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भारत और अमेरिका स्वाभाविक साझेदार हैं, खासतौर पर शिक्षा के क्षेत्र में: धर्मेंद्र प्रधान

By भाषा | Updated: November 11, 2021 10:15 IST

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(ललित के. झा)

वाशिंगटन,11 नवंबर केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि भारत और अमेरिका स्वाभाविक सहयोगी हैं, खासतौर पर शिक्षा के क्षेत्र में, और दोनों देशों के शिक्षण संस्थानों के बीच सहयोग को मजबूत करने की अपार संभावनाएं हैं।

प्रधान ने बुधवार को ‘एडवांसिंग इंडिया-यूएस एजुकेशन पार्टनरशिप’ में अपने संबोधन में यह बात कही। यह गोलमेज बैठक भारतीय दूतावास ने न्यूयॉर्क, शिकागो, सैन फ्रांसिस्को, ह्यूस्टन और अटलांटा के वाणिज्य दूतावास के सहयोग से आयोजित की थी।

प्रधान ने कहा, “भारत और अमेरिका स्वाभाविक साझेदार हैं,खासतौर पर शिक्षा के क्षेत्र में। भारत और अमेरिका के शिक्षण संस्थानों के बीच सहयोग को मजबूत करने की अपार संभावनाएं हैं। इनमें उद्योगों, शैक्षणिक समुदाय और नीति-निर्मातों को आपस में जोड़ना़ शामिल हैं।’’

उन्होंने कहा कि भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने शिक्षकों और छात्रों की दुनिया में कहीं भी जाने भी राह आसान की है और यह शोध साझेदारियों तथा आपसी लाभकारी शिक्षा सहयोग को भी प्रोत्साहन देती है।

उन्होंने कहा, ‘‘ग्लासगो में सीओपी26 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के साथ समन्वय के लिए, भारत की शिक्षा प्रणाली को वैश्विक आकांक्षाओं के साथ तालमेल बैठाने वाला होना चाहिए और एनईपी 2020 इस तरह के तालमेल को मंजूरी देता है।’’

इस गोलमेज सम्मेलन में 20 अमेरिकी विश्वविद्यालयों के अध्यक्ष, कुलपतियों और प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें कोलोराडो विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, राइस विश्वविद्यालय और इलिनोइस विश्वविद्यालय आदि शामिल थे।

सभी अमेरिकी प्रतिभागियों ने सहमति व्यक्त की कि एनईपी2020 स्वागत योग्य घोषणा है और शिक्षा के क्षेत्र से प्रतिबंधों, विशेष रूप से नौकरशाही संबंधी बाधाओं को हटाना, भारत और अमेरिका दोनों के लिए सभी मोर्चों, खासकर आर्थिक स्तर पर पारस्परिक रूप से फायदेमंद होगा।

अधिकतर अमेरिकी विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों ने कहा कि वे साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बायोटेक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विज्ञान, कृषि, जलवायु परिवर्तन और स्थिरता जैसे कुछ विशिष्ट विषयों पर भारत के साथ साझेदारी करना चाहेंगे।

अमेरिका में भारत के राजदूत तरणजीत सिंह संधू ने अपने संबोधन में कहा कि पूरे भारत में 150 से अधिक विश्वविद्यालयों ने ‘अंतरराष्ट्रीय मामला कार्यालय’ की स्थापना की है।

उन्होंने कहा कि भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध में आगे बढ़ने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। सामान्य शिक्षा में ‘इंटर्नशिप’ के लिए नियम लागू किए गए हैं। सरकार देश में अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को और बेहतर बनाने के लिए एक राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन स्थापित करने चाहती है।

संधू ने कहा, ‘‘ यह सब अमेरिकी संस्थानों को बड़े अवसर प्रदान करता है। ....अमेरिकी छात्र भारतीय संस्थानों में ‘शॉर्ट टर्म कोर्स’ या कुछ सेमेस्टर की पढ़ाई कर सकते हैं। हमारे पास निश्चित रूप से अधिक छात्र और अकादमिक आदान-प्रदान के साथ-साथ संयुक्त शोध कार्यक्रम भी उपलब्ध हो सकते हैं। दोनों देशों के शिक्षण संस्थान अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और हिंद-प्रशांत सहित कई देशों में संयुक्त परियोजनाओं का विस्तार कर सकते हैं। दोनों देशों के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व ने भी इस बारे में बात की है।’’

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष डीपी सिंह, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के अध्यक्ष अनिल डी सहस्रबुद्धे, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश कुमार और अन्य ने भी गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लिया।

भारतीय वक्ताओं ने कहा कि यह भारत-अमेरिका साझेदारी और उनकी रुचि के सामान्य क्षेत्रों का लाभ उठाने का यह सही समय है, जिसमें शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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