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क्या फाइजर या मॉडर्ना के टीके हमारे आनुवांशिक कोड को प्रभावित कर सकते हैं?

By भाषा | Updated: June 26, 2021 16:18 IST

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(आर्चा फॉक्स, द यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया ; जेन मार्टिन, द यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न, और त्राउदे मेइजार्ज, मोनाश यूनिवर्सिटी)

पर्थ/मेलबर्न, 26 जून (द कन्वरसेशन) फाइजर और मॉडर्ना के टीके इस साल आस्ट्रेलिया के कोविड-19 टीकाकरण अभियान के मुख्य टीके होने वाले हैं। इस हफ्ते जारी सरकार के नवीनतम अनुमानों में यह कहा गया है।

सितंबर से फाइजर टीके की औसतन 13 लाख खुराक के अलावा मॉडर्ना टीके की 1,25,000 खुराक (जिसे मंजूरी मिलनी बाकी है) प्रति सप्ताह उपलब्ध होने की उम्मीद है। ये आंकड़े अक्टूबर से बढ़ने वाले हैं क्योंकि एस्ट्राजेनेका टीके का उपयोग घटा दिया गया है।

फाइजर और मॉडर्ना, दोनों ही टीके एम-आरएनए टीके हैं जिनमें ‘‘मैसेंजर रिबोन्यूक्लिक एसिड’’ नाम के आनुवांशिंक पदार्थ के अंश हैं। और यदि सोशल मीडिया पर चल रही चर्चा पर गौर करें, तो कुछ लोगों ने इन टीकों का उनके आनुवांशिक कूट (जेनेटिक कोड) पर प्रभाव पड़ने को लेकर चिंता जताई है।

यह मिथक सामने आने से जुड़े कुछ बिंदु इस प्रकार हैं:--

एम-आरएनए टीके कैसे काम करते हैं?

इस प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल फाइजर और मॉडर्ना टीकों में इस तरह से किया गया है कि वे आपकी कोशिकाओं को कोरोना वायरस स्पाइक प्रोटीन बनाने का अस्थायी निर्देश दे सकें। यह प्रोटीन सार्स-कोवी-2 की सतह पर पाया जाता है। यह विषाणु कोविड-19 के लिए जिम्मेदार है। यह टीका आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को वायरस के हमले से आपकी रक्षा करना सिखाता है।

टीके में मौजूद एम-आरएनए आपके शरीर की कोशिकाओं से लिया जाता है। हमारी कोशिकाएं प्राकृतिक रूप से हर वक्त हमारे हजारों एम-आरएनए बनाते हैं। टीके में मौजूद एम-आरएनए जब कोशिका द्रव्य (साइटोप्लाज्म) में जाता है तब इसका उपयोग सार्स- कोवी-2 स्पाइक प्रोटीन बनाने में होता है।

एम-आरएनए आपके आनुवांशिक कूट में प्रवेश क्यों नहीं कर सकता है, उसका जवाब इस प्रकार है:-

आपका आनुवांशिक कूट अलग-अलग बना हुआ है लेकिन डीएनए से संबद्ध है। और एम-आरएनए दो कारणों से आपके डीएनए में प्रवेश नहीं कर सकता है।

पहला, यह कि दोनों अणुओं का अलग-अलग स्वभाव है। यदि एम-आरएनए नियमित रूप से आपके डीएनए में प्रवेश करेगा तो यह आपके शरीर में प्रोटीन के उत्पादन को प्रभावित करेगा और यह आपके जीनोम को बेतरतीब कर देगा, जो आपके भविष्य की कोशिकाओं और पीढ़ियों तक जाएगा।

दूसरा, यह कि वैक्सीन एम-आरएनए और डीएनए, दोनों कोशिका के अलग-अलग हिस्से हैं। हमारा डीएनए केंद्रक में रहता है। लेकिन वैक्सीन एम-आरएनए सीधे कोशिका द्रव्य (साइटोप्लाज्म) में प्रवेश करता है। हम ऐसे किसी वाहक अणु के बारे में नहीं जानते हैं जो एम-आरएन को केंद्रक में ले जाए।

लेकिन क्या कुछ अपवाद हैं?

कुछ अत्यंत ही दुर्लभ अपवाद हैं। एक यह कि ‘रेट्रो-ट्रांसपोसंस’ नाम के आनुवांशिक तत्व कोशीकीय एम-आरएनए को हाईजैक कर उसे डीएनए में तब्दील कर दे और उस डीएनए को आपकी आनुवांशिक संरचना में शामिल कर दे।

एचआईवी जैसे कुछ ‘‘रेट्रो वायरस’’ भी अपने आरएनए हमारे डीएनए में प्रवेश करा देते हैं, इसी पद्धति का इस्तेमाल रेट्रो- ट्रांसपोसंस भी कर सकते हैं।

हालांकि, प्राकृतिक रूप से प्रकट होने वाले रेट्रो- ट्रांसपोसंस के उस कोशिका में सक्रिय होने की बहुत कम गुंजाइश है जिसने हाल ही में एम-आरएनए टीका हासिल किया हो। साथ ही, एचआईवी से भी संक्रमित होने की बहुत कम गुंजाइश है।

हम इसे वास्तविक रूप से कैसे जानें?

हम जानते हैं कि टीकाकरण करवा चुके लोगों के डीएनए में टीका एम-आरएनए पर गौर करने के लिए कोई अध्ययन नहीं हुआ है। इस बारे में कोई वैज्ञानिक आधार भी नहीं है।

आखिरकार यह मिथक कहां से आया?

एक अध्ययन में प्रयोगशाला में विकसित और सार्स-कोवी-2 से संक्रमित कोशिकाओं के मानव जीनोम में कोरोना वायरस आरएनए के प्रवेश करने के बारे में साक्ष्य दिया गया था।

हालांकि, उस अध्ययन में एम-आरएनए टीके पर गौर नहीं किया गया, जिस कारण वह विश्वसनीय नहीं रहा।

सच्चाई यह है कि एम-आरएनए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल टीकों के अलावा जैव सुरक्षा और धारणीय कृषि में भी किया जााता है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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