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बंदूक के प्रति हॉलीवुड के प्रेम से ‘पर्दे और वास्तविक’ जिंदगी में गोलीबारी के खतरे की आशंका बढ़ी

By भाषा | Updated: October 24, 2021 14:22 IST

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(ब्रैड बुशमैन, ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी और डैन रोमर, रिसर्च डायरेक्टर, यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया)

कोलंबस (अमेरिका), 24 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) अमेरिका में एक बेहद दुखद घटनाक्रम में अभिनेता एलेक बाल्डविन ने 21 अक्टूबर, 2021 को न्यू मैक्सिको में फिल्म के सेट पर फिल्मांकन के लिए रखी बंदूक से एक सिनेमैटोग्राफर को गोली मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई। घटना में फिल्म के निर्देशक भी घायल हुए थे।

फिल्म ‘रस्ट’ के फिल्मांकन के दौरान ऐसा क्या गलत हुआ, इसका अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी। हालांकि, यह घटना एक सामान्य तथ्य को उजागर करती है कि हॉलीवुड फिल्मों में बंदूक का इस्तेमाल आम है।

जन संचार और जोखिम व्यवहार के छात्र के रूप में हमने पर्दे पर हथियारों के बढ़ते प्रचलन का अध्ययन किया है और स्वीकारते हैं कि फिल्मों में जितनी अधिक बंदूकें इस्तेमाल होंगी, उतनी ही अधिक ‘‘रील और वास्तविक’’ दुनिया में गोलीबारी की संभावना होगी। समय के साथ हॉलीवुड फिल्मों में बंदूक से होने वाले हिंसक दृश्य नाटकीय रूप से बढ़ते जा रहे हैं।

हमारे शोध में यह पता चला है कि 1985 के बाद से 30 साल से अधिक समय में फिल्मों में बंदूक की हिंसा में तीन गुना इजाफा हुआ है। कुछ इसी तरह का चलन टीवी धारावाहिकों में भी देखने को मिला है और 2000 एवं 2018 के दौरान प्राइम टाइम के धारावाहिकों में बंदूक की हिंसा के दृश्यों की दर दोगुनी हो गई।

जाहिर तौर पर मनोरंजन उद्योग में हिंसक दृश्यों को दर्शाना कोई नयी बात नहीं है। 1950 के दशक के पश्चिमी देशों के टीवी धारावाहिकों में भी बंदूकें खूब दिखती थीं। फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में इन दृश्यों का दरअसल इस वास्तविकता से संबंध है कि हिंसा दर्शकों का ध्यान खींचती है और हिंसा को नाटकीय रूप से दर्शाने में बंदूक आसान तरीका है।

हम यह भी जानते हैं कि बंदूक कंपनियां अपने उत्पाद को फिल्मों में दिखाने के लिए प्रोडक्शन कंपनियों को भुगतान करती हैं और बंदूक को ‘शान’ की तरह दिखाया जाता है।

हॉलीवुड में बंदूक के फिल्मांकन से जो संभावित नुकसान हुआ है वह फिल्म के सेट पर हुए हादसे से भी बढ़कर है। अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि महज बंदूक वाले दृश्य को देखने से ही दर्शकों में क्रोध की भावना बढ़ जाती है जिसे ‘‘हथियार का प्रभाव’’ कहते हैं।

कई अध्ययनों में यह पता चला है कि जिन फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों में बंदूक वाले दृश्य होते हैं उनसे अक्सर दर्शकों में गुस्से की भावना भरती है और वे दूसरों के दर्द और तकलीफ के प्रति भावनाशून्य हो जाते हैं।

बच्चे इसका आसान शिकार बनते हैं। छोटे बच्चे फिल्मों के किरदारों को अपना आदर्श मान बैठते हैं और उन्हीं तरह व्यवहार करते हैं। फिल्मों में धूम्रपान और शराब पीने के दृश्य देखकर बच्चे भी ऐसा करने लगते हैं। आठ से 12 साल की उम्र के बच्चों पर ऐसा ही एक अध्ययन किया गया जिसमें कुछ बच्चों को बंदूक के दृश्यों वाली फिल्म दिखाई गई तो कुछ की फिल्मों से हिंसक दृश्य हटा दिए गए।

इसके बाद उन्हें खिलौनों से भरे कमरे में बंद कर दिया गया और कैमरे से उनकी गतिविधि पर नजर रखा गया। कमरे की एक अलमारी में असली लेकिन खाली बंदूकें रखी थीं। कैमरे की मदद से यह देखा गया कि बच्चों ने कितनी बार बंदूक का ट्रिगर दबाया। अधिकतर बच्चों (72 प्रतिशत) ने दराज खोला और बंदूकें उठाईं। लेकिन जिन बच्चों ने बंदूक वाले दृश्य देखे थे उन्होंने अधिक समय तक बंदूकें रखीं।

हिंसा को दर्शाना या उसे ग्लैमराइज करना?

दुनिया में अमेरिकी समाज में लोगों के पास सबसे अधिक बंदूकें हैं जिनकी आबादी दुनिया की आबादी का महज चार फीसदी है जबकि दुनिया में मौजूद बंदूक का लगभग आधा अमेरिकी नागरिकों के पास है। दरअसल बंदूकों का इतना अधिक फिल्मांकन समाज की वास्तविकता को नहीं दर्शाता है बल्कि यह हथियारों की बिक्री को बढ़ावा देता है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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