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पिनरायी विजयन : केरल में एलडीएफ को लगातार दूसरी बार जीत दिलाने वाले नेता

By भाषा | Updated: May 20, 2021 19:54 IST

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तिरुवनंतपुरम, 20 मई पिनरायी विजयन केरल में माकपा नीत एलडीएफ को लगातार दूसरी बार जीत दिलाकर राज्य का राजनीतिक इतिहास बदल देने वाले नेता साबित हुए हैं।

राज्य के मतदाता हर पांच साल बाद एक बार कांग्रेस नीत यूडीएफ को तो एक बार वामपंथियों को सत्ता देते आ रहे थे, लेकिन इस बार चार दशक पुरानी यह परिपाटी टूट गई और विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ को लगातार दूसरी बार सत्ता की चाबी मिली।

इसके साथ ही 77 वर्षीय विजयन ने पार्टी पर अपनी पकड़ और मजबूत बना ली है।

मुसीबतों से न घबराने वाले, चतुर रणनीतिकार, व्यवहार कुशल प्रशासक और संकट प्रबंधक विजयन केरल के इतिहास में एक ऐसे नेता के रूप में जाने जाएंगे जिसने ‘राजनीतिक तूफानों’ और प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद राज्य में वाम गठबंधन का प्रभुत्व कायम रखा।

न सिर्फ राजनीतिक पर्यवेक्षक, बल्कि उनके आलोचक भी उनके ‘कुशल’ नेतृत्व और राजनीतिक रणनीति के लिए उनकी सराहना करने लगे हैं। विजयन के व्यक्तित्व के ये महत्वपूर्ण कारक हैं जिनकी वजह से वाम मोर्चे को चार दशक से चली आ रही परिपाटी के विपरीत लगातार दूसरी बार सत्ता मिली है।

शुरू में, विजयन जनसाधारण और पार्टी के जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में पूर्व मुख्यमंत्री एवं वाम दिग्गज वी एस अच्युतानंदन की तरह लोकप्रिय नहीं थे, लेकिन उन्होंने पिछले पांच साल में लोगों के मन में अपनी छाप छोड़ने के लिए किसी अवसर को बेकार नहीं जाने दिया।

विधानसभा चुनाव में 141 सीटों में से 99 पर एलडीएफ की ऐतिहासिक जीत के साथ ही पार्टी और सरकार में विजयन का पूरी तरह आधिपत्य कायम हो गया है।

चाहे सीएए विरोधी प्रदर्शन हों या दो विनाशकारी बाढ़, चाहे चक्रवात ‘ओखी’ हो या निपाह वायरस या फिर मौजूदा कोविड-19 महामारी, विजयन ने हर मोर्चे पर कुशल नेतृत्व कर राज्य की जनता में अपनी छवि कायम की।

माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य विजयन ने सुनिश्चित किया कि पार्टी और सरकार के भीतर उनके खिलाफ कोई आवाज न उठे। इसके चलते कुछ लोगों ने कई मौकों पर उन्हें ‘तानाशाह’ तक कहा।

पिछले पांच वर्षों में विपक्ष ने विजयन के कार्यालय को निशाना बनाते हुए उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए, लेकिन वह अपने समक्ष आई हर बाधा को पार करते गए।

राज्य के इतिहास में पहली बार मुख्यमंत्री कार्यालय सोने और डॉलर की तस्करी के आरोपों से घिरा तथा उनके विश्वस्त एवं पूर्व प्रधान सचिव एम शिवशंकर को केंद्रीय एजेंसियों ने मामले की जांच के क्रम में गिरफ्तार कर लिया। इसके अलावा और भी कई आरोप लगे, लेकिन इनसे अप्रभावित विजयन ने एलडीएफ को लगातार दूसरी बार ‘विजय’ दिला दी।

उनकी सबसे बड़ी परीक्षा 2018 में सबरीमला में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर हुई जब उनकी सरकार ने लैंगिक समानता को आगे बढ़ाते हुए तीर्थस्थल में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देने के उच्चतम न्यायालय के फैसले को क्रियान्वित करने का फैसला किया। इसके बाद उन्हें तीखे राजनीतिक एवं व्यक्तिगत हमलों का सामना करना पड़ा।

सत्तारूढ़ एलडीएफ को 2019 के लोकसभा चुनाव में तब सबसे बड़ा झटका लगा जब वह कांग्रेस नीत यूडीएफ के हाथों 20 में से 19 सीटों पर हार गया। तब इसे सबरीमला मुद्दे पर सरकार के फैसले से लोगों की नाराजगी के रूप में देखा गया था।

इसके बाद, पार्टी नेतृत्व जब सबरीमला में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर अपना रुख नरम करने को तैयार था तब विजयन इसपर अडिग रहे।

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद 2020 के निकाय चुनावों में हवा फिर पलटी और विजयन के नेतृत्व वाले एलडीएफ ने कांग्रेस और भाजपा का सूपड़ा-साफ कर दिया।

विजयन को अच्युतानंदन के साथ 2007 में पोलित ब्यूरो से तब निलंबित कर दिया गया था जब दोनों ने मीडिया में एक-दूसरे की खुलकर आलोचना की। बाद में, उन्हें बहाल कर दिया गया था।

विजयन का जन्म कन्नूर के पिनरायी में 1944 में मुंडायिल कोरन तथा कल्याणी के घर हुआ था।

वह छात्र राजनीति में सक्रिय रहे।

वर्ष 1968 में विजयन को माकपा की कन्नूर जिला समिति में जगह मिल गई। दो साल बाद वह कूठुपरांबा से चुनाव मैदान में उतरे और जीत दर्ज कर 26 साल की उम्र में विधायक बन गए।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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