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श्रीकांत किदाम्बी : विश्व चैंपियनशिप में पहली बार भारत को दिलाई चांदी

By भाषा | Updated: December 26, 2021 13:14 IST

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नयी दिल्ली, 26 दिसंबर पुर्तगाली कॉर्क पर बतख के 16 पंख लगाकर बैडमिंटन कोर्ट में एक छोर से दूसरे छोर में उड़ान भरने वाली छोटी सी सफेद ‘चिड़िया’ की परवाज अब भारत में आसमान छूने लगी है। भारतीय शटलर किदाम्बी श्रीकांत ने विश्व चैंपियनशिप में पहली बार रजत पदक जीतकर देश के खेल प्रेमियों को खुश होने की एक बड़ी वजह दे दी।

एक जमाना था जब देश में बैडमिंटन के नाम पर न तो अन्तरराष्ट्रीय श्रेणी के कोर्ट हुआ करते थे और न ही जरूरी सुविधाएं, लेकिन इसके बावजूद प्रकाश पादुकोन ने 1980 में ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीतकर देश में इस खेल की जड़ों को सींचना शुरू किया और धीरे धीरे खिलाड़ियों की फसल तैयार होने लगी।

पिछले चार दशक में बहुत कुछ बदल गया और भारतीय खिलाड़ियों ने विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में अपना दबदबा कायम किया। इस श्रृंखला की ताजा कड़ी में किदाम्बी श्रीकांत का बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन (बीडब्ल्यू एफ) विश्व चैंपियनशिप में पहली बार रजत पदक हासिल करना एक बड़ी उपलब्धि है।

श्रीकांत नम्मलवार किदांबी का जन्म सात फरवरी 1993 को आंध्र प्रदेश के रावुलापलेम में एक तेलुगु परिवार में हुआ। उनके पिता केवीएस कृष्णा एक जमींदार हैं और मां घर संभालती हैं।

यह जानना दिलचस्प होगा कि स्मैश और ड्राप शाट के माहिर श्रीकांत को शुरू में बैडमिंटन से कोई बहुत ज्यादा लगाव नहीं था। वह अपने बड़े भाई के नंद गोपाल का साथ देने के लिए बैडमिंटन खेला करते थे। उनके पिता खेल में बच्चों की रूचि देखकर स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण के बाद बेहतर ट्रेनिंग के लिए उन्हें पुलेला गोपीचंद की अकेडमी ले गए। अकेडमी में नंदगोपाल को तो ट्रेनिंग के लिए चुन लिया गया, लेकिन शरारती श्रीकांत में उन्हें ऐसी कोई खास बात नजर नहीं आई कि उन्हें अकेडमी में चुना जाए। पिता के इसरार करने पर श्रीकांत को अकेडमी में दाखिला तो मिल गया, लेकिन खेल में उनकी रूचि बहुत ज्यादा नहीं थी।

उनके प्रशिक्षक जिन्हें सब गोपी सर बुलाते हैं, ने एक अखबार के साथ बातचीत में बताया, ‘‘श्रीकांत शुरुआत में ज्यादा मेहनत नहीं करता था। वह डबल्स में खेलकर खुश रहता था।’’

हालांकि डबल्स और मिक्स डबल्स के खिलाड़ी के तौर पर भी श्रीकांत ने अन्तरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में कई पदक अपने नाम किए। इनमें 2011 कॉमनवेल्थ यूथ गेम्स में जीते रजत और कांस्य पदक शामिल हैं।

गोपी सर बताते हैं, ‘‘श्रीकांत डबल्स में खिताब जीत रहा था, लेकिन मैं जानता था कि वह एकल स्पर्धाओं में बहुत बेहतर कर सकता है। इसे देखते हुए मैंने उसके लिए कुछ मुश्किल लक्ष्य निर्धारित किए और जल्दी ही वह एक मेहनती और जुझारू खिलाड़ी बन गया।’’

एकल स्पर्धाओं में श्रीकांत ने जबर्दस्त कामयाबी हासिल की और हर गुजरते वर्ष के साथ उनका खेल निखरता चला गया। इस दौरान उन्होंने कई बड़ी सफलताएं हासिल कीं और 2018 में वह बैडमिंटन के विश्व वरीयता क्रम में पहले नंबर के खिलाड़ी बन गए। उन्हें 2015 में अर्जुन अवार्ड और 2018 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

2017 से 2021 के बीच का सफर श्रीकांत के लिए बहुत अच्छा नहीं रहा, लेकिन इस जाते साल के आखिरी महीने में चमकी चांदी ने उम्मीद बंधाई है कि आने वाले समय में उन्हें कुछ और सुनहरी सफलताएं हासिल करने से रोक पाना मुश्किल होगा।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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