धुआं ही नहीं, मौसम भी बढ़ा रहा हवा में जहर
By निशांत | Updated: March 13, 2026 05:34 IST2026-03-13T05:34:35+5:302026-03-13T05:34:35+5:30
पर्यावरण शोध संस्था क्लाइमेट ट्रेंड्स की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम की स्थितियां अपने आप में प्रदूषण के स्तर को 40 प्रतिशत तक ऊपर-नीचे कर सकती हैं, भले ही उत्सर्जन में कोई बदलाव न हुआ हो.

सांकेतिक फोटो
भारत के बड़े शहरों में बढ़ते प्रदूषण को अक्सर सिर्फ उत्सर्जन का नतीजा माना जाता है. गाड़ियों का धुआं, उद्योगों का धुआं, कूड़ा जलाना. मगर एक नया अध्ययन बताता है कि कहानी इससे कहीं ज्यादा जटिल है. दरअसल कई शहरों में हवा की गुणवत्ता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कितना प्रदूषण निकल रहा है. यह भी उतना ही अहम है कि मौसम उसे फैलने देता या शहर के ऊपर ही रोक रखता है.
पर्यावरण शोध संस्था क्लाइमेट ट्रेंड्स की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम की स्थितियां अपने आप में प्रदूषण के स्तर को 40 प्रतिशत तक ऊपर-नीचे कर सकती हैं, भले ही उत्सर्जन में कोई बदलाव न हुआ हो. यह विश्लेषण 2024 से 2025 के बीच केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वायु गुणवत्ता आंकड़ों के आधार पर किया गया है.
रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई शहरों में प्रदूषण का असली संकट उत्सर्जन और मौसम के आपसी मेल से बनता है. खासकर तब, जब हवा की रफ्तार बेहद कम होती है और नमी अधिक होती है. ऐसी स्थिति में वातावरण में ठहराव पैदा हो जाता है, जिससे प्रदूषक कण शहर के ऊपर ही जमा होने लगते हैं. अध्ययन के मुताबिक दिल्ली देश का सबसे गंभीर वायु प्रदूषण संकट झेलने वाला शहर बना हुआ है.
यहां सालाना औसत पीएम 2.5 स्तर सबसे अधिक दर्ज किया गया है. सर्दियों में हालात और भी खराब हो जाते हैं. रिपोर्ट के अनुसार सर्दियों के दौरान दिल्ली में एक भी ‘क्लीन एयर डे’ दर्ज नहीं हुआ. यही वजह है कि साल भर के औसत आंकड़े कभी-कभी सुधार दिखाते हैं, लेकिन नागरिकों को असली राहत महसूस नहीं होती.
रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली और पटना जैसे शहरों में सर्दियों के दौरान 70 प्रतिशत से अधिक दिनों में कम हवा और ज्यादा नमी वाली मौसम स्थितियां बनती हैं. यही ठहराव प्रदूषण को लंबे समय तक हवा में बनाए रखता है. अध्ययन में यह भी सामने आया कि पटना देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर बन चुका है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, गंगा के मैदानों में स्थित कई शहरों में हवा का प्रवाह सीमित होता है. ऐसे में प्रदूषण फैलने के बजाय शहर के ऊपर ही अटक जाता है. रिपोर्ट एक और दिलचस्प बदलाव की ओर इशारा करती है. परंपरागत रूप से अपेक्षाकृत साफ माने जाने वाले बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में भी अब सर्दियों के महीनों में हवा की गुणवत्ता बिगड़ने के संकेत मिलने लगे हैं.
यह एक नया ट्रेंड माना जा रहा है. इसके अलावा मुंबई और चेन्नई में 2025 के दौरान सालाना औसत प्रदूषण स्तर में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई, जो इस बात का संकेत है कि प्रदूषण अब सिर्फ कुछ महीनों की समस्या नहीं रह गया है. कोलकाता में भी प्रदूषण का संकट सर्दियों में गंभीर हो जाता है. रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ है.
अगर भारत को वाकई साफ हवा चाहिए, तो सिर्फ उत्सर्जन घटाने की नीतियां पर्याप्त नहीं होंगी. इसके लिए मौसम आधारित रणनीति भी जरूरी होगी. रिपोर्ट सुझाव देती है कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के अगले चरण में सर्दियों के लिए अलग लक्ष्य, मौसम के हिसाब से प्रदूषण मापने के तरीके और मौसम बदलते ही सक्रिय होने वाली कार्रवाई योजनाएं बनाई जाएं. क्योंकि कई बार हवा को साफ करने के लिए सिर्फ प्रदूषण कम करना ही नहीं, उसे फैलने की जगह भी देनी पड़ती है. और भारत के शहरों में, यह जगह अक्सर मौसम ही तय करता है.