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बच्चों के अकादमिक प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है व्यग्रता, शिक्षकों और अभिभावकों को क्या करना चाहिए

By भाषा | Updated: October 18, 2021 12:30 IST

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(एलिजाबेथ जे एडवर्ड्स, सीनियर लेक्चरर, शिक्षा विभाग, यूनिवर्सिटी ऑफ क्विंसलैंड)

ब्रिसबेन, 18 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) महीनों तक लगे लॉकडाउन और स्कूलों से दूर रहकर पढ़ाई करने के बाद ऑस्ट्रेलिया में बच्चे स्कूल की कक्षाओं में लौट रहे हैं। इसे लेकर छात्र लेकर चिंतित हो सकते हैं कि कक्षाओें में वापसी की अनिश्चितता का अकादमिक और सामाजिक रूप से उनके लिए क्या मतलब हो सकता है।

कई छात्रों के घरों पर हो सकता है कि आर्थिक तनाव जैसी कोई परेशानी चल रही हो जिसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

अध्ययन बताते हैं कि वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के दौरान कम उम्र के लोगों में व्यग्रता और अवसाद बढ़ा है। व्यग्रता के सामाजिक और भावनात्मक प्रभावों पर तो अध्ययन हुए हैं लेकिन कई लोगों को यह भान नहीं होगा कि चिंतित रहने की इस स्थिति का बच्चे के आकादमिक कार्य पर भी प्रभाव हो सकता है।

ऑस्ट्रेलिया के सात लोगों में से एक को बेचैनी का अहसास हो रहा है। बच्चों में व्यग्रता चिंता का विषय है क्योंकि 6.1 फीसदी लड़कियां और 7.6 फीसदी लड़के इससे प्रभावित हैं। अध्ययन बताते हैं कि व्यग्रता की परेशानी औसतन 11 वर्ष की आयु में हो सकती है। गौर करने वाली बात यह है कि ये आंकड़े महामारी से पहले के हैं।

‘जर्नल फॉर द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन’ ने इस साल अगस्त में एक अध्ययन प्रकाशित किया जिसके मुताबिक दुनियाभर में 25 फीसदी युवा ‘क्लिनिकल एंग्जाइटी’ से पीड़ित हैं। अध्ययन में बताया गया कि महामारी से पहले के आंकड़ों की तुलना में कोविड-19 के दौरान अवसाद और व्यग्रता के लक्षण पाए जाने के मामले दोगुने हो गए।

एंजाइटी या व्यग्रता में व्यक्ति घबराहट, चिंता, धड़कन तेज होने, पेट में कुछ घुमड़ने का एहसास होने, बेचैनी आदि का अनुभव करता है। हमें परीक्षा देने जाने से पहले या ऐसी अन्य तनाव वाली स्थितियों में इस समस्या से जूझना पड़ सकता है।

जब व्यग्रता असहनीय हो जाए और हमारे रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करे तो यह बड़ी समस्या बन जाती है।

बच्चों की शैक्षणिक क्षमताओं पर इसका असर कैसे होता है

ध्यान देने वाले विषयों के चयन (अटेंशन कंट्रोल) के सिद्धांत में इस बात की स्पष्ट व्याख्या है कि कक्षाओं में व्यग्रता का कैसा असर हो सकता है। इस सिद्धांत के अनुसार व्यग्रता का उच्च स्तर मानसिक प्रक्रियाओं (क्रियाकलापों) की क्षमता को प्रभावित करता है लेकिन हमेशा कार्यक्षमता पर असर नहीं डालता।

अनुसंधान बताते हैं कि वयस्कों में कामकाज के स्तर पर व्यग्रता का नकारात्मक प्रभाव होता है।

इससे उत्तेजना जैसी स्थिति को नियंत्रित करने, एक कार्य से दूसरे कार्य को बदलने आदि पर असर पड़ता है। कुछ अध्ययनों में बच्चों की अकादमिक उपलब्धि के संदर्भ में कामकाज के स्तर पर व्यग्रता संबंधी समस्याओं के परिणामों का अध्ययन किया गया। लेकिन ऐसे अनुसंधान सीमित हैं।

एक अध्ययन में पता चला कि इस तरह की क्षमता का साक्षरता और संख्यात्मक विषयों से लेना-देना होता है।

हमारी प्रयोगशाला इस समय इस बात का अध्ययन कर रही है कि व्यग्रता से बच्चों की ज्ञानात्मक प्रक्रिया किस तरह प्रभावित होती है और इसके फलस्वरूप कक्षाओं में बच्चों के प्रदर्शन पर क्या असर होता है। लेकिन अभी तक के परिणाम अटकल वाले हैं।

कक्षाओं में बच्चों को आ सकने वाली परेशानियों के बारे में अध्ययन कहता है कि अधिक व्यग्रता का सामना कर रहे बच्चों का ध्यान कक्षा में अपने काम के बजाए चिंताजनक विचारों की ओर रह सकता है। हो सकता है कि बच्चा अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पाए। हो सकता है कि उन्हें लगे कि काम बहुत मुश्किल है या फिर वे उसमें सफल नहीं हो पाएंगे। ऐसे में उनका ध्यान अकादमिक कार्य पर लगाना मुश्किल हो सकता है और इसका असर प्रदर्शन पर पड़ सकता है।

ऐसी स्थिति में शिक्षकों, अभिभावकों को क्या करना चाहिए? बच्चों को भरोसा दिलाएं और गलतियों को बढ़ाचढ़ा कर पेश करने के बजाए कहें कि गलतियां या छोटी मोटी विफलताएं तो कुछ नया सीखने के दौरान सामान्य बात हैं।

बच्चों के प्रयासों की प्रशंसा करें और उन्हें बताए कि उन्होंने जो काम किया वह अच्छी तरह किया। उनकी बात सुनें, लचीला रूख अपनाएं। बच्चों को शांत वातावरण दें। ध्यान रहे कि आपकी बैचेनी, व्यग्रता बच्चों तक पहुंचती हैं। जरूरत पड़ने पर किसी पेशेवर की मदद लें।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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