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शादी के लिए नोटिस का अनिवार्य प्रकाशन निजता के अधिकार का उल्लंघन : अदालत

By भाषा | Updated: January 13, 2021 22:28 IST

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लखनऊ, 13 जनवरी इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बुधवार को एक अहम आदेश में विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी के लिए संबंधित नोटिस को अनिवार्य रूप से प्रकाशित कराने को निजता के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए इसे वैकल्पिक करार दिया है।

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी की अदालत ने अभिषेक कुमार पांडे द्वारा दाखिल एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करने के बाद कहा कि विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी के लिए 30 दिन पहले नोटिस का अनिवार्य प्रकाशन कराना स्वतंत्रता और निजता के मूल अधिकार का उल्लंघन है।

उन्होंने अपने आदेश में कहा कि नोटिस के अनिवार्य प्रकाशन से राज्य सरकार या अन्य किसी पक्ष के हस्तक्षेप के बगैर आवेदनकर्ता जोड़े की अपने जीवनसाथी के चुनाव करने की स्वतंत्रता प्रभावित होगी।

पीठ ने कहा कि अब से विवाह के इच्छुक पक्षों के लिए यह वैकल्पिक होगा। उन्हें विवाह अधिकारी को यह लिखकर अनुरोध करना होगा कि वह अपने विवाह संबंधी नोटिस को प्रकाशित कराना चाहते हैं या नहीं।

अदालत ने कहा कि अगर आवेदनकर्ता पक्ष नोटिस का प्रकाशन नहीं कराना चाहता तो विवाह अधिकारी को 30 दिन के अंदर विवाह संपन्न कराना होगा।

उच्च न्यायालय का यह आदेश उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गैरकानूनी धर्मांतरण रोधी अध्यादेश 2020 लागू किए जाने के बाद आया है, जिसमें अंतर धार्मिक विवाह के मामले में जिलाधिकारी से अनुमति समेत कई कड़े नियम और शर्तें लागू की गई हैं।

इस अध्यादेश के तहत व्यवस्था है कि अगर केवल विवाह के लिए धर्मांतरण कराया जाता है तो उस शादी को निष्प्रभावी भी घोषित किया जा सकता है। अध्यादेश के तहत धर्मांतरण जबरन नहीं कराया गया है, इसके निर्धारण का दारोमदार मामले के अभियुक्त और धर्म अंतरित व्यक्ति पर होगा।

अदालत ने अभिषेक कुमार पांडे द्वारा दाखिल एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया के विवाह करने के इच्छुक दोनों पक्षों की पहचान उनकी आयु और सहमति की वैधता प्रमाणित करना विवाह अधिकारी के हाथ में होगा, अगर अधिकारी को किसी तरह का संदेह होगा तो वह अपने सवालों के जवाब में साक्ष्य मांग सकता है।

मामले के वादी अभिषेक कुमार पांडे ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी सूफिया सुल्ताना ने हिंदू रीति रिवाज से उसके साथ विवाह किया है और अपना नाम बदलकर सिमरन कर लिया है, मगर उसकी पत्नी का पिता उसे उसे अवैध तरीके से अपने साथ जबरन रख रहा है।

हालांकि दोनों पक्षों के बीच विवाद समाप्त हो गया लेकिन अदालत ने विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत शादी के लिए 30 दिन पहले नोटिस प्रकाशित कराने की अनिवार्यता का संज्ञान लिया।

विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत अंतर धार्मिक विवाह करने के इच्छुक युगल को जिला विवाह अधिकारी के समक्ष एक लिखित नोटिस देना होता है।

अदालत ने कहा कि किसी भी कानून के तहत ऐसी किसी भी नोटिस की अनिवार्यता की आवश्यकता नहीं है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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