बिहार में मुख्यमंत्री चुनना भाजपा के लिए बनी बड़ी सिरदर्दी, सम्राट चौधरी के नाम पर दल में टूट की संभावना, संघ बैकग्राउंड के नेता की हो रही है मांग

By एस पी सिन्हा | Updated: April 6, 2026 15:42 IST2026-04-06T15:42:56+5:302026-04-06T15:42:56+5:30

बिहार के सियासी गलियारे में भाजपा नेता एवं उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के अलावे कई और नेताओं के नामों की चर्चा जोरों पर है। लेकिन भाजपा के अंदर ही लोग सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद पर देखना नहीं चाह रहे हैं। सूत्रों की मानें तो 40-50 विधायक यह नहीं चाहते हैं कि सम्राट चौधरी को उन पर थोपा जाए।

Selecting a CM in Bihar becomes a major headache for the BJP; the nomination of Samrat Chaudhary raises the possibility of a split within the party, while there is a growing demand for a leader with a Sangh background. | बिहार में मुख्यमंत्री चुनना भाजपा के लिए बनी बड़ी सिरदर्दी, सम्राट चौधरी के नाम पर दल में टूट की संभावना, संघ बैकग्राउंड के नेता की हो रही है मांग

बिहार में मुख्यमंत्री चुनना भाजपा के लिए बनी बड़ी सिरदर्दी, सम्राट चौधरी के नाम पर दल में टूट की संभावना, संघ बैकग्राउंड के नेता की हो रही है मांग

पटना: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और मुख्यमंत्री पद को छोडने की तैयारियां तेज हो गई हैं। इस कदम के बाद राज्य में लंबे समय से चले आ रहे नीतीश युग का अंत अब करीब है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में बिहार को नया मुख्यमंत्री मिल सकता है और यह पद भाजपा के पास जा सकता है। हालांकि, भाजपा के लिए नया मुख्यमंत्री चुनना आसान प्रतीत नहीं हो रहा है। बिहार के सियासी गलियारे में भाजपा नेता एवं उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के अलावे कई और नेताओं के नामों की चर्चा जोरों पर है। लेकिन भाजपा के अंदर ही लोग सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद पर देखना नहीं चाह रहे हैं। सूत्रों की मानें तो 40-50 विधायक यह नहीं चाहते हैं कि सम्राट चौधरी को उन पर थोपा जाए।

भाजपा के दिग्गज नेताओं ने नाम नहीं छापने के शर्त पर बताया कि पार्टी के अधिकतर विधायक और नेता-कार्यकर्ता चाहते हैं कि पार्टी के ही किसी पुराने और संघर्ष के दिनों में साथ देने वाले नेताओं को ही मुख्यमंत्री के पद पर बैठाया जाए। पार्टी के नेताओं का कहना है कि सम्राट चौधरी दल के पुराने सहयोगी नहीं हैं। यह राजद से निकलकर हम और जदयू होते हुए भाजपा में शामिल हुए हैं। ऐसे में यह आयातित नेता हैं। यही नहीं सम्राट चौधरी सियासत में कदम रखने के साथ ही विवादों के घेरे में रहे हैं। 

पहला तो यह कि नाबालिग रहते हुए राजद के द्वारा इन्हें मंत्री बना दिया गया था। उस वक्त भाजपा के द्वारा ही उनके खिलाफ मोर्चा खोला गया था। तत्कालीन नेता विरोधी दल सुशील कुमार मोदी के पहल के बाद ही राज्यपाल को सम्राट चौधरी को मंत्री पद से बर्खास्त करना पडा था। यही नहीं हत्या के मामले में भी सम्राट चौधरी विवादों के घेरे में रह चुके हैं। ऐसे में दल के पुराने नेता यह चाहते हैं कि कोई दल का ही किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाए, कारण कि उसकी संघ की भी पृष्ठभूमि रहेगी। 

ऐसे में दल के अंदर सम्राट चौधरी के नाम को लेकर एकमत नहीं दिख रहा है। चर्चा तो यहां तक होने लगी है कि सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया जाए तो विधायकों में फूट की भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। पार्टी के भीतर भी ऐसा कोई एक चेहरा नहीं दिखता जिस पर सभी नेता और कार्यकर्ता एकमत हों। भाजपा नेता के सत्ता ऐसे हाथ में सौंपना चाहते हैं, जो पूरी तरह से आरएसएस के रंग में रंगा हो। 

यह प्रशासनिक रूप से इतना दक्ष हो कि नीतीश कुमार की बिहार को धीरे-धीरे संघ नीत बिहार के रंग में रंगने का माद्दा रखता हो। इस पृष्ठभूमि में कई बड़े और चौंकाने वाले नाम भी हैं। आरएसएस के बैकग्राउंड से आने वाले विभिन्न जातियों के कद्दावर नेताओं की काफी चर्चा चल रही है। वैसे पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी बिहार की भूमि पर फिर किसी चौंकाने वाले नाम के साथ कोई कमाल दिखा सकते हैं। बिहार की राजनीति की सबसे बड़ी सच्चाई जातीय समीकरण मानी जाती है। 

यहां चुनावी नतीजों से लेकर सत्ता की रणनीति तक, हर स्तर पर जाति का प्रभाव साफ दिखाई देता है। कई बार एग्जिट पोल और राजनीतिक विश्लेषण भी बिहार में गलत साबित हो जाते हैं, क्योंकि अंतिम फैसला अक्सर जातीय संतुलन ही तय करता है। राजनीतिक दल भी अपने फैसलों में विभिन्न जातियों के वोट बैंक को ध्यान में रखते हैं। यही कारण है कि बिहार की सियासत में जाति एक अहम और स्थाई कारक बनी हुई है। 

वैसे जब तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे, तब तक भाजपा के लिए संतुलन बनाना आसान था। भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह किस जाति से मुख्यमंत्री चुने। अगर पार्टी सवर्ण वर्ग से चेहरा चुनती है, तो दलित और ओबीसी वोट बैंक प्रभावित हो सकता है। वहीं, अगर पार्टी ओबीसी, दलित या अतिपिछड़े वर्ग से नेता को आगे बढ़ाती है, तो पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक में असंतोष पैदा होने की संभावना है। मौजूदा समय में भाजपा की राजनीति काफी हद तक दलित और ओबीसी वर्ग के अलावे महिलाओं पर केंद्रित है।

Web Title: Selecting a CM in Bihar becomes a major headache for the BJP; the nomination of Samrat Chaudhary raises the possibility of a split within the party, while there is a growing demand for a leader with a Sangh background.

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