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विजय दर्डा का नजरियाः न्यायालय को क्यों करना पड़ रहा है हस्तक्षेप?

By विजय दर्डा | Updated: April 15, 2019 05:00 IST

कार्यपालिका और विधायिका के कामकाज का तरीका ऐसा हो गया है कि उनके खिलाफ जनहित याचिकाओं के अंबार लग रहे हैं और न्यायालय को बार-बार उन्हें आईना दिखाना पड़ रहा है. कार्यपालिका को न्यायालय की फटकार सामान्य सी बात हो गई है.

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देश स्पष्ट रूप से यह  महसूस कर रहा है कि आम आदमी के लिए बना सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है.   प्रशासनिक न्याय लोगों को नहीं मिल रहा है इसलिए कोर्ट की शरण में जा रहे हैं. कार्यपालिका और विधायिका के कामकाज का तरीका ऐसा हो गया है कि उनके खिलाफ जनहित याचिकाओं के अंबार लग रहे हैं और न्यायालय को बार-बार उन्हें आईना दिखाना पड़ रहा है. कार्यपालिका को न्यायालय की फटकार सामान्य सी बात हो गई है. विधायिका ने न जाने कितने ट्रिब्यूनल बना रखे हैं जिससे साफ है कि सिस्टम अपना काम ठीक से नहीं कर रहा है. संसद, विधानसभाएं, विधान परिषद आदि संस्थाएं इसलिए हैं कि वे लोगों के विकास, उन्नति, रक्षा, शिक्षा जैसे मसलों पर डिबेट और डिस्कशन करें, नीतियां बनाएं और उनका पालन कराएं, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. कहीं आम आदमी की बात ही नहीं होती है. संसद में मुद्दों पर बहस की प्रथा ही समाप्त होती जा रही है. बिना डिबेट और डिस्कशन  के बिल पास हो जाते हैं.  विधानसभाओं में तो कई बार मारपीट और कुर्सी फेंकने की घटनाएं हम देख ही चुके हैं. जब विधायिका का चलन ऐसा हो जाए तो कार्यपालिका का बेलगाम और बेपरवाह हो जाना स्वाभाविक सा है. 

मैंने कई बार संसद में ये मामले उठाए हैं और यह सवाल भी खड़ा किया है कि शासकीय और प्रशासकीय एकाउंटेबिलिटी क्यों नहीं तय की जाती? आश्चर्य होता है कि अत्यंत छोटे-छोटे मामले भी न्यायालय में क्यों पहुंचते हैं? पहले सर्वोच्च न्यायालय में संवैधानिक मामलों पर बहस होती थी. अब तो प्रशासकीय मामलों से लेकर चुनाव, सिनेमा और खेल तक के मामलों में समय जाया हो रहा है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का ही मामला देखिए. यह बोर्ड सबसे ज्यादा अमीर है और इस पर राजनीतिक पार्टियों ने कब्जा कर रखा है. अंतत: इसकी सफाई के लिए भी सर्वोच्च न्यायालय को ही पहल करनी पड़ी. डिफेंस डील का और उद्योगपतियों के भ्रष्टाचार का मामला भी कोर्ट पहुंच जाता है जबकि इसे तो शासकीय और प्रशासकीय स्तर पर ही पकड़ा जाना चाहिए और दंड भी मिलना चाहिए. आज किसानों का मामला हो, भ्रष्टाचार का मामला हो, राइट टू फूड या राइट टू एजुकेशन का मामला हो, न्याय के लिए कोर्ट जाना पड़ता है. सारा सिस्टम ही आम आदमी के खिलाफ है. 

कहीं कोई भवन जर्जर है या अवैध बन गया है तो उसे गिरवाने के लिए कोर्ट जाना पड़ता है. इसके लिए कोर्ट की जरूरत क्यों होनी चाहिए? कोई किताब रुकवानी हो तो कोर्ट, क्रिकेट का या फिर कोई और मसला हो तो कोर्ट! यहां तक कि आपराधिक मामलों में जांच के लिए भी कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ता है. इसी महीने पानसरे हत्याकांड से जुड़े मसले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की. कोर्ट की टिप्पणी का स्पष्ट मतलब है कि  शासन, प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारी और पदाधिकारी अपनी जिम्मेदारी कब समङोंगे? ऐसे ही एक दूसरे मामले में कोर्ट ने कहा कि हम म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के कॉरपोरेटर हैं या आयुक्त हैं? ऐसी कठोर टिप्पणियों के बाद भी कुछ सुधरता हुआ नजर नहीं आ रहा है. 

न्यायालय की समस्या यह है कि जजों की संख्या इतनी नहीं है और संसाधन इतने नहीं हैं कि तेजी से नतीजे आ सकें. आज भारत में करीब 2 करोड़ 90 लाख मुकदमे लंबित हैं. इनमें 71 प्रतिशत से ज्यादा आपराधिक मामले हैं. याचिका के रूप में दाखिल मामले न्यायालय में भीड़ ही बढ़ाते हैं. यहां मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि न्याय बहुत महंगा हो गया है. मुफ्त न्याय केवल कागजों पर है. सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि लोगों को न्याय मिले. न्यायालय के हस्तक्षेप की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए क्योंकि किसी भी चीज का अतिरेक ठीक नहीं होता है. 

तो सवाल पैदा होता है कि इस गंभीर स्थिति से देश बाहर कैसे आए? मुङो लगता है कि पहल विधायिका को करनी होगी. जरूरी कानूनों को सख्ती से लागू कराना होगा. कार्यपालिका को बाध्य करना होगा कि वह न्यायपूर्ण व्यवस्था का अंग बने. मैं याद दिलाना चाहूंगा कि 1966 में उच्च अधिकार प्राप्त प्रशासनिक सुधार आयोग की स्थापना की गई थी. इसके चेयरमैन मोरारजी देसाई हुआ करते थे. इसके सदस्यों में तत्कालीन सांसद के. हनुमंतैया, हरिश्चंद्र माथुर, जी.एस. पाठक तथा एच. बी. कामथ जैसे धुरंधर सांसद शामिल थे. 

उस समिति ने प्रशासनिक सुधार के 12 बिंदु सुझाए थे. उन सुझावों पर यदि पूरी तरह अमल हुआ होता तो हमारी ब्यूरोक्रेसी शायद इतनी बेलगाम और बेपरवाह न होती. ध्यान रखने वाली बात है कि कार्यपालिका तब बेलगाम होती है जब राजनेता भ्रष्ट हो जाते हैं. वे अधिकारियों से एक काम कराते हैं तो अधिकारी अपने दो काम कर लेता है.  इसलिए यह बहुत जरूरी है कि विधायिका ईमानदारी के साथ ऐसे कदम उठाए कि हमारी ब्यूरोक्रेसी अपने दायित्वों को पूरा करे और लगनशील बने. यदि हम ऐसा कर पाए तो न्यायपालिका को भी अतिरिक्त बोझ से बचा पाएंगे.

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