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कार्बन ‘ऑफसेट’ के बिना हम जलवायु को स्थिर नहीं कर सकते, लेकिन यह करेंगे कैसे?

By भाषा | Updated: October 11, 2021 13:42 IST

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(एलिसन रीवे, ग्रेट्टन इंस्टीट्यूट के ऊर्जा एवं जलवायु परिवर्तन विभाग में कार्यक्रम उपनिदेशक)

मेलबर्न, 11 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) संघीय सरकारों द्वारा ‘ऑफसेट’ योजना का ईमानदारी से पालन नहीं किए जाने पर चिंता जताने वाली एक रिपोर्ट के जारी होने के बाद से कार्बन ‘ऑफसेट’ हाल के समय में चर्चा का विषय बन गया है।

ऑफसेट का अर्थ है कि किसी एक स्थान पर उत्सर्जन होने के बाद, किसी अन्य स्थान पर कार्बन डाईऑक्साइड को वातावरण से हटाना या उत्सर्जन कम करना। यदि इस काम को कुशल तरीके से किया जाए, तो इससे उत्सर्जन घटाने की लागत कम होती है और यदि यह काम कुशलता से नहीं किया जाए, तो लागत बढ़ जाती है और इससे शुद्ध शून्य उत्सर्जन की दिशा में हमारी प्रगति को लेकर अविश्वास पैदा होता है।

यह दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन संबंधी वार्ता का मुश्किल हिस्सा है और अतीत की समस्याओं के कारण इसकी क्षमताओं को लेकर संशय की स्थिति है।

ग्रेट्टन इंस्टीट्यूट ने शुद्ध शून्य लक्ष्यों को हासिल करने में ऑफसेट की भूमिका पर हाल में एक नई रिपोर्ट जारी की है। इसमें दिखाया गया है कि हरसंभव स्थान पर उत्सर्जन कम करने की मजबूत नीतियों के बावजूद ऑस्ट्रेलिया को शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए ऑफसेट योजनाओं की बहुत जरूरत पड़ेगी।

ऑफसेट क्या है?

ऑफसेट का काम अक्सर उन इकाइयों (क्रेडिट) के माध्यम से किया जाता है, जो उत्सर्जन में एक टन कमी या वातावरण से एक टन कार्बन डाईऑक्साइड कम किए जाने में भूमिका निभाती हैं।

उदाहरण के तौर पर, शुद्ध-शून्य लक्ष्य वाली एक खनन कंपनी अपने संचालन को समायोजित करके अपने उत्सर्जन को आंशिक रूप से कम करने में सक्षम हो सकती है, लेकिन इसके बावजूद उसे लग सकता है कि अब भी ऐसे उत्सर्जन हैं जिन्हें कम करना बहुत महंगा है या तकनीकी रूप से असंभव है। ऐसी स्थिति में वह इन उत्सर्जन के एवज में एक ‘‘ऑफसेट’ खरीद सकती है। यह ऑफसेट किसी ऐसी कंपनी में निवेश करके खरीदा जा सकता है, जो कार्बन उत्सर्जन के काम में मदद करती है या वृक्षारोपण जैसी गतिविधियों से ऑफसेट संबंधी गतिविधियां की जा सकती हैं।

कार्बन ऑफसेट एक संवेदनशील विषय क्यों है?

कुछ लोगों का मानना है कि यह प्रदूषण पैदा करने वाली कंपनियों के लिए उत्सर्जन कम करने के तरीकों को टालने का एक बहाना है, जबकि अन्य का कहना है कि यह ग्रामीण समुदायों के ताने-बाने को नष्ट कर देता है, क्योंकि यह किसानों को प्रोत्साहित करता है कि वे अपनी खेती की जमीन का इस्तेमाल वृक्षारोपण एवं कार्बन को अवशोषित करने वाली अन्य गतिविधियों के लिए करें।

ऑफसेट गतिविधियों का एक काम उत्सर्जन कम करने की लागत को घटाना है। अन्य शब्दों में कहें, तो मैं जिन तकनीकों से कार्बन उत्सर्जन कम करता हूं, यदि आपके पास इसके विकल्प में अपेक्षाकृत सस्ते साधन हैं, तो मुझे, तकनीकी लागत कम होने तक आपको इसके लिए भुगतान करना उचित लगेगा।

लेकिन उत्सर्जन में कमी करने या उसे हटाने की बहुत अधिक गतिविधियों के लिए ‘क्रेडिट’ दिए गए हैं, लेकिन वास्तव में ऑफसेट गतिविधियों से लाभ नहीं हुआ हो, तो हमें शुद्ध शून्य की दिशा में आगे बढ़ने का झूठा एहसास होता है और अपेक्षाकृत लागत भी बढ़ जाती है।

सरकारों को अनुसंधान एवं विकास और प्रारंभिक चरण के प्रौद्योगिकी विकास में निवेश करना चाहिए। हालांकि ये प्रौद्योगिकियां बहुत महंगी हैं और बड़े पैमाने पर काम नहीं कर सकतीं, लेकिन 2050 के बजाय हमारे लिए इन्हें अभी खोजना बेहतर होगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारों को उत्सर्जन कम करने के लिए मजबूत नीतियां बनानी चाहिए। ग्रेट्टन इंस्टीट्यूट की ‘शुद्ध शून्य की ओर’ श्रृंखला की पिछली रिपोर्ट में परिवहन, उद्योग और कृषि से होने वाले उत्सर्जन में कटौती की सिफारिश की गई हैं।

ऑफसेट संबंधी गतिविधियों के लिए ईमानदारी आवश्यक है।

हमें उत्सर्जन कम करने के लिए ऑफसेट संबंधी गतिविधियों की स्पष्ट रूप से, आवश्यकता हैं, लेकिन ऐसा ईमानदारी से किया जाना चाहिए। समस्याओं को लेकर पारदर्शी होना और उन्हें जल्दी से सुलझाने के लिए आगे बढ़ना सबसे अच्छा समाधान है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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