जनवादी लेखक संघ ने मनाया स्थापना दिवस
By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: February 16, 2026 13:37 IST2026-02-16T13:36:24+5:302026-02-16T13:37:16+5:30
सम्प्रदायिकता, साम्राज्यवाद, शोषण, असमानता का कोई स्थान नहीं है। यह संगठन प्रेमचंद की परंपरा, प्रगतिशील आंदोलन की विरासत, जनवादी सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा को प्रतिबद्ध है।

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मथुराः जनवादी लेखक संघ का स्थापना दिवस साहित्यिक गरिमा के साथ चन्दनवन स्थित एएचएम स्कूल में मनाया गया। आयोजन को महान शायर मिर्जा गालिब की स्मृति से जोड़ते हुए “ग़ालिब की ग़ज़लों में जनपक्षधरता” विषय पर गोष्ठी एवं काव्यपाठ का आयोजन भी हुआ। अध्यक्षीय संबोधन में टिकेंद्र शाद ने कहा कि जनवादी लेखक संघ की स्थापना साहित्य को जनता के पक्ष में संगठित करने के उद्देश्य से हुई थी। आज के समय में जब सामाजिक असमानता, अन्याय और सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहे हैं, तब साहित्य की जनपक्षधर भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
उन्होंने कहा कि ग़ालिब की शायरी मनुष्य की गरिमा और संवेदना को बचाए रखने का संदेश देती है। मुख्य वक्ता डॉ. जेड हसन ने कहा कि ग़ालिब को केवल रूमानी शायर मानना उनके काव्य का अधूरा मूल्यांकन है। उनकी ग़ज़लों में अपने समय की विडंबनाएँ, औपनिवेशिक दमन की पीड़ा और सामाजिक विघटन की गूँज स्पष्ट सुनाई देती है।
उन्होंने कहा कि ग़ालिब की मानवीय दृष्टि और प्रश्नाकुलता उन्हें जनपक्षधर परंपरा से जोड़ती है। विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. धर्मराज ने कहा कि जनवादी लेखक संघ भारतीय सांस्कृतिक-साहित्यिक आंदोलन की वह धारा है, जो साहित्य को समाज से पृथक नहीं मानती। यह संगठन लेखन को जनजीवन के संघर्षों, आशाओं, सपनों और प्रतिरोध से जोड़ता है।
जलेस की मूल मान्यताएँ केवल सौंदर्य-सृष्टि नहीं बल्कि सामाजिक चेतना का विस्तार है, जिसमें सम्प्रदायिकता, साम्राज्यवाद, शोषण, असमानता का कोई स्थान नहीं है। यह संगठन प्रेमचंद की परंपरा, प्रगतिशील आंदोलन की विरासत, जनवादी सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा को प्रतिबद्ध है। यही वैचारिक प्रतिबद्धता का ग़ालिब की चेतना के बीच गहरा संबंध है।
ग़ालिब की ग़ज़लों में दरअसल सामूहिक पीड़ा का स्वर है। उनकी शायरी चेतना की मुक्ति और मनुष्य की अस्मिता की रक्षा का साहित्यिक प्रयास है। संचालन करते हुए प्रसून पाण्डेय ने कहा कि जनवादी साहित्य केवल नारेबाज़ी नहीं, बल्कि संवेदना और विचार का संतुलित हस्तक्षेप है। ग़ालिब की रचनाएँ यह प्रमाणित करती हैं कि परंपरा के भीतर भी प्रतिरोध की सशक्त धारा मौजूद रहती है।
गोष्ठी के उपरांत काव्यपाठ का आयोजन किया गया, जिसमें प्रसून पाण्डेय, डॉ. अनिल दिनकर, जितेन्द्र सिंह विमल, मुहम्मद अहमदुल्ला शारिब, टिकेंद्र शाद तथा डॉ. धर्मराज ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। कवियों ने समकालीन सामाजिक सरोकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनजीवन की संवेदनाओं को अपनी कविताओं में अभिव्यक्त किया।
कार्यक्रम के अंत में साहित्य को जनसंघर्षों से जोड़ने और जनवादी मूल्यों को सुदृढ़ करने का संकल्प व्यक्त किया गया। कार्यक्रम में नरेन्द्र कुमार शर्मा, मो हकीमुद्दीन, डॉ देवेन्द्र गुलशन, नगेन्द्र चतुर्वेदी, अर्पित जादौन, विवेकदत्त मथुरिया, डॉ कैलाश चंद, रविप्रकाश भारद्वाज, मो बुरहानुद्दीन आदि उपस्थित रहे।