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बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की आगे की मियाद तय करेंगे झारखंड चुनाव?

By एस पी सिन्हा | Updated: August 29, 2019 19:39 IST

झारखंड विधानसभा चुनाव जेडीयू और भाजपा गठबंधन की आगे की मियाद तय कर सकता है। राजद समेत विपक्षी दल जहां नीतीश कुमार के प्रति नरम रुख दिखा रहे हैं वहीं, झारखंड में बीजेपी के साथ उनके दल की तल्खी देखी जा रही है।

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बिहार में सत्तारूढ़ दल जदयू अब झारखंड में शून्य से शिखर तक पहुंचने जी जुगत में जुट गया है. हालांकि उसके मंसूबे को पहले तो चुनाव आयोग ने ही उसके चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर धाराशायी कर दिया है. बावजूद इसके आत्मविश्वास से लबरेज जदयू चुनावी मुहिम में जी जान से जुट गई है.

इसी कड़ी में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 7 सितंबर को झारखंड के दौरे पर जा रहे हैं, जहां वह अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने का का काम करेंगे. नीतीश कुमार झारखंड में अधिक से अधिक सीट जीतने का गुरुमंत्र भी वहां के कार्यकर्ताओं को देकर वापस आयेंगे. 

यहां बता दें कि झारखंड विधानसभा चुनावों से पहले ही जदयू ने एकला चलने का ऐलान कर दिया है.

प्रदेश जदयू के अध्यक्ष सालखन मुर्मू ने दावा किया है कि पार्टी सभी 81 विधानसभा सीटों पर इस बार अकेले ही चुनाव लड़ने वाली है. मुर्मू का दावा है कि जदयू न सिर्फ अकेले चुनाव लड़ेगी, बल्कि जीत हासिल कर अपने दम पर सरकार भी बनाएगी. हालांकि अब झारखंड में अकेले चुनाव लड़ने के ऐलान का राजनीतिक मतलब भाजपा और जदयू के बीच बढ़ती दूरियों के रूप में देखा जाने लगा है.

सालखन के इस दावे पर कि वह अकेल लड़ेंगे और सरकार बनाएंगे, इस पर भाजपा की तरफ से कटाक्ष किए जा रहे हैं, लेकिन सलखान के बयान का मतलब निकालें तो यह साफ झलकता है कि अंदर ही अंदर दोनों दलों के बीच काफी कटुता धीरे-धीरे निकल सामने आने लगी है.

सलखान के बयान पर झारखंड भाजपा भी आपत्ति जता चुकी है. प्रदेश भाजपा का कहना है कि इस तरह के बयानों से बचना चाहिए.

जदयू को गठबंधन धर्म का पालन करना चाहिए. भाजपा बहुमत में आने पर भी सहयोगियों को सम्मान दे रही है. ऐसी स्थिति में जबकि झारखंड में जदयू का जनाधार कमजोर और संगठन भी मजबूत नहीं है तब जदयू प्रदेश अध्यक्ष का यह बयान एक तरह से दबाव बनाने की रणनीति ही समझा जा सकता है. हालांकि, यह कोशिश कामयाब होती नहीं नजर आ रही है. इस राजनीतिक उठा-पठक के बीच यह चर्चा है कि क्या भाजपा और जदयू के बीच एक बार फिर से सियासी तलाक होने वाला है?

ऐसे में यह आशंका है कि क्या अक्टूबर-नवंबर 2020 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश और भाजपा की राहें जुदा होने वाली हैं?

नीतीश कुमार और भाजपा के बीच की दूरी बढ़ते देख राजद की ओर से भी बार-बार साथ सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं. राजद के कई बड़े नेता नीतीश कुमार का गुणगान करने से नहीं थक रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, शिवानंद तिवारी, मनोज झा से लेकर रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेत भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होने के फैसले पर नीतीश कुमार की तारीफ कर चुके हैं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या वाकई नीतीश कुमार समय का इंतजार कर रहे हैं.

एक तरफ राजद की तरफ से नीतीश कुमार को लगातार पुचकारा जा रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ नीतीश कुमार शांत बैठे हैं. कुल मिलाकर नीतीश कुमार और भाजपा में अंदरखाने तकरार की राजनीति अभी कुछ दिन और चल सकती है. लेकिन झारखंड में दोनों के बीच तल्खी भी देखी जा सकती है, जदयू द्वारा झारखंड में भाजपा पर तीर छोड़े जा सकते हैं, लेकिन भाजपा उन तीरों से खुद का बचाव कैसे करती है अथवा जवाबी कार्रवाई करती है, यह तो वक्त हीं बतायेगा. कुल मिलकर सबकी निगाहें झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव पर टिकी होंगी, जहां दो दोस्त आमने सामने शब्दों की बौछार करते नजर आयेंगे।

टॅग्स :झारखंडझारखंड विधानसभा चुनाव 2019भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)जेडीयूबिहारआरजेडी
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