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राजस्थानः योजनाएं तो बहुत हैं, लेकिन जरूरी धन कैसे मिलेगा? किस योजना को बंद करें, किसे जारी रखें?

By प्रदीप द्विवेदी | Updated: February 4, 2019 06:17 IST

पिछली बार वसुंधरा राजे सरकार ने सत्ता में आने के बाद उनसे पूर्व की अशोक गहलोत सरकार की कई योजनाएं बंद करके नई योजनाएं शुरू कर दी थीं. इसके कारण तब तक गहलोत सरकार की योजनाओं पर जितना धन खर्च हुआ था, वह सारा बेकार गया. 

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राजस्थान में सरकार बदलने के साथ ही कई योजनाएं भी बदलती रही हैं, जिसका प्रत्यक्ष-परोक्ष भारी आर्थिक नुकसान प्रदेश सरकार को होता रहा है. नई सरकार आते ही कई योजनाएं ठंडे बस्ते के हवाले कर दी जाती हैं, जिसके कारण उस योजना पर खर्च किया गया पैसा न केवल बर्बाद होता है, बल्कि यदि योजना दोबारा शुरू करनी पड़े तो लागत कई गुना बढ़ जाती है. पिछली बार वसुंधरा राजे सरकार ने सत्ता में आने के बाद उनसे पूर्व की अशोक गहलोत सरकार की कई योजनाएं बंद करके नई योजनाएं शुरू कर दी थीं. इसके कारण तब तक गहलोत सरकार की योजनाओं पर जितना धन खर्च हुआ था, वह सारा बेकार गया. अब पुनः राजस्थान में गहलोत सरकार आई है और जैसे कि सीएम गहलोत ने संकेत दिए हैं, वे सीएम राजे के कार्यकाल की अच्छी योजनाओं को तो जारी रखेंगे, लेकिन साथ ही उनके पिछले कार्यकाल की योजनाओं को भी फिर-से शुरू करेंगे. जाहिर है, उन तमाम योजनाओं की लागत अब बढ़ चुकी है तथा उनके लिए जरूरी धन जुटाना भी बड़ा सवाल है.ऐसी तमाम योजनाओं के साथ सबसे बड़ा खर्च तत्कालीन पीएम, सीएम के फोटो वाली सामग्री का प्रकाशन है, तो तत्कालीन प्रमुख की पसंद का रंग, प्रस्तुतीकरण आदि भी है, जिसके कारण सरकार बदलते ही करोड़ों रूपयों की सामग्री रद्दी बन जाती है.इस तरह के गैर जरूरी खर्च से लगातार प्रदेश की माली हालत खराब होती जा रही है और अन्य विभिन्न प्रमुख योजनाओं के लिए आवश्यक धन में कटौती हो रही है.ऐसे सियासी संकेत हैं कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार आर्थिक कारणों से पिछली वसुंधरा राजे सरकार की भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना बंद करके केन्द्र की आयुष्मान भारत जन आरोग्य योजना शुरू कर सकती है, क्योंकि राजस्थान में भामाशाह योजना पर प्रदेश सरकार करीब 1490 करोड़ रुपये खर्च करती है, जबकि आयुष्मान भारत योजना शुरू करने से राजस्थान सरकार को केंद्र सरकार से करीब 900 करोड़ रुपये मिलेंगे. आयुष्मान भारत योजना में 60 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार देती है और 40 प्रतिशत राज्य सरकार को खर्च करना पड़ता है.हालांकि, कुछ योजनाओं को तत्काल बदलना या बंद करना लोस चुनाव के नजरिए से सही नहीं माना जा रहा है, क्योंकि इसका नकारात्मक असर मतदाताओं पर हो सकता है, लिहाजा कुछ योजनाओं पर निर्णय लोस चुनाव के बाद भी हो सकता है.दक्षिण राजस्थान में वागड़ की रेल भी अशोक गहलोत सरकार की ऐसी ही योजना थी जिसे राजे सरकार ने ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया था, लेकिन सीएम गहलोत का कहना है कि वे इसके लिए फिर-से प्रयास करेंगे. इस योजना पर भी पूर्व में करोड़ों रुपए सर्वे, आॅफिस नेटवर्क आदि पर खर्च किए जा चुके थे. अब इन पर नए सिरे से खर्च करना होगा. यही नहीं, योजना की लागत भी बढ़ जाएगी. सियासी जानकारों का कहना है कि देश-प्रदेश में सरकार बदलने के साथ योजनाएं बदलना भले ही जरूरी लगता हो, लेकिन किसी भी योजना की आवश्यक सामग्री पर पीएम, सीएम आदि का ठप्पा लगाने पर रोक की इसलिए जरूरत है कि इससे एक तो नई सरकार उस योजना को वैसे ही खत्म कर देती है, और दूसरा- इससे बहुत सारा सरकारी धन अनावश्यक रूप से बर्बाद हो जाता है. 

टॅग्स :राजस्थानवसुंधरा राजेभारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)कांग्रेसअशोक गहलोत
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