दूरगामी है बंबई उच्च न्यायालय का फैसला, मीडिया मैनेजमेंट को बिना डरे काम करने में मिलेगी मदद

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Published: June 28, 2022 03:43 PM2022-06-28T15:43:13+5:302022-06-28T15:44:43+5:30

भारतीय संविधान का आर्टिकल 19(1)(ए) फ्रीडम ऑफ स्पीच को सुनिश्चित करता है। मीडिया को यह अधिकार है कि वह उन सभी बातों को रिपोर्ट करे जो पब्लिक डोमेन में हैं। लोगों को जानकारी देना उसका न केवल अधिकार है बल्कि दायित्व भी है। निश्चय ही बंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ का यह फैसला दूरगामी है और मीडिया प्रबंधन को बगैर किसी भय के काम करने में मदद मिलेगी।

Bombay High Court's decision is far-reaching will help media management to work without fear | दूरगामी है बंबई उच्च न्यायालय का फैसला, मीडिया मैनेजमेंट को बिना डरे काम करने में मिलेगी मदद

दूरगामी है बंबई उच्च न्यायालय का फैसला, मीडिया मैनेजमेंट को बिना डरे काम करने में मिलेगी मदद

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Highlightsऐसी स्थिति में किसी खबर को लेकर चेयरमैन या एडिटर इन चीफ को शिकायत के घेरे में नहीं रखा जा सकता है।वास्तव में केवल अखबार की लाइन में नाम है इसलिए मीडिया संस्था के उच्च अधिकारियों के खिलाफ फौजदारी मामला दायर नहीं किया जा सकता।

बंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने पिछले सप्ताह मीडिया को मानहानि का भय दिखाकर प्रताड़ित करने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। मामला यवतमाल जिले के मारेगांव स्थित मारवाड़ी चौक की संपत्ति के विवाद में रविंद्र घीसूलाल गुप्ता व अरविंद गुप्ता परिवार के बीच विवाद व मारपीट का था। दोनों पक्षों के खिलाफ दर्ज मामले की खबर 20 मई 2016 को लोकमत में संतुलित तरीके से प्रकाशित की गई थी। रविंद्र गुप्ता ने लोकमत मीडिया के चेयरमैन विजय दर्डा एवं एडिटर इन चीफ राजेंद्र दर्डा के खिलाफ फौजदारी मुकदमा दायर किया था। 

प्रथम श्रेणी न्यायदंडाधिकारी ने इस पर 16 जनवरी 2018 को प्रोसेस इशू किया था। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। उच्च न्यायालय ने यवतमाल के प्रथम श्रेणी न्यायदंडाधिकारी के आदेश पर रोक लगा दी और दोनों पर फौजदारी शिकायत को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। दरअसल, पीआरबी एक्ट के तहत किसी भी अखबार में खबरों के चयन और प्रस्तुतिकरण की संपूर्ण जिम्मेदारी संपादक की होती है। अखबार के प्रिंट लाइन में इस बात का स्पष्ट तौर पर जिक्र भी होता है। 

ऐसी स्थिति में किसी खबर को लेकर चेयरमैन या एडिटर इन चीफ को शिकायत के घेरे में नहीं रखा जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने केएम मैथ्यू मामले में फैसला दिया था कि अखबारों में प्रकाशित खबरों के लिए संपादक के जिम्मेदार होने से चेयरमैन, समूह संपादक व अन्य को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने इस दलील को मान्य किया। वास्तव में केवल अखबार की लाइन में नाम है इसलिए मीडिया संस्था के उच्च अधिकारियों के खिलाफ फौजदारी मामला दायर नहीं किया जा सकता। 

इसके बावजूद यह देखने में आता है कि कुछ लोग चेयरमैन, एडिटर इन चीफ या समूह संपादक जैसे पद पर बैठे लोगों को शिकायत के घेरे में शामिल कर लेते हैं। यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है और इसके पीछे अखबार के पूरे प्रबंधन को दबाव में लाने की मंशा रहती है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ था। संपादक का नाम शिकायत पत्र में शामिल नहीं था जबकि चेयरमैन और एडिटर इन चीफ का नाम शामिल किया गया था। इस मामले में लोकमत ने जो खबर प्रकाशित की थी, वह एफआईआर के आधार पर थी। खबर का स्राेत स्पष्ट था इसलिए मानहानि जैसी कोई बात उठती ही नहीं है। 

भारतीय संविधान का आर्टिकल 19(1)(ए) फ्रीडम ऑफ स्पीच को सुनिश्चित करता है। मीडिया को यह अधिकार है कि वह उन सभी बातों को रिपोर्ट करे जो पब्लिक डोमेन में हैं। लोगों को जानकारी देना उसका न केवल अधिकार है बल्कि दायित्व भी है। निश्चय ही बंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ का यह फैसला दूरगामी है और मीडिया प्रबंधन को बगैर किसी भय के काम करने में मदद मिलेगी। मीडिया को प्रताड़ित करने, दबाव डालने या भयभीत करने की कोशिश करने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगेगी। मीडिया के मजबूत होने का सीधा सा अर्थ है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूती मिलेगी। लोगों की आवाज मजबूत करने का माध्यम आखिर मीडिया ही तो है।

Web Title: Bombay High Court's decision is far-reaching will help media management to work without fear

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