर लोगों ने हैरानी जताई, खासकर इसलिए क्योंकि ‘टपोरी’ शब्द आम राजनीतिक शब्दावली में नहीं पाया जाता.

जो लोग इस शब्द से परिचित नहीं हैं, उनके लिए इसका मोटा-मोटा अर्थ है एक चतुर और आवारा व्यक्ति-जो थोड़ा बदमाश, थोड़ा आकर्षक और कभी-कभी किसी फिल्मी हीरो जैसा दिखता है. कुछ-कुछ रंगीला जैसा. जैसा कि अपेक्षित था, प्रतिक्रिया तुरंत ही तीव्र हो गई. कांग्रेस ने इसे नजरअंदाज कर दिया.

लेकिन प्रियंका चतुर्वेदी ने तीखे शब्दों में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इस टिप्पणी को ‘गलत’ बताया और आलोचकों को गांधी परिवार के महिला मुद्दों पर सार्वजनिक रुख की याद दिलाते हुए कहा कि महिला नेताओं के लिए प्रसिद्ध वंश के किसी व्यक्ति को महिलाओं के मुद्दे पर निशाना बनाना कितना विडंबनापूर्ण है. लेकिन असली जिज्ञासा भाषा से जुड़ी है.

मराठी गली संस्कृति से उपजा शब्द ‘टपोरी’ कभी मुंबई की गलियों में घूमने वाले रंगीन मिजाज और शरारती नौजवानों को दर्शाता था. समय के साथ, बॉलीवुड ने इस शब्द को और भी आकर्षक बना दिया, मानो इसे एक तरह से महत्वाकांक्षी और विद्रोही अंदाज का प्रतीक बना दिया हो. शायद यही भ्रम की स्थिति का कारण है. क्या यह अपमान है, व्यंग्य है, या अनजाने में मिली तारीफ? आज की राजनीति में तो गली-मोहल्ले की बोलचाल की भाषा भी कुछ समय के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर लेती है.

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