क्या रिश्तों में मिठास ला पाएंगे अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर?
By विजय दर्डा | Updated: January 19, 2026 05:47 IST2026-01-19T05:47:23+5:302026-01-19T05:47:23+5:30
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने भरोसे के व्यक्ति सर्जियो गोर को भारत में अमेरिका का राजदूत नियुक्त किया लेकिन उन्हें भी कार्यभार संभालने में करीब 7 महीने का वक्त लग गया.

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दिल्ली दूर है...! यह कहावत भारत में बहुत मशहूर है. मगर क्या अमेरिका के लिए भी दिल्ली दूर है? यह सवाल इसलिए क्योंकि अमेरिकी राजदूत को नियुक्ति की घोषणा के बाद दिल्ली पहुंचने में सात महीने का वक्त लग गया. तो क्या अब ये कहावत चरितार्थ होने की उम्मीद की जानी चाहिए कि ...देर आए दुरुस्त आए! नए राजदूत सर्जियो गोर क्या भारत और अमेरिका के रिश्तों में मिठास वापस ला पाएंगे?
इससे पहले भी कई बार भारत में अमेरिकी राजदूत की नियुक्ति में विलंब के मौके आए हैं लेकिन अभी मसला ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि रिश्तों में पहले की मिठास कड़वाहट में बदल चुकी है और अमेरिका भरोसे के संकट से जूझ रहा है. जनवरी 2021 में जब केनेथ जस्टर की राजदूत के पद से विदाई हुई थी तब से लेकर अप्रैल 2023 में एरिक गार्सेटी के आने तक यानी दो साल से ज्यादा वक्त तक भारत में अमेरिका का कोई भी राजदूत नहीं था. क्यों नहीं था, यह मसला जरा पेचीदा है.
जो बाइडेन ने एरिक गार्सेटी का नाम तो फाइनल कर दिया लेकिन उन पर कई तरह के आरोप लग गए. आरोपों की जांच-पड़ताल में लंबा वक्त लगा. फिर गार्सेटी नई दिल्ली आए. लेकिन क्या इस बीच किसी और को राजदूत बना कर दिल्ली नहीं भेजा जा सकता था? अमेरिकी सांसद मार्क वार्नर ने तब कहा था कि एक तरफ तो भारत से संबंधों को बेहतर बनाने की बात की जा रही है.
दूसरी ओर एक राजदूत की नियुक्ति हम नहीं कर पा रहे हैं? उस वक्त यही माना जा रहा था कि बाइडेन भारत की हैसियत को कम मानने का संदेश देना चाहते थे. बहरहाल गार्सेटी भारत आए और मई 2025 में उनका कार्यकाल पूरा हुआ. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने भरोसे के व्यक्ति सर्जियो गोर को भारत में अमेरिका का राजदूत नियुक्त किया लेकिन उन्हें भी कार्यभार संभालने में करीब 7 महीने का वक्त लग गया.
जबकि चीन समेत कई देशों में दिसंबर, 2024 में ही राजदूत की नियुक्ति हो चुकी थी. सवाल फिर उसी विलंब का है. इसके साथ ही सर्जियो गोर को दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों के लिए विशेष दूत की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है. यानी उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहने वाली है. मगर सवाल यही है कि इन जिम्मेदारियों के बीच वे भारत के साथ न्यायसंगत रिश्ते की कितनी वकालत कर पाएंगे?
फिलहाल भारत में कार्यभार संभालते ही उन्होंने इस नजरिए का इजहार भी किया है कि अमेरिका और भारत के रिश्तों को बेहतर बनाना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी. और मुझे इस बात की उम्मीद भी है क्योंकि वे ऐसी शख्सियत हैं जिनका सीधा संबंध डोनाल्ड ट्रम्प से है. उन्हें टीम ट्रम्प की सबसे ताकतवर शख्सियतों में से एक माना जाता है.
खुद ट्रम्प ने भी सोशल मीडिया पर ट्रम्प परिवार से उनके रिश्तों का उल्लेख किया है और तारीफों के पुल भी बांधे हैं. ट्रम्प के बेटे जूनियर ट्रम्प से गोर की दोस्ती भी है. इसलिए यह भरोसा करने में कोई हर्ज नहीं है कि ट्रम्प को वे इस बात के लिए राजी करें कि इस इलाके में भारत के साथ रिश्तों की मिठास के बगैर चीन की नकेल कसना अमेरिका के लिए असंभव होगा.
अन्य वैश्विक कारणों से भी अमेरिका के लिए भारत विश्वसनीय साझेदार हो सकता है. दरअसल पिछले करीब दस वर्षों में इसी सोच ने अमेरिका और भारत को एक पटरी पर लाने की कोशिश की थी लेकिन फिलहाल रिश्ते पटरी से उतरे हुए लग रहे हैं इसलिए काम जरा कठिन है. मगर मुझे विश्वास है कि वे कामयाब होंगे क्योंकि असंभव को संभव बनाने की कला उन्हें आती है.
भारतीय संस्कृति को वे अच्छी तरह समझते हैं. वे जानते हैं कि भारत दोस्ती करने वाला देश है और ट्रम्प के चुनाव में किस तरह से भारत ने उनका साथ दिया था. नरम स्वभाव के सर्जियो गोर समझते हैं कि दो देशों के बीच व्यवहार और व्यापार को फलना-फूलना चाहिए. अवाम के बीच सद्भावना होनी चाहिए.
एक बात तो तय है कि किसी भी देश के राजदूत का पहला दायित्व अपने देश के हितों को प्राथमिकता देना है. सर्जियो अमेरिका फर्स्ट नीति का घनघोर रूप से पालन करने वाले व्यक्ति हैं. ट्रम्प ने जब ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात की थी और उसके ठीक बाद जूनियर ट्रम्प ने ग्रीनलैंड का दौरा किया था तो उनके साथ सर्जियो भी थे.
यह उदाहरण मैं इसलिए दे रहा हूं ताकि आप समझ पाएं कि नई दिल्ली में बैठ कर भी सर्जियो का दिल अमेरिका के लिए ही धड़केगा और इसमें कुछ गलत भी नहीं है. मगर रिश्तों को बेहतर बनाने की जो जिम्मेदारी उनके पास है, उसमें यदि उन्हें सफलता हासिल करनी है तो उन्हें भारत की जरूरतों को भी समझना होगा.
भारत में लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि जिस अमेरिका पर हमने भरोसा किया और रिश्तों को बेहतर बनाने की कोशिश की, क्या उसका बेहतर प्रतिसाद हमें मिला? अमेरिका आज भी पाकिस्तान की तरफदारी क्यों कर रहा है? रूस से चीन भी तेल खरीद रहा है, यूरोप गैस खरीद रहा है, खुद अमेरिका यूरेनियम पदार्थ खरीद रहा है,
फिर केवल भारत पर ही टैरिफ का हमला क्यों? अब तो 500 प्रतिशत टैरिफ की धौंस दी जा रही है. क्या विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाले देश को धौंस से नियंत्रित करना चाहता है अमेरिका? सर्जियो गोर को इन सारे सवालों के जवाब तलाशने होंगे और भारत का पक्ष भी ट्रम्प के सामने रखना होगा, तभी रिश्तों में मिठास घोलने की कोशिश में वे कामयाब हो पाएंगे. भारत की शुभकामनाएं उनके साथ हैं.