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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: चुनावों में फर्जी सत्ता विरोधी लहर के सबक

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: May 4, 2021 14:10 IST

पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों ने साबित किया है कि राज्य में कोई भी सत्ता विरोधी लहर नहीं थी. ऐसे में इस बात पर गौर करना चाहिए कि या क्या जानबूझकर एंटीइनकम्बेंसी जैसी बातों को गढ़ा जाता है.

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बंगाल के चुनाव में किसी किस्म की एंटीइनकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) नहीं थी. सरकार विरोधी लहर की बात तो छोड़ ही दीजिए. बिहार के बाद यह दूसरा मौका है जब सरकार विरोधी भावनाओं के बारे में किए गए मीडिया के दावे गलत निकले हैं. 

ऐसा लगता है कि एंटीइनकम्बेंसी दो तरह की होती है. एक वह जो स्वाभाविक तौर पर जमीन पर मौजूद होती है, और हर सरकार को किसी न किसी रूप में उसका सामना करना ही पड़ता है.

दूसरी वह जो मीडिया का एक वर्ग दिखाता है. यानी जो पत्रकारों द्वारा गढ़ी जाती है. बिहार में नीतीश कुमार के खिलाफ भी इसी तरह की एंटीइनकम्बेंसी दिखाई जा रही थी. बंगाल में तो इसके बारे में परले दर्जे की बढ़ी-चढ़ी बातें की जा रही थीं. 

मीडिया के एक वर्ग की दलील वही थी जो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष बार-बार दे रहे थे. उनका कहना था कि बंगाल का वोटर तृणमूल कांग्रेस की दादागीरी से डरा हुआ है. इसलिए वह सर्वेक्षणों में यह कहने से परहेज करता है कि बंगाल में इस बार परिवर्तन होने वाला है. चुनाव  परिणामों ने साबित कर दिया है कि ये सब बातें या तो गलतफहमी थीं, या फिर जानबूझ कर बोला जाने वाला झूठ.

बंगाल में एंटीइनकम्बेंसी देखने  पर तुले लोगों ने एक दूसरी हकीकत की तरफ से आंखें बंद कर रखी थीं. वह हकीकत है ममता बनर्जी द्वारा स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार करने वाले तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगाम कसने की कार्रवाई. 

इसकी बहुत सी मिसालें हैं. जैसे, दक्षिण चौबीस परगना और डायमंड हार्बर में ममता ने स्वयं शौकत मुल्ला और अराबुल इस्लाम जैसे अनेक नेताओं को मजबूर किया कि वे जनता से जबरिया उगाही गई रकमें वापस करें. इस तरह के प्रकरणों ने ममता की छवि को जनता की निगाहों में आसमान की ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया. 

असल में 2019 के लोकसभा चुनावों में जब नतीजे ममता के अनुकूल नहीं निकले (भाजपा ने इन चुनावों में चालीस फीसदी वोटों के साथ 18 लोकसभा सीटें जीत ली थीं) तो वे चौंकीं. उन्होंने दो-तरफा कार्रवाई शुरू की.

एक तरफ तो उन्होंने सारे बंगाल में स्थानीय स्तर पर फैले हुए भ्रष्टाचार को सीमित करने का अभियान चलाया ताकि आम लोगों में पार्टी के खिलाफ बढ़ रही नाराजगी घटाई जा सके. दूसरी तरफ उन्होंने अपनी सरकार की लोकोपकारी छवि को और मजबूत करने का निश्चय किया. 

रूपश्री (विवाहित स्त्रियों के लिए), कन्याश्री (छात्राओं के लिए) और सबुज साथी (किसानों के लिए) जैसी स्कीमें पहले से चल रही थीं. ये योजनाएं बंगाल के स्त्री-समाज और गरीब किसानों को गहराई से प्रभावित करने वाली थीं. ममता बनर्जी ने इसमें ‘दुआरे सरकार’ और ‘दीदी के बोलो’ को और जोड़ा. 

दुआरे सरकार के कारण लोगों को लगा कि सरकार उनकी दहलीज तक  पहुंच सकती है, और दीदी के बोलो के जरिये वे एक केंद्रीकृत $फोन नंबर  पर अपनी शिकायतें मुख्यमंत्री तक  पहुंचाने लगे.

इसी तरह सरकारी स्कूलों में बच्चों को हफ्ते में दो दिन अंडे खिलाए जाने लगे. उन्होंने सुनिश्चित किया कि अनुसूचित जातियों के लोगों को शेड्यूल्ड कास्ट सर्टिफिकेट बिना किसी खर्चे के सुविधापूर्वक मिल सकें ताकि उसके जरिये मिलने वाली सुविधाओं में कोई कटौती न हो. 

बंगाल के चुनाव में एक अबूझ सी पेचीदगी यह आकलन करना था कि कांग्रेस और माकपा के गठजोड़ का प्रदर्शन कैसा होगा. उसे जो वोट मिलेंगे, उनसे किसका नुकसान होगा, किसका फायदा होगा. यह गठजोड़ दो तरह की भूमिका निभा सकता था. 

यह महाजोट भाजपा से अपने उन वोटों का एक हिस्सा वापस ले सकता था, जो लोकसभा चुनाव में इन पार्टियों के हाथ से खिसक गए थे.

इस सूरत में वह भाजपा का नुकसान करता. दूसरी सूरत यह हो सकती थी कि इंडियन सेक्युलर फ्रंट जैसी पार्टी के साथ मिल कर यह महाजोट मुसलमान वोट बांट देता, और इस प्रकार ममता बनर्जी का नुकसान करता. परिणाम बताते हैं कि यह महाजोट दोनों में से कुछ भी करने में नाकाम रहा. न वह भाजपा से अपने वोट वापस ले  पाया और न ही मुसलमान वोटरों में उसके प्रति कोई आकर्षण पैदा हो पाया. इस महाजोट को तैयार करने में माकपा के नेता मुहम्मद सलीम ने प्रमुख भूमिका निभाई थी. वे खुद अपना चुनाव बहुत बड़े अंतर से हार गए.

एक और बात थी जिसे अंग्रेजी में ‘बंगाली एक्सेप्शन’ कहते हैं. इसका मतलब होता है बंगालियों का अपनी भाषा, संस्कृति, पहनावे, खानपान और बंगालीपन के साथ अटूट प्रेम. भाजपा की चुनावी मुहिम का लहजा और रवैया इस बंगालीपन के लिए एक खुला खतरा था. इसका उल्टा असर पड़ना स्वाभाविक ही था. 

हर बंगाली हिंदी समझता है, हिंदी फिल्में देखता है, हिंदी फिल्मों में बंगालियों का योगदान ऐतिहासिक है- लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हिंदी में दिए गए भाषण उनके ऊपर थोप दिए जाएं. भाजपा ने जिद करके यही किया. उसने ममता बनर्जी के मुकाबले कोई बंगाली चेहरा उतारना मुनासिब नहीं समझा. जाहिरा तौर पर भाजपा को उसका नतीजा भुगतना ही था.

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