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एनएमसीजी ने शवों के ‘सम्मानजनक दाह संस्कार’ के लिए राशि इस्तेमाल की दी थी मंजूरी: प्रमुख

By भाषा | Updated: December 24, 2021 17:58 IST

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नयी दिल्ली, 24 दिसंबर कोरोना वायरस की दूसरी लहर के दौरान चूंकि गंगा नदी का इस्तेमाल कोविड​​​​-19 संक्रमित से जान गंवाने वाले व्यक्तियों के शवों को बहाने के लिए किया गया था, एनएमसीजी ने अधिकारियों को इसके लिए अधिकृत किया कि वे गंगा समितियों से धन का उपयोग व्यक्तियों के ‘‘सम्मानजनक दाह संस्कार’’ के लिए कर सकते हैं। यह बात एनएमसीजी के प्रमुख ने कही।

‘गंगा: रीइमेजिनिंग, रिजुवेनेटिंग, रीकनेक्टिंग’ नामक पुस्तक में, इसके सह-लेखक एवं राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्रा ने कहा कि ऐसे गरीब व्यक्तियों की संख्या कुछ ही दिन में तिगुनी हो गई थी जिन्होंने अपना सारा पैसा कोविड-19 से लड़ने के लिए डॉक्टरों और दवाओं पर खर्च कर दिया था।

उन्होंने कहा कि वे दाह संस्कार के लिए खर्च करने की स्थिति में नहीं थे।

मिश्रा ने पुस्तक में कहा, ‘‘मैंने जिला अधिकारियों को जिला गंगा समितियों के धन का उपयोग जरूरत पड़ने पर सम्मानजनक दाह संस्कार के लिए करने के लिए अधिकृत किया। इसके बाद राज्य की ओर से भी वित्तीय मदद से ऐसे मामलों में मदद देने के लिए भी कार्रवाई शुरू हुई।’’

उन्होंने लिखा कि जैसे ही कोविड-19 महामारी के कारण शवों की संख्या कई गुना बढ़ी शवों को गंगा नदी में बहाया जाना लगा। उन्होंने तैरते शवों के दृश्यों को दर्दनाक और झंकझोर देने वाला अनुभव बताते हुए कहा कि उनका काम गंगा नदी की स्थिति ‘‘संरक्षक’’ होना था, इसके एवं इसकी सहायक नदियों के प्रवाह को फिर से पुराने स्वरूप में लाने सुनिश्चित करना था। उन्होंने कहा, ‘‘नदी के संरक्षण के लिए पांच साल का काम कुछ ही दिनों में बेकार होता प्रतीत हो रहा था।’’

मिश्रा ने कहा कि विभिन्न जिलाधिकारियों और पंचायत समितियों की रिपोर्ट के अनुसार, नदी में डाले गए शवों की संख्या 300 से अधिक नहीं थी। उन्होंने कहा, ‘‘यह समस्या केवल उत्तर प्रदेश (कन्नौज और बलिया के बीच) तक ही सीमित थी और बिहार में पाए गए शव उत्तर प्रदेश से तैरकर जा रहे थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे एक नदी के कायाकल्प की जिम्मेदारी लेने के लिए कहा जा रहा था जो स्वास्थ्य सेवाओं में कमी और संकट का प्रबंधन करने में स्थानीय निकायों की असमर्थता के कारण और अधिक प्रदूषित हो गई थी।’’

एनएमसीजी प्रमुख ने कहा कि अंतिम संस्कार सेवाओं का खराब प्रबंधन, स्थिति का फायदा उठाकर शवों का अंतिम संस्कार करने के बजाय नदी में डाला जाना और मीडिया से प्रतिकूल प्रचार से स्थिति और बिगड़ी।

उन्होकहा, ‘‘एनएमसीजी के पास उन व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई अधिकार नहीं था जो शवों को नदी में डाल रहे थे या उन्हें नदी किनारे दफना रहे थे। हमारी शक्ति निर्देश देने में निहित है, लेकिन हम कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य के अधिकारियों पर निर्भर हैं।’’

उन्होंने कहा कि नदी के किनारे रहने वाले लोगों के लिए तैरती लाशें या शवों का दफनाना कोई असामान्य बात नहीं है। उन्होंने कहा कि 15 मई को उन्होंने नदी में शवों को बहाने को तत्काल रोकने और पानी की गुणवत्ता के संभावित संदूषण की जांच करने का आदेश दिया।

उन्होंने कहा, ‘‘यह बात सामने आयी कि उत्तर प्रदेश के 27 जिलों के 11 स्टेशनों पर हर 10 दिनों में पानी की गुणवत्ता की निगरानी और विश्लेषण किया जा रहा था। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने क्लोरीनीकरण और कीटाणुनाशक उपाय के कारण इन राज्यों के पीने के पानी में वायरस के अस्तित्व को खारिज कर दिया।’’

मिश्रा ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के उस अध्ययन से सभी संदेह दूर हो गए जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वायरस पानी से नहीं फैलता है और इसलिए यह सीवेज प्रणाली को भी संक्रमित नहीं कर सकता है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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