मरुधरा का महासंकट: उजड़ते ओरण और अस्तित्व की लड़ाई
By पंकज चतुर्वेदी | Updated: February 6, 2026 05:44 IST2026-02-06T05:44:56+5:302026-02-06T05:44:56+5:30
सौर परियोजनाएं आज राजस्थान के ‘देव-वनों’ यानी ओरण और राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ के लिए अस्तित्व का संकट बन गई हैं.

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राजस्थान के पश्चिमी अंचल में इन दिनों एक ऐसी गूंज सुनाई दे रही है, जो आधुनिक विकास के मॉडल पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करती है. बीकानेर और जैसलमेर के रेतीले धोरों से उठा ‘खेजड़ी और ओरण बचाओ आंदोलन’ महज चंद पेड़ों को बचाने की कवायद नहीं है, बल्कि यह उस प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने की अंतिम पुकार है, जिसने सदियों से थार के मरुस्थल को जीवंत बनाए रखा है. विडंबना यह है कि जिस ‘हरित ऊर्जा’ को हम वैश्विक जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में देख रहे हैं,
वही सौर परियोजनाएं आज राजस्थान के ‘देव-वनों’ यानी ओरण और राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ के लिए अस्तित्व का संकट बन गई हैं. पश्चिमी राजस्थान में बड़े पैमाने पर लग रहे सोलर पावर प्रोजेक्ट्स के लिए हजारों की संख्या में खेजड़ी के पेड़ों को काटा जा रहा है. आरोप है कि कंपनियां जमीन साफ करने के लिए रातों-रात पेड़ों को काट रही हैं.
मरुस्थल के पर्यावरण में ‘ओरण’ की महत्ता को वैज्ञानिक और सामाजिक, दोनों ही धरातलों पर समझना आवश्यक है. ओरण वे सामुदायिक वन क्षेत्र हैं, जिन्हें लोक देवताओं के नाम पर समर्पित कर दशकों और सदियों से संरक्षित किया गया है. सरकारी दस्तावेजों में भले ही इन्हें ‘वेस्टलैंड’ (बंजर भूमि) के रूप में वर्गीकृत किया गया हो, लेकिन पारिस्थितिकी विज्ञान के नजरिये से ये ‘बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट’ हैं.
राजस्थान में लगभग 25000 ओरण स्थल हैं, जो करीब 6 लाख हेक्टेयर भूमि पर फैले हैं. ये क्षेत्र न केवल दुर्लभ वनस्पतियों के घर हैं, बल्कि लुप्तप्राय गोडावण, चिंकारा और रेगिस्तानी लोमड़ी जैसे जीवों के लिए अंतिम शरणस्थली भी हैं. यहां की जैव-विविधता अन्य मरुस्थलीय क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध है, जो पूरे क्षेत्र की सूक्ष्म-जलवायु को नियंत्रित करती है.
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मरुस्थल की रक्षा करना वैश्विक अनिवार्यता है. थार मरुस्थल में मानसून का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ओरण और खेजड़ी का विनाश इसी गति से जारी रहा, तो धूल भरी आंधियों की तीव्रता उत्तर भारत के मैदानी इलाकों, यहां तक कि दिल्ली-एनसीआर तक, कई गुना बढ़ जाएगी.
ओरण की घास और पेड़ों की कमी का सीधा अर्थ है- रेत का अनियंत्रित प्रसार. कानूनी मोर्चे पर, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि ओरण को ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ माना जाए, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में इन्हें आज भी ‘बंजर’ के रूप में दर्ज किया जाना एक बड़ी प्रशासनिक चूक है. इसी चूक का फायदा उठाकर ऊर्जा कंपनियां इन जमीनों को कौड़ियों के दाम पर लीज पर ले रही हैं.
जलवायु परिवर्तन के इस वैश्विक दौर में, जहां मरुस्थलीकरण को रोकना प्राथमिकता होनी चाहिए, वहां खेजड़ी जैसे योद्धा पेड़ों को काटना आत्मघाती कदम है. खेजड़ी की जड़ें जमीन के 30 मीटर नीचे तक जाकर मिट्टी को थामे रखती हैं और धूल भरी आंधियों की गति को नियंत्रित करती हैं.
यदि ये ‘प्राकृतिक दीवारें’ ढह गईं तो मरुस्थल का विस्तार अरावली की सीमाओं को लांघकर उत्तर भारत के मैदानी इलाकों तक पहुंचने में देर नहीं लगाएगा. जरूरत इसकी है कि सौर ऊर्जा का विकास ‘विकेंद्रीकृत’ हो - उपजाऊ ओरण और मारू वनों के बजाय छतों और बंजर पहाड़ों का उपयोग किया जाए.
विकास का वह मॉडल जो प्रकृति की कीमत पर खड़ा हो, कभी स्थायी नहीं हो सकता. विकास का पैमाना केवल ‘मेगावाट’ न हो, बल्कि उस पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा भी हो जो सदियों से हमें ऑक्सीजन, चारा और आश्रय देता आया है. मरुभूमि का पर्यावरण, उसकी जैव-विविधता और यहां की अनोखी जलवायु को बचाने के लिए ओरण को बचाना अब केवल एक क्षेत्रीय मांग नहीं,
बल्कि एक पर्यावरणीय आपातकाल बन चुका है. हमें यह समझना होगा कि बिना खेजड़ी और ओरण के, राजस्थान का मरुस्थल केवल एक तपता हुआ सौर-कांच का घर बनकर रह जाएगा, जहां जीवन के लिए कोई स्थान नहीं होगा.