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गिरीश्वर मिश्र का ब्लॉग: उच्च शिक्षा में उत्कृष्टता और सामर्थ्य की चुनौती

By गिरीश्वर मिश्र | Updated: September 9, 2020 17:48 IST

नई शिक्षा नीति में विद्यार्थियों की अभिरुचि, योग्यता और तत्परता को देखते हुए अध्ययन विषय के चयन और शिक्षण-अवधि की दृष्टि से अनेक विकल्प दिए जाने का प्रावधान किया गया है.

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भारत के लिए प्रस्तुत नई शिक्षा नीति देश की एक ऐसी महत्वाकांक्षी पहल है जो शिक्षा के कलेवर को आमूलचूल बदलने के लिए प्रतिश्रुत दिख रही है. इस तरह की जरूरत बहुत दिनों से अनुभव की जा रही थी परंतु जिस तरह से वर्तमान सरकार ने इसकी योजना बनाने में गंभीरता दिखाई है और इसके कार्यान्वयन के प्रति रुचि व्यक्त की है वह उसकी प्रतिबद्धता और संकल्प की दृढ़ता को व्यक्त करती है.

सरकार द्वारा यह संकेत दिया जा रहा है कि आत्मनिर्भर, उद्यमी और कुशलतायुक्त युवा शक्ति ही भारत की स्थानीय और वैश्विक समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकेगी. ऐसा नहीं है कि संरचना, विषयवस्तु और शिक्षा की पद्धति को ले कर उच्च शिक्षा का जो ढांचा अब तक चलता चला आ रहा था उसको ले कर कोई असंतोष नहीं था और उसकी आलोचना नहीं हुई थी. परंतु सरकार की ओर से छिटपुट बदलाव के अलावा कोई कारगर उपाय नहीं हो सका था और बातें ज्यों की त्यों बनी रहीं तथा समस्याएं बढ़ती गईं या फिर उनके रूप बदलते गए.

धीरे-धीरे अधिकांश विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रवेश, परीक्षा और डिग्री देने की यांत्रिक प्रक्रिया और उससे जुड़े अनुष्ठानों को खेती करते हुए फसल उगाने की तरह पूरा करना ही मुख्य कार्य बनता गया. शिक्षा की गुणवत्ता प्रश्नांकित होती गई और डिग्रीधारी बेरोजगारों की संख्या बढ़ती गई जो अपनी अकुशलता के कारण समाज पर भार बनते गए. यह भारतीय लोक जीवन का एक दुखदायी पक्ष है कि शिक्षा अपनी अपेक्षाओं की दृष्टि से कमजोर साबित हुई. नालंदा और तक्षशिला जैसे उन्नत विश्वविद्यालयों के अतीत वाले भारत के वर्तमान विश्वविद्यालय दु:स्वप्न सरीखे हो रहे हैं. इनकी समस्याओं के समाधान के लिए नई शिक्षा नीति में बहुआयामी प्रयास करने का वादा किया गया है.

नई शिक्षा नीति में विद्यार्थियों की अभिरुचि, योग्यता और तत्परता को देखते हुए अध्ययन विषय के चयन और शिक्षण-अवधि की दृष्टि से अनेक विकल्प दिए जाने का प्रावधान किया गया है. साथ ही सीखने की प्रक्रि या पर विशेष बल दिया गया है ताकि अध्ययन का कार्य विद्यार्थियों के निजी अनुभव का हिस्सा बन सके. अब तक अध्यापक पुस्तक और परीक्षा की वैतरणी के बीच एक सेतु का काम करते थे जिनकी सहायता से विद्यार्थी पार उतरता था. साथ ही पुस्तक और परीक्षा के बीच ऐकिक संबंध बना रहता था और पिछले कुछ वर्षो के प्रश्नपत्न हल करना सफलता की गारंटी होता था.

रटन की प्रचलित परम्परा से अलग हट कर अनुभव, चिंतन और सृजन को महत्व देने की बात विद्यार्थियों को सशक्त और योग्य बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा. इसी तरह प्रस्तावित व्यवस्था में व्यावसायिक, मानविकी, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कला और समाज विज्ञान आदि के विषयों में से चुनने की छूट एक क्र ांतिकारी पहल है. इस तरह का लचीलापन विद्यार्थी में जिज्ञासा की भावना, प्रयोग धर्मिता, सृजनशीलता को बढ़ावा देने के साथ-साथ छात्न संख्या के दबाव को कम करने, विद्यार्थियों की रुचि की विविधता को सम्मान देने और शिक्षा प्रक्रिया की अतिरिक्त यांत्रिकता से उबरने में निश्चय ही सहायक सिद्ध होगा. इसके लिए संस्था के स्तर पर बहु अनुशासनात्मकता को प्रश्रय देना होगा.

साथ ही पाठ्यक्रमों को समुचित आकार देना होगा ताकि उनमें संरचनात्मक दृष्टि से पूर्णता और कौशलगत उपादेयता का समुचित सन्निवेश हो सके. उच्च शिक्षा की ओर उन्मुख और अग्रसर होने वाले छात्नों के लिए चार वर्ष का स्नातक पाठ्यक्रम निश्चय ही उपयुक्त होगा. कहना न होगा कि इसके लिए पाठ्यक्रम को अद्यतन करने के साथ अध्यापकों के लिए प्रशिक्षण भी आवश्यक होगा जिसमें शिक्षण विधि के साथ ही मूल्यांकन की व्यवस्था विकसित की जाए. नई व्यवस्था की प्रामाणकिता और उपयोगिता की स्वीकार्यता के लिए प्राध्यापकों के लिए गहन अभिविन्यास ( ओरिएंटेशन) की आवश्यकता पड़ेगी. 

उच्च शिक्षा के क्षेत्न में अध्यापक प्रशिक्षण का प्रश्न पेचीदा है क्योंकि इसमें शिक्षण विधि, शिक्षण की तकनीक के साथ ही विषयगत अनुसंधान में भी अद्यतन होते रहने की जरूरत होती है. इनके बीच सामंजस्य और संतुलन बैठाना बड़ा आवश्यक है और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इसे अनिवार्यत: सतत होते रहना चाहिए. नई शिक्षा नीति कई तरह की उच्च शिक्षा संस्थाओं की संकल्पना के साथ प्रत्येक जिले तक उनकी स्थापना की बात करती है. यह सब पर्याप्त आर्थिक संसाधनों की अपेक्षा करता है. यह शुभ लक्षण है कि इसके लिए सरकार जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च करने के लिए तत्पर है.

 

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