चंद्रशेखर आजाद: क्रांतिकारियों के जांबाज कमांडर-इन-चीफ
By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: February 27, 2026 05:44 IST2026-02-27T05:44:35+5:302026-02-27T05:44:35+5:30
Chandrashekhar Azad: नौ अगस्त, 1925 को अंजाम दिए गए ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन ऐक्शन में पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खां, रौशन सिंह और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी की शहादतों के बाद भी वे निराश नहीं हुए थे.

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Chandrashekhar Azad: ‘नाम क्या है तुम्हारा?’ ‘आजाद.’ ‘पिता का नाम?’ ‘स्वतंत्र.’ ’करते क्या हो?’ ‘भारतमाता को आजाद कराने की साधना.’ ‘और रहते कहां हो?’ ‘जेल में.’ 1921 में गोरी पुलिस ने 15 वर्षीय चंद्रशेखर तिवारी को असहयोग आंदोलन में भाग लेने के ‘कुसूर’ में पकड़ा और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया तो उसने सवाल-जवाब के इस सिलसिले के बाद उनको पंद्रह कोड़े लगाकर छोड़ देने की सजा सुनाई. इस सजा को अपनी देशभक्ति की परीक्षा के तौर पर लेकर ‘वंदे मातरम्’ व ‘महात्मा गांधी की जय’ का उद्घोष करते हुए भुगतने वाले यही चंद्रशेखर तिवारी, मजिस्ट्रेट को आजाद नाम बताने के कारण, बाद में क्रांतिकारी चंद्रशेखर ‘आजाद’ के नाम से जाने गए.
अनंतर वे क्रांतिकारियों की हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के कमांडर-इन-चीफ बने और उसके ऐक्शनों से गोरों के सिंहासन को हिलाते हुए, सीने में सांस रहते उनके हाथ न लगने की अपनी प्रतिज्ञा निभाकर 1931 में 27 फरवरी को यानी आज के ही दिन इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में शहीद हुए.
इस पार्क को अब उनके नाम से जाना जाता है और उनके शहादत दिवस पर वहां उनको भावविह्वल श्रद्धांजलियां दी जाती हैं. गौरतलब है कि वे 13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी के दिन पंजाब के जलियांवाला बाग में हुए भयावह जनसंहार से उद्वेलित होकर स्वतंत्रता संघर्ष में कूदे थे और महात्मा गांधी ने 1922 में अचानक असहयोग आंदोलन (जिसमें वे प्राणपण से सक्रिय थे) वापस ले लिया तो नाराज होकर अपने संघर्ष की दिशा बदलकर क्रांतिकारी हो गए थे. उनका नारा था : आजाद था, आजाद हूं, आजाद रहूंगा.
आजाद का जीवट कुछ ऐसा था कि वे क्रांतिकारी संघर्षों के दौरान जय-पराजय से निरपेक्ष रहकर उनकी सफलता में अपना विश्वास बनाए रखते थे. इन संघर्षों के लिए धन जुटाने हेतु नौ अगस्त, 1925 को अंजाम दिए गए ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन ऐक्शन में पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खां, रौशन सिंह और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी की शहादतों के बाद भी वे निराश नहीं हुए थे.
और क्रूर दमन के बीच हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी को नए सिरे से मजबूत करने में लगे रहे थे. तब उन्होंने ऐलान किया था कि ‘हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत.’ देश में समाजवादी समाज व्यवस्था की स्थापना के अपने सपने से उनको कोई समझौता गवारा नहीं था.
विडंबना यह कि उनकी शहादत को मिले भरपूर जन सम्मान के बावजूद उनके न रहने पर उनकी माता जगरानी देवी को हमारी सामाजिक कृतघ्नता की भारी कीमत चुकानी पड़ी. तंगहाली के चलते उनको बहुत दिनों तक कोदो वगैरह खाकर अपने पेट की आग बुझानी पड़ी. किसी तरह यह बात पं. जवाहरलाल नेहरू को मालूम हुई तो उन्होंने उनके लिए 500 रुपए भिजवाए.
बाद में सदाशिव मलकापुरकर (जो हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के आजाद के सबसे विश्वासपात्र सैनिकों में से एक थे) ने उनके निधन और अंतिम संस्कार तक उनके प्रति अपने सारे फर्ज निभाए). जब वे संसार में थीं तो उनको तीर्थयात्राएं भी कराईं. प्रसंगवश, मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले में स्थित जिस भांबरा ग्राम में आजाद 23 जुलाई, 1906 को पैदा हुए थे, उसका नाम अब ‘चंद्रशेखर आजाद नगर’ कर दिया गया है.