भारत भवन के मार्फत चार्ल्स कोरिया और शहर बसाने की दृष्टि
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 28, 2026 07:06 IST2026-04-28T07:05:10+5:302026-04-28T07:06:39+5:30
खास तौर पर तब, जब हमारे देहातों का सौंदर्य परिदृश्य अनूठा और प्रकृति सरोकारी है, तो शहरों को क्यों बेदम-बेजान-कुरूप बनाया जाए.

भारत भवन के मार्फत चार्ल्स कोरिया और शहर बसाने की दृष्टि
सुनील सोनी
आधुनिक भारत के बहुविध कला समुच्चय ‘भारत भवन’ की परिकल्पना जब की गई, तो जरूरी था कि उसका स्थापत्य भारतीयता का प्रतिनिधित्व करे. यूरोपीय आधुनिकतावाद से बिल्कुल अलग, देसी-देहाती समझ, संस्कृति और अंदाज के साथ. महान वास्तुविद ले कार्बुसिए ने जब चंडीगढ़ यूरोपीय अंदाज में बनाया, तो वह भारत का प्रतीक नहीं था. सूरज की रोशनी के देश के विपरीत वह यूरोप की सर्दियों से बचानेवाली सुंदर, किंतु असहज इमारतों से पट गया.
बहुश्रुत कहावत, ‘तालों में भोपाल ताल, बाकी सब तलैया...’ के तट से सटा ‘भारत भवन’ पहाड़ी पर उभरा नहीं है, धंसा हुआ-सा है.
उसमें विशाल आंगन और छतें हैं, जो सीढ़ियों से जुड़े हैं. यही सीढ़ियां कला-साहित्य के तिलिस्म के सभी आयामों में उतारती-उतराती हैं. बाली और मैक्सिको के सूर्य मंदिरों, आगरा के लाल किले के आंगनों और सीढ़ियों, फतेहपुर सीकरी की बनावट, राजस्थानी महलों की छतरियों, नर्मदा या गंगा समेत नदियों के घाटों का मिलाजुला अहसास भारत भवन को बनाता है. यूं कि चहुंओर प्रकाश के आदिम स्रोत सूरज की प्रार्थना है, जो धरती से मिला हुआ है.
1977 में बना यह विचार कलाकारों, योजनाकारों, प्रशासकों के मंथन को चार्ल्स कोरिया की ओर ही ले गया, जो स्थापत्य से समाज के संबंध को तौलते रहे थे. प्रयोगधर्मी कवि अशोक वाजपेयी की दृष्टि से चार्ल्स कोरिया के मन से 1982 में ‘भारत भवन’ सधा, तो सांस्कृतिक प्रयोग बना. रूपंकर, रंगमंडल, वागर्थ और अनहद यानी दृश्य कला, नाटक, साहित्य एवं संगीत, सब साथ थे. पहाड़ की ऊंचाई के बावजूद ‘भारत भवन’ का जमीन में समाना उसे प्रकृति से एकाकार-सा करता है. चार्ल्स कोरिया इसे महज निर्माण के बजाय समाज-संस्कृति-राजनीति का संवाद कहते थे.
20वीं सदी की दूसरी चौथाई में जब यूरोप का आधुनिक स्थापत्य आंदोलन कांक्रीट, स्टील व कांच से इमारतों में नए प्रयोग कर रहा था, तो भारत में भी यह चलन जोर पकड़ने लगा. अमेरिका में पढ़ते हुए कोरिया ने इसे नजर भर देखा और सवाल उठाया कि क्या भारत की जलवायु, समाज और संस्कृति को नजरअंदाज करके स्थापत्य संभव है. खास तौर पर तब, जब हमारे देहातों का सौंदर्य परिदृश्य अनूठा और प्रकृति सरोकारी है, तो शहरों को क्यों बेदम-बेजान-कुरूप बनाया जाए.
साबरमती आश्रम के गांधी संग्रहालय के बहुलघु खंड, आंगन-बरामदे, आसपास की सामग्री महात्मा गांधी का दर्शन व्यक्त करती हैं. भव्यता के बजाय स्थापत्य से शांति-अहिंसा का दर्शन जताना अनूठा है. अध्यात्म यानी अपने भीतर झांकने सरीखा. कोरिया शहरों के बारे में भी देहाती की तरह सोचते हैं. उनके मन में विशाल, गगनचुंबी इमारतें नहीं ठहरतीं. राष्ट्रीय शहरीकरण आयोग के अध्यक्ष बने, तो कहा कि शहरीकरण रोकना संभव नहीं, पर नियोजित करना होगा. सब किसी बड़े शहर में ही रहे जाएं, इसके बजाय कई छोटे-छोटे गांव आसपास बस जाएं. नवी मुंबई का बेलापुर इसी समझ से बसा.
1958 में मुंबई में, जो तब भी भीड़भरी थी, उन्होंने आंगन, खुली जगहों, हवा और रोशनी को स्थापत्य का सौंदर्यबोध बना दिया. 72, पेडर रोड पर कंचनजंघा अपार्टमेंट उनके प्रयोगों का अनोखा रूप है कि 32 मंजिला इमारत में बड़े-बड़े छज्जों, खिड़कियों से सब खुले आकाश, बढ़िया हवा का आनंद उठा सकते थे. समानांतर हिंदी फिल्मों में यह अपार्टमेंट खूबसूरती से दिखता है. चूंकि फ्लैट व्यक्ति का नियंत्रण खत्म करते हैं, जबकि संसाधनहीनता के बावजूद प्लॉट खुद की मर्जी से घर में तब्दील होते हैं. लिहाजा, उनके विचार से बेलापुर बसाने के लिए छोटे प्लॉट रखे गए. जो खरीदे वह अपनी जरूरत और हैसियत से, धीरे-धीरे घर बनाए.
क्वालालंपुर की साइबेरिया हाउसिंग घर के इसी विचार का अंतरराष्ट्रीय विस्तार है. मलेशिया की जलवायु और सामुदायिक जीवन से बने ये घर लोगों को सुकून देने वाले. नई दिल्ली में स्थित राष्ट्रीय हस्तकला संग्रहालय को उन्होंने देहात के अनुभव में बदल दिया, जहां छोटी-छोटी बस्तियां, आंगन, पगडंडियां थीं. प्रदर्शनी के बजाय वह जीवन शैली लगता था. गोवा मूल के कोरिया को पुर्तगालियों और अंग्रेजों ने खूब सराहा.
पुर्तगाल में लिस्बन में टैगस नदी के तट पर ठीक उसी जगह पर उन्होंने ‘शाम्पालीमो सेंटर फाॅर द अननोन’ रचा, जहां से वास्को डा गामा ‘अज्ञात’ दुनिया की खोज पर निकले थे. चिकित्सा अनुसंधान की यह इमारत आकाश, क्षितिज और समुद्र को जोड़ती है. लंदन में कोरिया का बनाया इस्माइली सेंटर मूलत: भारतीय मुगल वास्तु से प्रेरित है, जिसमें प्रकाश को शांति से जोड़ा गया है.
‘वॉल्यूम जीरो’ वृत्तचित्र है, जहां उनके दर्शन, विचार, भारत में आधुनिक वास्तुकला और काम की समझ दिखती है. भारत में जब शहर अनियंत्रित-बेतरतीब-नासमझी से बढ़ रहे हैं, तो जरूरी है कि चार्ल्स कोरिया को समझा जाए.