पंजाब में अमित शाह का प्रतिभा खोज अभियान?, आरिफ मोहम्मद खान ढाका जाएंगे!
By हरीश गुप्ता | Updated: April 8, 2026 05:24 IST2026-04-08T05:24:27+5:302026-04-08T05:24:27+5:30
आम आदमी पार्टी के नाराज सांसद हों जो अपने लिए सुरक्षित ठिकाना तलाश रहे हों, या अकाली दल के पुराने नेता जो बदलती हवा को भांप रहे हों, सबके लिए दरवाजे खुले हैं.

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पंजाब में भारतीय जनता पार्टी का विस्तार अब धीरे-धीरे नहीं, बल्कि बहुत तेज और आक्रामक तरीके से हो रहा है. अमित शाह की ‘ओपन डोर’ नीति कोई रणनीति नहीं, बल्कि एक तरह का वैचारिक खालीपन बनती जा रही है. असम और पश्चिम बंगाल में अकेले दम पर लड़ाई लड़ने के बाद अब पार्टी का इरादा साफ है, अगर सिस्टम को हरा नहीं सकते, तो उसे चलाने वालों को ही अपने साथ मिला लो. लेकिन पंजाब भाजपा के पुराने और लंबे समय से जुड़े नेता असहज और चिंतित हैं. उन्होंने दशकों तक ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा लगाया और अब अपने को ‘कांग्रेस युक्त भाजपा’ के बीच पा रहे हैं.
प्रमुख नेताओं पर नजर डालिए. सुनील जाखड़, जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि में पीढ़ियों से कांग्रेस की छाप रही है, अब भाजपा की कमान संभाले हुए हैं. रवनीत सिंह बिट्टू ने सिर्फ पार्टी नहीं बदली, बल्कि सीधे केंद्र सरकार में मंत्री बन गए. और फिर ‘महाराजा’ कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस छोड़कर अपने पूरे राजनीतिक खेमे के साथ भाजपा में शामिल हो गए.
दिल्ली से जो संदेश आ रहा है, वह बिल्कुल साफ और व्यावहारिक है, ‘जीत ही सबसे बड़ी वफादारी है.’ यहां प्रतिभाओं की तलाश ऐसे हो रही है जैसे किसी कॉरपोरेट कंपनी में बड़े पदों के लिए लोगों को ढूंढ़ा जाता है. चाहे आम आदमी पार्टी के नाराज सांसद हों जो अपने लिए सुरक्षित ठिकाना तलाश रहे हों, या अकाली दल के पुराने नेता जो बदलती हवा को भांप रहे हों, सबके लिए दरवाजे खुले हैं.
यह असम वाला मॉडल ही है, बस अधिक आक्रामक है. गुवाहाटी में मुख्यमंत्री और उनका मंत्रिमंडल उन नेताओं से भरा है जो कभी कांग्रेस के बड़े चेहरे थे. अब पंजाब भी उसी रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है.
भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं के लिए, जिन्होंने मुश्किल दौर में भी पार्टी का साथ निभाया, यह स्थिति विडंबनापूर्ण है.
उन्होंने पूरी जिंदगी कांग्रेस के विरुद्ध लड़ाई लड़ी, लेकिन अब वही लोग भाजपा में आकर अहम फैसले लेते दिख रहे हैं. उन्हें चिंता है कि कहीं पार्टी अपने मूल विचारों से दूर होकर सिर्फ वोट जुटाने की राजनीति तक सीमित न हो जाए. अमित शाह का यह दांव बड़ा और जोखिम भरा है. उनका भरोसा है कि बाहर से आए प्रभावशाली नेता मिलकर उन स्थानों पर सफलता दिला सकते हैं,
जहां पुराने कार्यकर्ता अब तक कुछ नहीं कर पाए, खासकर किसान आंदोलन प्रभावित इलाकों में. अभी हालात ऐसे हैं कि पार्टी के दरवाजे सबके लिए खुले हैं, माहौल में आगे बढ़ने की होड़ है और धीरे-धीरे पार्टी की पुरानी पहचान कमजोर पड़ती हुई नजर आ रही है.
केरल में राहुल गांधी की गुगली
राहुल गांधी ने केरल में एक ऐसी राजनीतिक चाल चली है जिसने सबको चौंका दिया है. उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है, तो वह केरल में एक महिला को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहेंगे. इस बयान ने अचानक पूरी चर्चा का रुख बदल दिया है. हालांकि, उन्होंने यह बात भावनात्मक अंदाज में कही.
चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने उस समय को याद किया जब सोनिया गांधी अस्पताल में भर्ती थीं. उन्होंने केरल की एक नर्स का जिक्र किया, जिसने बहुत लगन के साथ उनकी सेवा और देखभाल की. उन्होंने कहा, “केरल की एक नर्स हर घंटे मेरी मां को देखने आती थी... उन्होंने मुश्किल समय में अनगिनत परिवारों को सहारा दिया है.”
इसी अनुभव का हवाला देते हुए उन्होंने केरल की नर्सों की संवेदनशीलता और समर्पण की तारीफ की और फिर कहा कि वे केरल में एक महिला मुख्यमंत्री देखना चाहेंगे. लेकिन इस भावनात्मक अपील के पीछे सियासत भी छिपी है. इस बयान ने केरल कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं जैसे के. सी. वेणुगोपाल, रमेश चेन्निथला और वी. डी. सतीशन को असहज कर दिया है.
असल में केरल में कांग्रेस के पास प्रमुख महिला नेताओं की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है. 95 सीटों में से सिर्फ आठ-नौ महिला उम्मीदवार होने से यह वादा थोड़ा अजीब-सा लगता है. जिन नामों पर चर्चा हो रही है, उनमें सांसद हिबी ईडन का नाम भी है, हालांकि वे चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. इसके अलावा शानीमोल उस्मान, बिंदु कृष्णा, उमा थॉमस और पूर्व सांसद व दलित नेता राम्या हरिदास के नाम भी लिए जा रहे हैं. फिलहाल, राहुल गांधी की यह चाल असर डाल चुकी है. लेकिन यह कितना सफल होती है, यह चुनाव नतीजों और आंकड़ों से ही तय होगा.
बिहार की राजनीति में क्या चल रहा है?
पटना की यह शांति सिर्फ सामान्य संवैधानिक प्रक्रिया का नतीजा नहीं है, इसके पीछे और भी बहुत कुछ चल रहा है. नीतीश कुमार ने 16 मार्च को राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद तय 14 दिन के भीतर विधान परिषद से इस्तीफा तो दे दिया, लेकिन वह अब भी बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं. यही बात राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर रही है. कागजी तौर पर इसमें कुछ भी गलत नहीं है.
संविधान के अनुच्छेद 164(4) के मुताबिक, कोई व्यक्ति बिना विधायक या सांसद बने भी छह महीने तक मुख्यमंत्री रह सकता है. नीतीश कुमार के लगभग 10 अप्रैल के आसपास राज्यसभा में शपथ लेने की उम्मीद है. तब तक और उसके बाद भी उनकी यह दोहरी भूमिकाएं कानूनी रूप से कोई समस्या नहीं खड़ी करतीं. लेकिन राजनीति सिर्फ कानून तक सीमित नहीं रहती.
नीतीश कुमार का पद पर बने रहना एक सोची-समझी अनिश्चितता का संकेत देता है. क्या वह थोड़ा वक्त हासिल करना चाहते हैं, या फिर बिहार की बदलती राजनीति में अपने विकल्प खुले रखना चाहते हैं? यह खामोशी भी अपने आप में बहुत कुछ कहती है. इतिहास याद दिलाता है कि ऐसी दोहरी स्थितियां कभी-कभी बड़े असर डाल सकती हैं.
1999 में, गिरिधर गमांग उस समय ओडिशा के मुख्यमंत्री थे, लेकिन उन्होंने लोकसभा में सांसद के तौर पर वोट भी दिया. उनका एक वोट अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के खिलाफ गया और सरकार सिर्फ एक वोट से गिर गई. नीतीश कुमार की मौजूदा स्थिति भले ही संविधान के हिसाब से सही हो, लेकिन भारतीय राजनीति में ऐसी तकनीकी बातें अक्सर बड़े राजनीतिक बदलावों का संकेत देती हैं. असली कहानी अभी सामने आनी बाकी है.
आरिफ मोहम्मद खान ढाका जाएंगे!
नरेंद्र मोदी सरकार इस बात पर गंभीरता से विचार कर रही है कि बांग्लादेश में भारत के दूत के रूप में किसी वरिष्ठ राजनीतिक नेता को भेजा जाए. अगर ऐसा होता है, तो यह परंपरा से हटकर कदम होगा, क्योंकि आम तौर पर इस पद पर करियर डिप्लोमेट ही नियुक्त किए जाते हैं. जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह आरिफ मोहम्मद खान का है, जो कुछ हफ्ते पहले तक बिहार के राज्यपाल थे.
उनका पद से हटाया जाना राजनीतिक हलकों में चौंकाने वाला माना गया, खासकर इसलिए क्योंकि यह फैसला उसी दिन हुआ जब यह तय हुआ कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद छोड़ेंगे. हाल ही में आरिफ मोहम्मद खान मथुरा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शीर्ष पदाधिकारियों के साथ भी नजर आए थे, जिससे इस चर्चा को और बल मिला है.
यह भी चर्चा है कि इस बार कोई बंगाली बोलने वाला प्रतिनिधि चुना जा सकता है. बांग्लादेश में राजनीतिक बदलाव के दौर और तारिक रहमान के नए प्रधानमंत्री बनने के समय नए उच्चायुक्त की नियुक्ति हो रही है, इसलिए यह फैसला और अहम माना जा रहा है. वर्तमान भारतीय उच्चायुक्त प्रणय कुमार वर्मा जल्द ही सेवानिवृत्त होने वाले हैं.




