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सीओपी26: दुनिया की सेनाएं अपने विशाल कार्बन उत्सर्जन को कैसे छिपाती हैं

By भाषा | Updated: November 10, 2021 16:21 IST

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दॉ वियर, किंग्स कॉलेज, लंदन, बेंजामिन नेमार्क, लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी और ओलिवर बेल्चर, डरहम यूनिवर्सिटी

लंदन, 10 नवंबर (द कन्वरसेशन) जलवायु परिवर्तन नेतृत्व के लिए उत्तेजक भाषणों से कुछ ज्यादा की जरूरत होती है। इसका अर्थ है कठोर सत्य का सामना करना। एक सच्चाई जिससे दुनिया भर की सरकारें जूझ रही हैं, वह है जलवायु संकट में उनकी सेना का भारी योगदान।

उदाहरण के लिए, अमेरिकी रक्षा विभाग दुनिया में जीवाश्म ईंधन का सबसे बड़ा संस्थागत उपभोक्ता है - और सबसे बड़ा संस्थागत उत्सर्जक है।

हम में से दो ने 2019 के एक अध्ययन पर काम किया, जिसमें दिखाया गया था कि अगर अमेरिकी सेना एक देश होती, तो इसका ईंधन उपयोग इसे दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का 47 वां सबसे बड़ा उत्सर्जक बना देता।

दूसरे शब्दों में, ग्लासगो में सीओपी26 शिखर सम्मेलन में एकत्रित कई औद्योगिक देशों की तुलना में अमेरिकी सेना एक अधिक बड़ा जलवायु खिलाड़ी है।

सेनाओं की बड़ी भूमिका के बावजूद, हम आश्चर्यजनक रूप से उनके उत्सर्जन के बारे में बहुत कम जानते हैं।

यह उनकी पहुंच और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को देखते हुए उल्लेखनीय है। कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि, एक साथ, सेना और उनके सहायक उद्योग वैश्विक उत्सर्जन का 5 प्रतिशत तक का योगदान कर सकते हैं: नागरिक उड्डयन और शिपिंग के संयुक्त उत्सर्जन से भी अधिक।

एक कारण जो हम इसके बारे इतना कम जानते हैं, वह यह है कि सेना अंतिम अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों में से एक है, जिसके उत्सर्जन को संयुक्त राष्ट्र को सूचित करने की आवश्यकता नहीं है।

इसका श्रेय अमेरिका ले सकता है।

1997 में, इसकी वार्ता टीम ने क्योटो जलवायु समझौते के तहत एक व्यापक सैन्य छूट हासिल की।

अगले वर्ष सीनेट में बोलते हुए, जलवायु के लिए अब विशेष राष्ट्रपति दूत, जॉन केरी ने इसे ‘‘एक शानदार काम’’ के रूप में सम्मानित किया।

वर्तमान में, 46 देश और यूरोपीय संघ जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के तहत अपने राष्ट्रीय उत्सर्जन पर वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए बाध्य हैं।

2015 के पेरिस समझौते ने क्योटो की सैन्य छूट को हटा दिया लेकिन सैन्य उत्सर्जन की रिपोर्टिंग को स्वैच्छिक छोड़ दिया।

इस सैन्य उत्सर्जन अंतर में हमारे शोध ने पहली बार वैश्विक सैन्य उत्सर्जन रिपोर्टिंग की गंभीर स्थिति पर प्रकाश डाला है।

अंडर-रिपोर्टिंग मानदंड है, जैसा कि डेटा है जो पहुंच योग्य नहीं है, या गैर-सैन्य स्रोतों के साथ एकत्रित है।

उदाहरण के लिए, कनाडा कई आईपीसीसी श्रेणियों के तहत अपने उत्सर्जन की रिपोर्ट करता है, सामान्य परिवहन के तहत सैन्य उड़ानों की रिपोर्ट करता है, और अपने सैन्य ठिकानों के लिए ऊर्जा को वाणिज्यिक/संस्थागत उत्सर्जन के तहत रखता है ।

यूएनएफसीसीसी को सालाना रिपोर्ट नहीं करने वाले कई देशों द्वारा र्सैन्य उत्सर्जन की रिपोर्टिंग और भी खराब है।

इसमें चीन, भारत, सऊदी अरब और इज़राइल जैसे बड़े सैन्य बजट वाले देश शामिल हैं।

1997 में उस ‘‘शानदार काम’’ ने दुर्भाग्य से एक लंबी छाया डाली है।

2020 में, वैश्विक सैन्य व्यय लगभग 2 खरब अमरीकी डालर तक पहुंच गया, और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इन डॉलर की कार्बन लागत से काफी हद तक बेखबर है, चाहे वे कहीं भी खर्च किए जाएं।

पृथ्वी के वायुमंडल पर यह विशाल सैन्य छाप सीओपी26 के औपचारिक एजेंडे में नहीं है।

हालाँकि, उम्मीद है कि यह अगले साल सीओपी27 में होगा, क्योंकि देशों ने अपने विशाल सैन्य कार्बन बूटप्रिंट के बारे में सोचना शुरू किया है।

जून में, सैन्य गठबंधन नाटो ने घोषणा की कि वह ‘‘2050 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य में योगदान करने के लिए’’ ठोस लक्ष्य निर्धारित करेगा।

इस बीच, स्विटजरलैंड और यूके जैसे देश, जिन्होंने शुद्ध शून्य लक्ष्य निर्धारित करते हुए घरेलू कानून पारित किया है, उन्हें अंततः इस असहज सच्चाई का सामना करना पड़ रहा है कि उनके रक्षा मंत्रालय सरकार के भीतर सबसे बड़े संस्थागत उत्सर्जक हैं।

युद्ध एक गंदा व्यवसाय है।

सेनाएं संस्थागत रूप से जटिल हैं, और खरीद चक्र दशकों तक चलते हैं, जो उत्सर्जन को ‘‘लॉक इन’’ कर सकते हैं। चीजें रातों-रात नहीं बदलेगी, लेकिन जो वे गिनते नहीं हैं, वह हम देख नहीं सकते। और जो हम नहीं देख सकते, वे उसमें कटौती करेंगे नहीं।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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