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जलवायु परिवर्तन पर पीव का नया सर्वेक्षण लोगों के बेहद चिंतित होने,लेकिन गहरे वैचारिक मतभेद दिखाता है

By भाषा | Updated: September 15, 2021 14:37 IST

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(केट टी लोंग, एड मायबैच एंड जॉन कोचर,जॉर्ज मैंशन यूनिवर्सिटी)

फेयरफैक्स सिटी (अमेरिका),15 सितंबर (द कन्वरसेशन) पीव शोध केन्द्र की ओर से हाल में किए गए एक नए सर्वेक्षण में पता चला है कि विकसित देशों में जलवायु परिवर्तन पर लोगों के विचारों में बदलाव आया है।

अध्ययन में विकसित अर्थव्यवस्था माने जाने वाले 17 देशों के 16 हजार से अधिक वयस्कों को शामिल किया गया। इनमें से कई देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बड़े योगदान दे रहे हैं और ऐसा माना जा रहा है कि इसमें सफलता पाने मे वे अग्रणी रहेंगे।

आमतौर पर सर्वेक्षण में पाया गया कि बड़ी संख्या में लोग वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रति चिंतित हैं और इसके प्रभावों को कम करने के लिए जीवनशैली में बदलाव लाने के लिए तैयार हैं। इस व्यापक पैटर्न में अधिक जटिल रुख भी समाहित है। मसलन इस बात पर संदेह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय प्रभावी तरीके से जलवायु परिवर्तन को कम कर सकेगा अथवा नहीं। इसके अलावा वैचारिक तौर पर लोगों के बीच मदभेद हैं जो स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने और जलवायु अनुकूल विश्व बनने की राह में बाधा बन सकते हैं।

गहरी चिंताएं और कार्रवाई करने की इच्छा

स्वीडन को छोड़कर 2021 की शुरुआत में जिन देशों में सर्वेक्षण किए गए वहां 60 से 90 प्रतिशत लोगों ने इस बात पर बेहद चिंता जताई कि जलवायु परिवर्तन से उनपर व्यक्तिगत तौर पर किस प्रकार का खतरा आ सकता है। वहीं 2015 से अब तक देशों में इससे संबंधित चिंताएं बढ़ने के स्पष्ट संकेत हैं। उस वक्त भी पीव ने इस मुद्दे पर सर्वेक्षण किया था।

इसी प्रकार से जापान को छोड़कर लगभग सभी देशों में दस में से सात लोगों ने कहा कि वे अपने रहने और कामकाज के तरीकों में बदलाव लाने के लिए तैयार हैं ताकि इससे जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद मिल सके।

सभी देशों से जो दिलचस्प बात सामने आई वह यह कि युवा वर्ग ने बुजुर्गों की अपेक्षा इसके प्रति अत्यधिक चिंता जताई और अपने बर्ताव में भी बदलाव लाने के प्रति उनमें कोई हिचक नहीं दिखाई दी।

सरकारों की प्रतिक्रिया को ले कर क्या सोच है?

यह स्पष्ट है कि वैश्विक स्तर पर लोग इससे जुड़े खतरे को लेकर बेहद चिंतित हैं और इससे निपटने के लिए अथवा इसके प्रभावों को कम करने के लिए अपनी दैनिक गतिविधियों में भी बदलाव लाने के लिए तैयार हैं। व्यक्तिगत बरताव में बदलाव भर से ग्लोबल वॉर्मिंग को नहीं रोका जा सकता।

उदाहरण के लिए अमेरिका में लगभग 74 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जीवाश्म ईंधन के दहन से होता है। लोग इलेक्ट्रिक वाहन चला सकते हैं या इलेक्ट्रिक बस और ट्रेन की सेवा ले सकते हैं, लेकिन उन्हें अभी भी बिजली की जरूरत है। नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ रुख करने के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीति-स्तर में बदलाव की आवश्यकता है।

जब हम लोगों के दृष्टिकोण को देखते हैं कि उनका अपना देश जलवायु परिवर्तन से कैसे निपट रहा है और अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई कितनी प्रभावी होगी ,तो परिणाम एक अधिक जटिल तस्वीर पेश करते हैं। अधिकांश लोगों ने कहा कि उनकी सरकारें इससे निपटने के लिए अच्छा प्रयास कर रही हैं। ऐसे विचार रखने वाले लोगों में अधिकतर स्वीडन ,ब्रिटेन,सिंगापुर और न्यूजीलैंड के लोग हैं।

जलवायु परिवर्तन से जुड़े गहरे वैचारिक मतभेद

जलवायु परिवर्तन से जुड़े अधिकतर सर्वेक्षणों की ही भांति पीव के इस सर्वेक्षण ने दिखाया है कि कई देशों में इस पर गंभीर वैचारिक मतभेद हैं।

अमेरिका में एक प्रश्न को छोड़कर सभी पर वैचारिक मतभेदों उजागर होते हैं। अमेरिका में 87 प्रतिशत उदारवादी जलवायु परिवर्तन से होने वाले व्यक्तिगत नुकसान के बारे में कुछ हद तक या बहुत चिंतित हैं, जबकि केवल 28 प्रतिशत रूढ़िवादियों ने इससे सहमति जताई है। उनमें 59 बिंदुओं पर मतभेद है। यह मतभेद किसी की जीवन शैली में बदलाव की इच्छा, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सरकार के तरीके और अंतरराष्ट्रीय कार्रवाइयों के कथित आर्थिक प्रभाव आदि मुद्दों पर हैं।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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