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जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी के भविष्य पर अब तक का सबसे गंभीर रिपोर्ट कार्ड

By भाषा | Updated: August 10, 2021 15:39 IST

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पेप कैनाडेल, मार्क हेमर, माइकल ग्रोस, सीएसआईआरओ, जोएल गेर्गिस, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी और माल्टे मीनशॉसेन, मेलबर्न विश्वविद्यालय

कैनबरा 10 अगस्त (द कन्वरसेशन) इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की अब तक की सबसे गंभीर रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व-औद्योगिक समय के बाद से पृथ्वी का तापमान 1.09 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है और कई बदलाव जैसे कि समुद्र के स्तर में वृद्धि और ग्लेशियर का पिघलना अब लगभग अपरिवर्तनीय है।

रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि मानव जनित जलवायु परिवर्तन से बचना अब संभव नहीं है। जलवायु परिवर्तन अब पृथ्वी पर हर महाद्वीप, क्षेत्र और महासागर और मौसम के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है।

1988 में पैनल के गठन के बाद से लंबे समय से प्रतीक्षित रिपोर्ट अपनी तरह का छठा आकलन है। यह नवंबर में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में होने वाले महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन से पहले दुनिया के नेताओं को जलवायु परिवर्तन के बारे में सबसे सामयिक, सटीक जानकारी देगा।

आईपीसीसी संयुक्त राष्ट्र और विश्व मौसम विज्ञान संगठन का चरम जलवायु विज्ञान निकाय है। यह पृथ्वी की जलवायु की स्थिति और मानव गतिविधियाँ इसे कैसे प्रभावित करती हैं, पर राय देने वाला वैश्विक प्राधिकार है। हम नवीनतम आईपीसीसी रिपोर्ट के लेखक हैं और हमने दुनिया भर के हजारों वैज्ञानिकों के काम से मिली जानकारी के आधार पर इस मूल्यांकन को तैयार किया है।

अफसोस की बात है कि आज जारी किए गए 3,900 पन्नों के दस्तावेज में शायद ही कोई अच्छी खबर है। लेकिन अगर मानवता चाहे तो सबसे खराब नुकसान को टालने का समय अभी भी है।

यह स्पष्ट है: मनुष्य ग्रह को गर्म कर रहे हैं

पहली बार, आईपीसीसी स्पष्ट रूप से कहता है - संदेह के लिए बिल्कुल कोई जगह नहीं छोड़ते हुए - मनुष्य वातावरण, भूमि और महासागरों में महसूस की गई वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं।

आईपीसीसी ने पाया कि पृथ्वी की वैश्विक सतह का तापमान 1850-1900 से पिछले दशक के बीच 1.09 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। यह 2013 में पिछली आईपीसीसी रिपोर्ट की तुलना में 0.29 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म है। (यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि 0.1 डिग्री सेल्सियस वृद्धि डेटा सुधार के कारण है।)

आईपीसीसी पृथ्वी की जलवायु में प्राकृतिक परिवर्तनों की भूमिका को मानती है। हालांकि, यह पाया गया कि 1.09 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि में से 1.07 डिग्री सेल्सियस का तापमान मानवीय गतिविधियों से जुड़ी ग्रीनहाउस गैसों के कारण बढ़ा है। दूसरे शब्दों में, लगभग तमाम ग्लोबल वार्मिंग मनुष्यों के कारण हैं।

कम से कम पिछले 2,000 वर्षों में किसी भी अन्य 50-वर्ष की अवधि की तुलना में 1970 के बाद से अब तक के 50 वर्ष में वैश्विक सतह का तापमान तेजी से गर्म हुआ है, साथ ही यह वार्मिंग 2,000 मीटर से नीचे समुद्र की गहराई तक पहुंच रही है।

आईपीसीसी का कहना है कि मानवीय गतिविधियों ने वैश्विक वर्षा (बारिश और हिमपात) को भी प्रभावित किया है। 1950 के बाद से, कुल वैश्विक वर्षा में वृद्धि हुई है, लेकिन कुछ क्षेत्र ज्यादा गीले हो गए हैं, जबकि अन्य सूखे हो गए हैं।

अधिकांश भू क्षेत्रों में भारी वर्षा की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हुई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि गर्म वातावरण अधिक नमी धारण करने में सक्षम है - प्रत्येक अतिरिक्त तापमान के लिए लगभग 7% अधिक - जो गीले मौसम और वर्षा की घटनाओं को बढ़ाता है।

सीओ2 की उच्च सांद्रता, तेजी से बढ़ रही है वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) की वर्तमान वैश्विक सांद्रता अधिक है और कम से कम पिछले 20 लाख वर्षों में किसी भी समय की तुलना में तेजी से बढ़ रही है।

औद्योगिक क्रांति (1750) के बाद से जिस गति से वायुमंडलीय सीओ2 में वृद्धि हुई है, वह पिछले 800,000 वर्षों के दौरान किसी भी समय की तुलना में कम से कम दस गुना तेज है, और पिछले पांच करोड़ 60 लाख वर्षों की तुलना में चार से पांच गुना तेज है।

लगभग 85% सीओ2 उत्सर्जन जीवाश्म ईंधन के जलने से होता है। शेष 15% भूमि उपयोग परिवर्तन, जैसे वनों की कटाई और क्षरण से उत्पन्न होते हैं।

अन्य ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता भी कुछ बेहतर नहीं है। मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड दोनों, सीओ2 के बाद ग्लोबल वार्मिंग में दूसरे और तीसरे सबसे बड़े योगदानकर्ता हैं, वे भी तेजी से बढ़े हैं।

मानव गतिविधियों से मीथेन उत्सर्जन बड़े पैमाने पर पशुधन और जीवाश्म ईंधन उद्योग से आता है। नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन मुख्य रूप से फसलों पर नाइट्रोजन उर्वरक के उपयोग से होता है।

चरम मौसम बढ़ रहा है

आईपीसीसी इस बात की पुष्टि करता है कि 1950 के बाद से अधिकांश भूमि क्षेत्रों में गर्म चरम, हीटवेव और भारी बारिश भी लगातार और तीव्र हो गई है।

रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि हाल ही में कुछ गर्म चरम सीमाओं को देखा गया है, जैसे कि 2012-2013 की ऑस्ट्रेलियाई गर्मी, जो जलवायु पर मानव प्रभाव के बिना एकदम नामुमकिन है।

जटिल चरम घटनाओं में पहली बार मानव प्रभाव का भी पता चला है। उदाहरण के लिए, एक ही समय में होने वाली हीटवेव, सूखा और आग लगने की घटनाएं अब अधिक बार होती हैं। इन मिश्रित घटनाओं को ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी यूरोप, उत्तरी यूरेशिया, अमेरिका के कुछ हिस्सों और अफ्रीकी उष्णकटिबंधीय जंगलों में देखा गया है।

महासागर: गर्म, ऊंचे और अधिक अम्लीय

महासागर 91% ऊर्जा को वायुमंडलीय ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि से अवशोषित करते हैं। इसने समुद्र के गर्म होने और अधिक समुद्री हीटवेव को जन्म दिया है, खासकर पिछले 15 वर्षों में।

समुद्री गर्मी की बढ़वार समुद्री जीवन की सामूहिक मृत्यु का कारण बनती हैं, जैसे कि कोरल ब्लीचिंग की घटनाओं से। वे शैवाल के बनने और प्रजातियों की संरचना में बदलाव का कारण भी बनते हैं। भले ही दुनिया वार्मिंग को 1.5-2.0 तक सीमित कर दे, जैसा कि पेरिस समझौते के अनुरूप है, सदी के अंत तक समुद्री हीटवेव चार गुना अधिक हो जाएगी।

बर्फ की चादरें और हिमनद पिघलने और गर्म होने के कारण समुद्र के पानी के फैलने के साथ-साथ, 1901 और 2018 के बीच वैश्विक औसत समुद्र स्तर में 0.2 मीटर की वृद्धि हुई है। लेकिन, महत्वपूर्ण बात यह है कि समुद्र का स्तर बढ़ने की गति भी बढ़ रही है: यह 1.3 मिलीमीटर प्रति वर्ष रही 1901-1971 के दौरान, 1971-2006 के दौरान प्रति वर्ष 1.9 मिमी और 2006-2018 के दौरान 3.7 मिमी प्रति वर्ष।

सीओ2 बढ़ने के कारण महासागर का अम्लीकरण सभी महासागरों में हुआ है और दक्षिणी महासागर और उत्तरी अटलांटिक में 2,000 मीटर से अधिक गहराई तक पहुंच रहा है।

कई बदलाव अपरिवर्तनीय हो चुके हैं

आईपीसीसी का कहना है कि अगर पृथ्वी की जलवायु को जल्द स्थिर कर दिया जाए, तब भी जलवायु परिवर्तन के कारण जो क्षति हो चुकी है, उसे सदियों या सहस्राब्दियों तक भी ठीक नहीं किया जा सकेगा। उदाहरण के लिए, इस सदी में 2 डिग्री सेल्सियस की ग्लोबल वार्मिंग से 2,000 वर्षों में औसत वैश्विक समुद्र स्तर में दो से छह मीटर की वृद्धि होगी, और अधिक उत्सर्जन होने पर और भी ज्यादा।

विश्व स्तर पर, ग्लेशियर 1950 से लगातार घट रहे हैं और वैश्विक तापमान के स्थिर होने के बाद दशकों तक इनके पिघलते रहने का अनुमान है। इसी तरह सीओ2 उत्सर्जन बंद होने के बाद भी गहरे समुद्र का अम्लीकरण हजारों वर्षों तक बना रहेगा।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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