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स्टालिन ने अपने पिता, पार्टी संरक्षक करूणानिधि के सपने को साकार किया

By भाषा | Updated: May 7, 2021 15:47 IST

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चेन्नई, सात मई द्रमुक के दिवंगत संरक्षक एम. करूणानिधि ने करीब छह वर्ष पहले पार्टी की एक बैठक में कहा था कि ‘‘स्टालिन ही पार्टी के भविष्य हैं।’’ तब पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे एम. के. स्टालिन ने शुक्रवार को जब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो उनके पिता करूणानिधि का सपना साकार हो गया।

द्रमुक 2016 में सत्ता में नहीं आ सकी लेकिन स्टालिन ने अन्नाद्रमुक से राज्य विधानसभा के अंदर और बाहर लड़ाई अनवरत जारी रखी जिससे एक दशक बाद उन्हें फोर्ट सेंट जॉर्ज में आसीन होने का अवसर मिला।

2016 के विधानसभा चुनाव के दौरान हालांकि करूणानिधि ने द्रमुक को जनादेश मिलने पर स्टालिन के मुख्यमंत्री बनने की संभावना से इंकार किया था और कहा था कि अगर ‘प्रकृति’ ने उनके साथ कुछ किया तभी ऐसा हो सकेगा, लेकिन स्टालिन पार्टी की सफलता के लिए पहले की तरह काम करते रहे।

वह कई मुद्दों को लेकर राज्य में अन्नाद्रमुक और केंद्र में भाजपा की सरकारों को निशाना बनाते रहे और 2017 की शुरुआत में जब वह कार्यकारी अध्यक्ष बने तो पार्टी के अंदर भी उनकी स्थिति मजबूत हुई। इसके अगले वर्ष करूणानिधि के निधन के बाद वह पार्टी के अध्यक्ष बने।

स्टालिन ने अपने राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत किशोर के तौर पर की थी और पार्टी के अंदर उनका कद धीरे-धीरे बढ़ता चला गया और करूणानिधि जब 2006-11 के दौरान मुख्यमंत्री थे तो सरकार में उन्हें जिम्मेदारियां भी क्रमिक रूप से मिलती गईं।

मदुरै में रह रहे अपने भाई एम. के. अलागिरी की तरफ से पेश चुनौतियों से भी उन्होंने सफलतापूर्वक पार पा लिया और नीचे से लेकर ऊपर तक पूरा संगठन उनके साथ हो चला। उन्होंने अपने पिता की तरह ‘सीधे पार्टी कार्यकर्ताओं को पत्र लिखने’ की शैली अपनाई ताकि उनमें उत्साह भर सकें।

कावेरी डेल्टा जिलों में चाहे हाइड्रोकार्बन उत्खनन परियोजना का विरोध करना हो या संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन चलाना हो अथवा सीएए के खिलाफ ‘दो करोड़’ दस्तखत जुटाने की बात हो; स्टालिन ने केंद्र और राज्य सरकारों को घेरना जारी रखा और साथ ही पार्टी की चुनावी संभावनाओं को भी मजबूत करते रहे।

केंद्र के कृषि कानून के विरोध और सरकारी स्कूल के छात्रों को मेडिकल में नामांकन में साढ़े सात फीसदी आरक्षण के राज्य के विधेयक पर राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित द्वारा हस्ताक्षर करने के लिए पिछले वर्ष अक्टूबर में राजभवन के पास रैली आयोजित करने से लोगों के बीच एक सकारात्मक संदेश गया और छह अप्रैल को अगली सरकार के चयन के लिए हुए मतदान में इसका असर भी दिखा।

उनके नेतृत्व में 2019 के लोकसभा चुनावों में द्रमुक ने राज्य में 39 में से 38 सीटों पर जीत हासिल की।

विधानसभा चुनावों में भी द्रमुक ने इसी तरह की जीत हासिल की जब पार्टी एवं इसके सहयोगियों ने 234 में से 159 सीटों पर अपना परचम लहराया। अन्नाद्रमुक और उसके सहयोगियों को केवल 75 सीटों पर जीत हासिल हो सकी।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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