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बिहार में फाइनेंस कंपनियों के कर्ज से परेशान लोग आत्महत्या करने को मजबूर, पुलिस ने लिया गंभीरता से, ईओयू को दी कार्रवाई की जिम्मेदारी

By एस पी सिन्हा | Updated: December 21, 2025 21:27 IST

आत्महत्या के मामलों में सबसे अधिक वृद्धि जून, मई और मार्च में देखने को मिली, जहां क्रमशः 84, 64 और 54 मौतें दर्ज की गईं।

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पटना: बिहार में फाइनेंस कंपनियों के कर्ज और आर्थिक तंगी से परेशान परिवार के सामूहिक आत्महत्या का मामला सामने आने के बाद बिहार सरकार हरकत में आ गई है। ऐसे में राज्य सरकार ने यह निर्णय लिया है कि आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) बिहार में संचालित नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) की वित्तीय अनियमितताओं के खिलाफ कार्रवाई तेज करेगी। ईओयू दर्ज प्राथमिकी के आधार पर जल्द आरोप पत्र दाखिल करेगी।

पटना: बिहार में फाइनेंस कंपनियों के कर्ज और आर्थिक तंगी से परेशान परिवार के सामूहिक आत्महत्या का मामला सामने आने के बाद बिहार सरकार हरकत में आ गई है। ऐसे में राज्य सरकार ने यह निर्णय लिया है कि आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) बिहार में संचालित नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) की वित्तीय अनियमितताओं के खिलाफ कार्रवाई तेज करेगी। ईओयू दर्ज प्राथमिकी के आधार पर जल्द आरोप पत्र दाखिल करेगी। दरअसल, फाइनेंस कंपनियों की सेल्फ रेगुलेटरी ऑर्गेनाइजेशन साधन के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 2 करोड़ 2 लाख से अधिक लोन एकाउंट हैं। यह पूरे देश में सबसे अधिक है। 

बिहार के लोगों पर माइक्रो फाइनेंस कंपनियों का 57 हजार 712 करोड़ रुपए का कर्ज है। यह भी देश में सबसे ज्यादा है। बिहार में प्रति लोन एकाउंट 28 हजार 525 रुपए देनदारी है। माइक्रो फाइनेंस कंपनियों से लोन लेने वाले देश के टॉप 10 जिलों में 5 बिहार के हैं। बिहार के पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर जैसे जिले सबसे अधिक लोन लेने वाले जिलों में शुमार हैं। पटना में आयोजित ‘अनियमित जमा योजनाओं पर प्रतिबंध अधिनियम, 2019’ (बैनिंग ऑफ अन-रेगुलेटेड डिपोजिट स्कीम एक्ट, 2019 ) के तहत गठित राज्य स्तरीय समन्वय समिति (एसएलसीसी) की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि जो मामले जांच के स्तर पर हैं, उन्हें जल्द से जल्द सक्षम न्यायालय में स्थानांतरित किया जाए। शिकायत गलत पाए जाने वाले मामलों को बंद किया जाए। 

साथ ही, यह भी निर्णय लिया गया कि राज्य में आम लोगों को फर्जी एनबीएफसी की गतिविधियों से बचाने के लिए जागरूकता अभियान को नियमित रूप से किया जाए। इसमें सभी हितधारक अपने-अपने सोशल मीडिया, विज्ञापन एवं अन्य माध्यमों से प्रचार-प्रसार कराएं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का सकरा ब्लॉक इस अवैध धंधे का केंद्र बन गया है। रिपोर्ट के अनुसार, अकेले इस ब्लॉक में लगभग 80 गैर-बैंकिंग कंपनियां काम कर रही हैं, जिनमें से अधिकांश के पास वैध लाइसेंस तक नहीं है। 

हाल ही में नवलपुर मिश्रौलिया गांव में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी, जहां एक मजदूर की पत्नी दीपा ने कर्ज वसूली के दबाव में आकर अपनी दो मासूम बेटियों के साथ आत्महत्या कर ली। दीपा ने 'भारत फाइनेंस' और 'एसकेएमएस माइक्रो फाइनेंस' जैसी संस्थाओं से कर्ज लिया था। पड़ोसियों का कहना है कि वसूली एजेंटों के डराने-धमकाने और मानसिक उत्पीड़न ने उसे इस आत्मघाती कदम के लिए मजबूर किया। 30 प्रतिशत ब्याज और 'गुंडा' वसूली इन गुंडा बैंकों का काम करने का तरीका किसी माफिया से कम नहीं है। 

ये कंपनियां छोटे ऋणों पर 30 प्रतिशत तक की अत्यधिक ब्याज दरें वसूलती हैं। जब कोई परिवार किस्त देने में असमर्थ होता है, तो आपराधिक पृष्ठभूमि वाले रिकवरी एजेंटों को भेजा जाता है। ये एजेंट महिलाओं को सरेआम अपमानित करते हैं, जिससे कई परिवार अपना राशन, गहने और यहां तक कि घर के बर्तन बेचने को मजबूर हो जाते हैं। पिछले साल मार्च में बाजीदपुर गांव के शिवनाथ दास और उनकी पत्नी भुखली देवी ने भी इसी तरह कर्ज के दबाव में जान दे दी थी। बावजूद इसके, संबंधित कंपनियों पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। 

जिले के वरिष्ठ उप-समाहर्ता विकास कुमार स्वीकार करते हैं कि मुजफ्फरपुर जिले में केवल 22 कंपनियां ही पंजीकृत हैं, जबकि अवैध रूप से चलने वाली कंपनियों की संख्या अनगिनत है। बिहार में इस साल करीब बीस आत्महत्याएं हुई हैं, जिनमें 2 मार्च को दरभंगा की रीना देवी ने कर्ज के दबाव में आत्महत्या की। 1 अप्रैल को सहरसा के देवानंद पासवान ने आत्महत्या की। 6 अप्रैल को बेगूसराय की सुधा देवी ने कर्ज के कारण आत्महत्या की। 30 मई को बेगूसराय की धर्मशीला देवी ने आत्महत्या कर ली। 

14 अगस्त को पटना के पालीगंज में किसान सियाराम साह ने आत्महत्या की। 15 नवंबर सारण में रिंकी देवी नामक महिला ने आत्महत्या की। 15 दिसंबर को मुजफ्फरपुर में अमरनाथ राम ने अपने 3 बच्चों के साथ आत्महत्या कर ली। 15 दिसंबर को मुजफ्फरपुर जिले के सकरा थाना इलाके में अमरनाथ राम ने अपनी तीन बच्चियों संग फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इसके बाद 17 दिसंबर को मुंगेर की गुड़िया देवी ने आत्महत्या कर ली। 

इन सभी आत्महत्याओं के पीछे लोन, रिकवरी एजेंट का दबाव जैसे कारण शामिल थे। माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के दबाव में आकर सिर्फ लोन लेने वालों ने नहीं बल्कि कर्मियों ने भी आत्महत्या की है। पटना में मार्च के महीने में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के दो कर्मचारियों ने आत्महत्या की। उनमें से एक कर्मी अनन्या ने अपने हाथ पर लिखा था, "कंपनी अच्छी नहीं है, कोई मरता है तो किसी को फर्क नहीं पड़ता है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में आत्महत्या के मामले हर साल बढ़ते जा रहे हैं। 2023 में दर्ज आत्महत्या के मामलों में 15 फीसदी की वृद्धि हुई। इनमें से बड़ी संख्या छात्रों, किसानों और स्वास्थ्य कर्मियों की है। अगर हम आत्महत्या की आंकड़े की बात करें तो जनवरी में 12, फरवरी में 31, मार्च में 54, अप्रैल में 32, मई में 64 ,जून में 84, जुलाई में 72, अगस्त में 67, सितंबर में 69, अक्टूबर में 34, नवंबर में 52 आत्महत्या की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। आत्महत्या के मामले में 2024 एक दर्दनाक वर्ष साबित हुआ। 

जनवरी से लेकर दिसंबर तक आत्महत्या करने वालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। आत्महत्या के मामलों में सबसे अधिक वृद्धि जून, मई और मार्च में देखने को मिली, जहां क्रमशः 84, 64 और 54 मौतें दर्ज की गईं। मई और जून तो आत्महत्या के मामलों में सबसे संवेदनशील महीने रहे। इन आत्महत्या के कारणों में मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक तनाव, आर्थिक समस्याएं, और सामाजिक दबाव प्रमुख कारण बने। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते तनाव और दबाव के कारण लोग आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं। 

ऐसे में बिहार में फाइनेंस कंपनियों के दबाव के कारण बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं को लेकर पुलिस मुख्यालय ने गंभीरता से लिया है। राज्य के डीजीपी विनय कुमार ने बताया कि हमने ईओयू को इस दिशा में कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। राज्य में अवैध रूप से संचालित इन कंपनियों के खिलाफ प्रातहमिकी दर्ज कर शिघ्र न्याय दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। ईओयू न सिर्फ प्रथमिकी दर्ज करेगी बल्कि जल्द से जल्द चार्जशीट दाखिल कर सजा दिलाने में भी अहम भूमिका निभायेगी।

बिहार के लोगों पर माइक्रो फाइनेंस कंपनियों का 57 हजार 712 करोड़ रुपए का कर्ज है। यह भी देश में सबसे ज्यादा है। बिहार में प्रति लोन एकाउंट 28 हजार 525 रुपए देनदारी है। माइक्रो फाइनेंस कंपनियों से लोन लेने वाले देश के टॉप 10 जिलों में 5 बिहार के हैं। बिहार के पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर जैसे जिले सबसे अधिक लोन लेने वाले जिलों में शुमार हैं। पटना में आयोजित ‘अनियमित जमा योजनाओं पर प्रतिबंध अधिनियम, 2019’ (बैनिंग ऑफ अन-रेगुलेटेड डिपोजिट स्कीम एक्ट, 2019 ) के तहत गठित राज्य स्तरीय समन्वय समिति (एसएलसीसी) की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि जो मामले जांच के स्तर पर हैं, उन्हें जल्द से जल्द सक्षम न्यायालय में स्थानांतरित किया जाए। शिकायत गलत पाए जाने वाले मामलों को बंद किया जाए। 

साथ ही, यह भी निर्णय लिया गया कि राज्य में आम लोगों को फर्जी एनबीएफसी की गतिविधियों से बचाने के लिए जागरूकता अभियान को नियमित रूप से किया जाए। इसमें सभी हितधारक अपने-अपने सोशल मीडिया, विज्ञापन एवं अन्य माध्यमों से प्रचार-प्रसार कराएं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का सकरा ब्लॉक इस अवैध धंधे का केंद्र बन गया है। रिपोर्ट के अनुसार, अकेले इस ब्लॉक में लगभग 80 गैर-बैंकिंग कंपनियां काम कर रही हैं, जिनमें से अधिकांश के पास वैध लाइसेंस तक नहीं है। 

हाल ही में नवलपुर मिश्रौलिया गांव में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी, जहां एक मजदूर की पत्नी दीपा ने कर्ज वसूली के दबाव में आकर अपनी दो मासूम बेटियों के साथ आत्महत्या कर ली। दीपा ने 'भारत फाइनेंस' और 'एसकेएमएस माइक्रो फाइनेंस' जैसी संस्थाओं से कर्ज लिया था। पड़ोसियों का कहना है कि वसूली एजेंटों के डराने-धमकाने और मानसिक उत्पीड़न ने उसे इस आत्मघाती कदम के लिए मजबूर किया। 30 प्रतिशत ब्याज और 'गुंडा' वसूली इन गुंडा बैंकों का काम करने का तरीका किसी माफिया से कम नहीं है। 

ये कंपनियां छोटे ऋणों पर 30 प्रतिशत तक की अत्यधिक ब्याज दरें वसूलती हैं। जब कोई परिवार किस्त देने में असमर्थ होता है, तो आपराधिक पृष्ठभूमि वाले रिकवरी एजेंटों को भेजा जाता है। ये एजेंट महिलाओं को सरेआम अपमानित करते हैं, जिससे कई परिवार अपना राशन, गहने और यहां तक कि घर के बर्तन बेचने को मजबूर हो जाते हैं। पिछले साल मार्च में बाजीदपुर गांव के शिवनाथ दास और उनकी पत्नी भुखली देवी ने भी इसी तरह कर्ज के दबाव में जान दे दी थी। बावजूद इसके, संबंधित कंपनियों पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। 

जिले के वरिष्ठ उप-समाहर्ता विकास कुमार स्वीकार करते हैं कि मुजफ्फरपुर जिले में केवल 22 कंपनियां ही पंजीकृत हैं, जबकि अवैध रूप से चलने वाली कंपनियों की संख्या अनगिनत है। बिहार में इस साल करीब बीस आत्महत्याएं हुई हैं, जिनमें 2 मार्च को दरभंगा की रीना देवी ने कर्ज के दबाव में आत्महत्या की। 1 अप्रैल को सहरसा के देवानंद पासवान ने आत्महत्या की। 6 अप्रैल को बेगूसराय की सुधा देवी ने कर्ज के कारण आत्महत्या की। 30 मई को बेगूसराय की धर्मशीला देवी ने आत्महत्या कर ली। 

14 अगस्त को पटना के पालीगंज में किसान सियाराम साह ने आत्महत्या की। 15 नवंबर सारण में रिंकी देवी नामक महिला ने आत्महत्या की। 15 दिसंबर को मुजफ्फरपुर में अमरनाथ राम ने अपने 3 बच्चों के साथ आत्महत्या कर ली। 15 दिसंबर को मुजफ्फरपुर जिले के सकरा थाना इलाके में अमरनाथ राम ने अपनी तीन बच्चियों संग फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इसके बाद 17 दिसंबर को मुंगेर की गुड़िया देवी ने आत्महत्या कर ली। 

इन सभी आत्महत्याओं के पीछे लोन, रिकवरी एजेंट का दबाव जैसे कारण शामिल थे। माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के दबाव में आकर सिर्फ लोन लेने वालों ने नहीं बल्कि कर्मियों ने भी आत्महत्या की है। पटना में मार्च के महीने में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के दो कर्मचारियों ने आत्महत्या की। उनमें से एक कर्मी अनन्या ने अपने हाथ पर लिखा था, "कंपनी अच्छी नहीं है, कोई मरता है तो किसी को फर्क नहीं पड़ता है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में आत्महत्या के मामले हर साल बढ़ते जा रहे हैं। 2023 में दर्ज आत्महत्या के मामलों में 15 फीसदी की वृद्धि हुई। इनमें से बड़ी संख्या छात्रों, किसानों और स्वास्थ्य कर्मियों की है। अगर हम आत्महत्या की आंकड़े की बात करें तो जनवरी में 12, फरवरी में 31, मार्च में 54, अप्रैल में 32, मई में 64 ,जून में 84, जुलाई में 72, अगस्त में 67, सितंबर में 69, अक्टूबर में 34, नवंबर में 52 आत्महत्या की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। आत्महत्या के मामले में 2024 एक दर्दनाक वर्ष साबित हुआ। 

जनवरी से लेकर दिसंबर तक आत्महत्या करने वालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। आत्महत्या के मामलों में सबसे अधिक वृद्धि जून, मई और मार्च में देखने को मिली, जहां क्रमशः 84, 64 और 54 मौतें दर्ज की गईं। मई और जून तो आत्महत्या के मामलों में सबसे संवेदनशील महीने रहे। इन आत्महत्या के कारणों में मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक तनाव, आर्थिक समस्याएं, और सामाजिक दबाव प्रमुख कारण बने। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते तनाव और दबाव के कारण लोग आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं। 

ऐसे में बिहार में फाइनेंस कंपनियों के दबाव के कारण बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं को लेकर पुलिस मुख्यालय ने गंभीरता से लिया है। राज्य के डीजीपी विनय कुमार ने बताया कि हमने ईओयू को इस दिशा में कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। राज्य में अवैध रूप से संचालित इन कंपनियों के खिलाफ प्रातहमिकी दर्ज कर शिघ्र न्याय दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। ईओयू न सिर्फ प्रथमिकी दर्ज करेगी बल्कि जल्द से जल्द चार्जशीट दाखिल कर सजा दिलाने में भी अहम भूमिका निभायेगी।

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