उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027ः कांशीराम की विरासत?, मायावती, अखिलेश यादव, राहुल गांधी और सीएम योगी में सियासी जंग तेज
By राजेंद्र कुमार | Updated: March 14, 2026 17:55 IST2026-03-14T17:53:24+5:302026-03-14T17:55:13+5:30
Uttar Pradesh Assembly Elections 2027: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इस मौके पर भाजपा को दलित समाज का हितैषी साबित करने के लिए अपने विचार व्यक्त करेंगे.

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लखनऊः उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक कांशीराम की विरासत (दलित वोट बैंक) को अपने पाले में लाने के लिए सियासी जंग तेज हो गई है. कांशीराम के उत्तराधिकारी की हैसियत से बसपा सुप्रीमो मायावती कांशीराम की 15 मार्च को 92वीं जयंती के अवसर पर लखनऊ में पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का बड़ा जमावड़ा करने जा रही हैं. तो समाजवादी पार्टी (सपा) ने भी सभी जिलों में कांशीराम की जयंती मनाने का ऐलान किया है. सूबे की भाजपा सरकार भी प्रदेश में कांशीराम के योगदान पर गांव-गांव में चर्चा करेंगी.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इस मौके पर भाजपा को दलित समाज का हितैषी साबित करने के लिए अपने विचार व्यक्त करेंगे. कांग्रेस के प्रमुख नेता राहुल गांधी की मौजूदगी में शुक्रवार को लखनऊ में पार्टी द्वारा आयोजित दलित संवाद कार्यक्रम में तो कांशीराम को भारत रत्न देने का प्रस्ताव पास किया गया.
15 मार्च को मायावती दिखाएंगे ताकत
कुल मिलकर यूपी में दलित वोट बैंक को अपने पाले में लाने के लिए सभी प्रमुख राजनीतिक दल जोरशोर से सक्रिय हो गए हैं. इसकी वजह ही यूपी में दलित वोट बैंक की ताकत है. उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 21 फीसदी है. प्रदेश की 85 विधानसभा सीटें और लोकसभा की 12 सीटें अनुसूचित जाति (दलित) के लिए आरक्षित हैं, लेकिन अन्य सीटों पर भी दलित वोट बैंक का महत्व निर्विवाद है.
जिसके चलते दलित समाज यूपी में चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. इसी वजह से हर राजनीतिक दल का कांशीराम के प्रति प्रेम उमड़ा है ताकि कांशीराम को याद करते हुए दलित समाज को अपने पाले में लाया जाए. इसी सोच के तहत ही बसपा सुप्रीमो मायावती ने 15 मार्च को अपने कांशीराम की जयंती पर लखनऊ और नोएडा में बड़ा जमावड़ा करने का फैसला किया है,
ताकि यह बताया जा सके कि बसपा की दलित समाज की सबसे बड़ी हितैषी है. पार्टी नेताओं के अनुसार लखनऊ में मायावती अवध और पूर्वांचल के नजदीकी जिलों के वर्करों के आयोजन संबोधित करेंगी. नोएडा में भी पश्चिम यूपी के छह मंडलों मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, बरेली, आगरा, अलीगढ़ और उत्तराखंड के कार्यकर्ताओं की रैली होगी.
रैली में हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 20 बसों से वर्करों को ले जाने का लक्ष्य रखा गया है. नोएडा में वेस्ट यूपी के प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव बाबू मुनकाद अली मुख्य मेहमान होंगे और वह मायावती के भाषण को रैली में पढ़ेंगे. लोगों को बताएँगे कि वह भाजपा, सपा और कांग्रेस के लुभावने दावों में ना फंसे.
बसपा ने ही दलित समाज को सम्मान दिलाया है, आगे भी वह दलित समाज के हितों के लिए संघर्ष करती रहेगी. कुल मिलकर 15 मार्च को मायावती यूपी में कांशीराम की जयंती पर दो आयोजनों में बड़ी संख्या में दलित समाज को एकत्र का अपनी ताकत का अहसास कराएंगी.
कांशीराम के बताए रास्ते पर चल रही सपा
सपा मुखिया अखिलेश यादव भी पीडीए के नारे के साथ पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वोटबैंक को साधे की अपनी रणनीति के तहत दलित वोटों को जोड़ने पर काम कर रहे हैं. बीते लोकसभा चुनावों में अखिलेश यादव ही यह रणनीति सफल भी रही थी. उसे और मजबूती देने के लिए सपा कांशीराम की जयंती सभी जिले में 'बहुजन दिवस' या पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) दिवस के रूप मनाएगी. ताकि यह संदेश दिया जा सके कि अखिलेश दलितों को साथ लाने के लिए लोहिया के साथ अंबेडकर-कांशीराम की विचारधारा को लेकर चलना चाहते हैं.
सपा ने नेताओं का कहना है कि कांशीराम हमेशा दलित- पिछड़ों के हाथ में सत्ता की ताकत देन चाहते थे. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी अब उसी रास्ते पर चल रहे हैं. वह जाति जनगणना कराकर आबादी के अनुपात में हर वर्ग को भागीदारी देने की लड़ाई लड़ रहे हैं.
कांशीराम भाजपा के भी सियासी एजेंडे में
कांग्रेस ने भी कांशीराम की जयंती के दो दिन पहले बहुजन संवाद कार्यक्रम आयोजित कर दलित समाज को अपने साथ लाने की मुहिम शुरू की है. भाजपा भी इस मामले में पीछे नहीं है. भाजपा नेताओं के अनुसार, पार्टी ने 15 दलित महापुरुषों को याद करने के लिए एक कैलेंडर तैयार कराया है. इन सबकी जयंती-पुण्य तिथि के कार्यक्रमों से इस समाज के लोगों से मुलाकात का कार्यक्रम तैयार किया गया.
इनमें कांशीराम से लेकर संत रविदास तक शामिल हैं. योगी सरकार में मंत्री असीम अरुण के नेतृत्व में भाजपा ने दलित महापुरुषों के दर्शन और योगदान पर फोकस करने का प्लान कर रखा है. भाजपा जिस तरह दलित समुदाय के बीच भावनात्मक कनेक्ट बढ़ाने की कवायद में है, उससे जाहिर है कि कांशीराम भी उनमें शामिल हैं.
फिलहाल कांशीराम की जयंती पर इस बार तमाम बड़े कार्यक्रम हो रहे हैं. कांग्रेस बसपा संस्थापक कांशीराम द्वारा दिए गए नारे जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी को फिर से पुनर्जीवित करके अपना सियासी वनवास खत्म करने की कोशिश में जुटी है तो मायावती भी अपने को कांशीराम की विरासत का उत्तराधिकार साबित करने के लिए जुटी हैं.