इंदौरः एक अनार, सौ बीमार। मध्य प्रदेश कांग्रेस में राज्यसभा की एक सीट के लिए छिड़ा घमासान इसी कहावत को चरितार्थ कर रहा है। जहां एक ओर दिग्गज नेता अपनी दावेदारी के लिए ताल ठोक रहे हैं, वहीं भाजपा की 'पैनी नजर' कांग्रेस की इस आपसी फूट का फायदा उठाकर तीसरी सीट झटकने पर टिकी है। दिग्विजय सिंह के मैदान छोड़ने के बाद शुरू हुआ यह अंतर्कलह अब पार्टी के लिए 'अस्तित्व का संकट' बनता दिख रहा है। विधानसभा के संख्या बल के अनुसार कांग्रेस के हिस्से में एक सीट आना तय है, जिस पर अब तक दिग्विजय सिंह काबिज थे।
उनके चुनाव न लड़ने के फैसले के बाद राहुल गांधी की करीबी मीनाक्षी नटराजन का नाम लगभग तय माना जा रहा था, लेकिन वरिष्ठ नेता सज्जन सिंह वर्मा ने 'वरिष्ठता' का कार्ड खेलकर दिल्ली तक हलचल मचा दी है। वर्मा ने दो टूक कहा, "मैंने उम्र भर दरी बिछाई है, अब हक वरिष्ठता का है।" यह खींचतान केवल दो नेताओं की नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर 'संगठन बनाम वफादारी' की पुरानी जंग को हवा दे रही है।
भाजपा की 'तीसरी नजर' और क्रॉस वोटिंग का खौफ
सियासी गलियारों में चर्चा गरम है कि कांग्रेस की इस सिर-फुटौव्वल को देखते हुए भाजपा रणनीतिक तौर पर अपना तीसरा प्रत्याशी उतार सकती है। भाजपा के रणनीतिकार जानते हैं कि कांग्रेस के असंतुष्ट खेमे में सेंधमारी कर 'क्रॉस वोटिंग' कराई जा सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो कांग्रेस को अपनी इकलौती सीट बचाने के लिए भी लाले पड़ जाएंगे।
बिखरता कुनबा: टूट की आहट?
कांग्रेस की हालत 'कोढ़ में खाज' जैसी है। हाल ही में विधानसभा में उपनेता हेमंत कटारे का पद छोड़ना इस बात का संकेत है कि पार्टी के भीतर सबकुछ ठीक नहीं है। चर्चा है कि राज्यसभा चुनाव के बहाने प्रदेश कांग्रेस में एक बार फिर बड़ी टूट हो सकती है। भाजपा के चाणक्य इस 'ऑपरेशन' को अमलीजामा पहनाने की तैयारी में जुट गए हैं।
अब देखना यह है कि हाईकमान इस कलह को शांत करता है या भाजपा एक बार फिर कांग्रेस के जख्मों पर अपनी जीत की इबारत लिखती है। सज्जन सिंह वर्मा ने कहा कि मैंने दशकों तक एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह पार्टी की निस्वार्थ सेवा की है। वरिष्ठता के नाते इस बार मेरा हक बनता है। मीनाक्षी नटराजन भी दावेदार हैं, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन चूंकि दिग्विजय सिंह जी ने चुनाव न लड़ने का फैसला लिया है, ऐसे में पार्टी को वरिष्ठता और जमीनी संघर्ष का सम्मान करना चाहिए।