23-24 महानगर पालिकाओं में महायुति महापौर बनने की संभावना?, जनमत के सम्मान के साथ बने नया मेयर
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: January 19, 2026 05:45 IST2026-01-19T05:45:12+5:302026-01-19T05:45:12+5:30
आरक्षण की घोषणा के बाद पात्र नगरसेवक नामांकन-पत्र जमा करेंगे और उसके कुछ दिनों बाद महापौर का चुनाव कराया जाएगा.

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महाराष्ट्र में 29 शहरी निकायों के चुनाव हो चुके हैं. करीब 23-24 महानगर पालिकाओं में महागठबंधन या भारतीय जनता पार्टी के महापौर बनने की संभावना है. इस पर हालांकि फिलहाल चर्चाओं से अधिक कुछ नहीं है, क्योंकि शहरी विकास विभाग अगले सप्ताह महापौर पद के आरक्षण को लेकर लॉटरी निकालेगा, जिसमें तय होगा कि पद सामान्य वर्ग, महिला या किसी आरक्षित श्रेणी के लिए होगा. आरक्षण की घोषणा के बाद पात्र नगरसेवक नामांकन-पत्र जमा करेंगे और उसके कुछ दिनों बाद महापौर का चुनाव कराया जाएगा.
एक अनुमान के अनुसार जनवरी के अंतिम सप्ताह में शहरों के प्रथम नागरिक तय हो जाएंगे. चुनाव के बाद मुंबई, ठाणे, छत्रपति संभाजीनगर, अकोला, अमरावती और चंद्रपुर में महापौर पद को लेकर हलचल आरंभ है. यहां सहायता बिना किसी का महापौर नहीं बन सकेगा, क्योंकि मनपा के सदन में किसी भी दल के पास बहुमत नहीं है.
विदर्भ के चंद्रपुर में कांग्रेस और भाजपा दोनों के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं है. इसी प्रकार अमरावती और अकोला की स्थिति है. छत्रपति संभाजीनगर में एक की कमी है. सबसे बड़ी झंझट मुंबई की है, जहां नवनिर्वाचित नगरसेवकों से मिलने के बाद शिवसेना ठाकरे गुट के नेता उद्धव ठाकरे महापौर पद से पीछे हटते नहीं दिख रहे हैं.
वह एक तरफ जहां शिवसेना शिंदे गुट के नगरसेवकों पर नजर गड़ाए हुए हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें भगवान की इच्छा पर भी भरोसा है. मुंबई शिवसेना ठाकरे गुट यदि महाविकास आघाड़ी के नाम पर सारे नगरसेवक जुटा लेता है तो भी उसके पास आठ नगरसेवकों की कमी है, जिस पर ठाकरे का दावा है कि शिवसेना शिंदे गुट के कुछ नगरसेवक वापस आ सकते हैं.
कुछ यही वजह है कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपने नगरसेवकों को होटल में पहुंचा दिया है. उनकी पार्टी का दावा करती है कि 29 में से 20 नगरसेवक नए हैं, इसलिए उन्हें भविष्य के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है, लेकिन इतनी जल्दी प्रशिक्षण देना अनेक सवालों को जन्म देता है. साफ है कि बहुमत हासिल करने के लिए दलबदल की कोशिशें हर तरफ जारी हैं.
मगर जनमत का अपना संदेश है. यदि मुंबई में शिवसेना के हाथ से मनपा निकल गई है तो वह विचार योग्य विषय है. वहीं भाजपा को बहुमत नहीं मिलने और पिछली बार की तुलना में केवल पांच सीटें ही अधिक पाने के अपने संकेत हैं. राजनीति में चुनाव के बाद जनमत को समझने के ही प्रयास होने चाहिए. जोड़-जोड़ की राजनीति हमेशा ही अस्थिरता को जन्म देती है,
जिसमें कभी एक की बारी तो कभी दूसरे की बारी आ जाती है. मतदान के बाद दोनों के बीच में आम जनता पिसती रह जाती है. इसलिए आवश्यक यही है कि बहुमत सकारात्मक ढंग से जुटाया जाए. उसे शक्ति प्रदर्शन या प्रतिष्ठा का आधार नहीं बनाया जाए.
संभव है कि कहीं नए-नए तरीकों से जोड़-तोड़ कर आवश्यक आंकड़े जम भी जाएं, लेकिन वह मतदाता के लिए महंगा ही साबित होता है. इसलिए सही निर्णय जनहित में लिया जाना चाहिए, जिससे जनमत का सम्मान बना रहे और क्षेत्र की जन समस्याओं को दूर करने में आगे कोई नई समस्याएं न खड़ी हों.