डूबते डेल्टा और संकट में देश का भविष्य?, देश की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की रीढ़

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: March 10, 2026 05:23 IST2026-03-10T05:23:53+5:302026-03-10T05:23:53+5:30

गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी और गोदावरी जैसे विशाल नदी तंत्रों ने हजारों वर्षों में अपनी लाई गई उपजाऊ मिट्टी यानी गाद से भारत के पूर्वी तट पर विशाल डेल्टाओं का निर्माण किया है.

Sinking delta and country's future in jeopardy delta is not only home to millions of people, but also the backbone of the country's food security and economy blog Pankaj Chaturvedi | डूबते डेल्टा और संकट में देश का भविष्य?, देश की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की रीढ़

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Highlightsडेल्टा न केवल करोड़ों लोगों का घर हैं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी हैं.हालिया रिपोर्टों ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है, जिसे नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है.समुद्र के स्तर के बढ़ने का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानवीय गतिविधियां मुख्य भूमिका निभा रही हैं.

भारत की नदियां वास्तव में करोड़ों लोगों के लिए जीवनदायिनी हैं लेकिन ताजा मौसमी बदलाव नदी के किनारे रहने वालों के लिए अस्तित्व का खतरा बन रहे हैं. गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी और गोदावरी जैसे विशाल नदी तंत्रों ने हजारों वर्षों में अपनी लाई गई उपजाऊ मिट्टी यानी गाद से भारत के पूर्वी तट पर विशाल डेल्टाओं का निर्माण किया है.

ये डेल्टा न केवल करोड़ों लोगों का घर हैं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी हैं. ये तटीय क्षेत्र जैव विविधता के केंद्र होने के साथ-साथ प्रकृति का एक ऐसा अनमोल संतुलन हैं जो समुद्र और जमीन के बीच एक सुरक्षा कवच का काम करते हैं. लेकिन, प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित हालिया रिपोर्टों ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है, जिसे नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है.

यह रिपोर्ट बताती है कि भारत के प्रमुख नदी डेल्टा और उनके किनारे तेजी से डूब रहे हैं. कई स्थानों पर जमीन के डूबने की दर वैश्विक समुद्र स्तर में वृद्धि की दर से भी अधिक है. यह संकट केवल जलवायु परिवर्तन और समुद्र के स्तर के बढ़ने का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानवीय गतिविधियां मुख्य भूमिका निभा रही हैं.

वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘भूमि अवतलन’ कहते हैं. इसका मतलब है जमीन का अपनी जगह पर नीचे धंस जाना. जब समुद्र का स्तर ऊपर उठता है और साथ ही साथ जमीन नीचे बैठती है, तो तटीय इलाकों पर दोतरफा खतरा मंडराने लगता है. नेचर की रिपोर्ट के अनुसार, गंगा-ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, महानदी और कृष्णा डेल्टा अत्यधिक संवेदनशील हैं.

इसका सबसे बड़ा कारण भूजल का अत्यधिक दोहन है. जब हम जमीन के नीचे से पानी निकालते हैं, तो पानी की जगह खाली हो जाती है. यह पानी मिट्टी के कणों के बीच एक दबाव बनाए रखता है. जब यह पानी निकाल लिया जाता है, तो ऊपर की मिट्टी का भार उन कणों को दबा देता है, जिससे जमीन धंसने लगती है. डेल्टा क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं, जहां खेती और उद्योगों के लिए पानी की भारी मांग है.

कोलकाता जैसे शहर, जो गंगा डेल्टा पर स्थित हैं, इसका प्रमुख उदाहरण हैं. रिपोर्ट के अनुसार, इन क्षेत्रों में जितना पानी रिचार्ज यानी फिर से भरना नहीं होता, उससे कहीं ज्यादा निकाला जा रहा है. शहर की बढ़ती प्यास को बुझाने के लिए गहरे नलकूपों का सहारा लिया जा रहा है,

जिससे भूमिगत जलस्तर खतरनाक स्तर तक गिर गया है. गंगा, ब्रह्मपुत्र, ब्राह्मणी और महानदी के किनारे डूब रहे हैं. प्रकृति की चेतावनी स्पष्ट है: विकास ऐसा हो जो नदियों के प्राकृतिक चक्र का सम्मान करे. यदि हम अपनी नदियों की रक्षा नहीं करेंगे तो वे हमें भी नहीं बचा पाएंगी.  

Web Title: Sinking delta and country's future in jeopardy delta is not only home to millions of people, but also the backbone of the country's food security and economy blog Pankaj Chaturvedi

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