बिहार में राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष ने झोंकी पूरी ताकत, विधायकों को एकजुट रखना बनी बड़ी चुनौती
By एस पी सिन्हा | Updated: March 13, 2026 18:23 IST2026-03-13T18:23:12+5:302026-03-13T18:23:17+5:30
इस चुनाव में सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्षी महागठबंधन दोनों की नजर उन विधायकों पर टिकी है जो किसी भी खेमे में खुलकर शामिल नहीं हैं। ऐसे विधायकों का रुख ही इस सीट का फैसला कर सकता है। सवाल यह कि-आखिर कौन किसे वोट देगा?

बिहार में राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष ने झोंकी पूरी ताकत, विधायकों को एकजुट रखना बनी बड़ी चुनौती
पटना:बिहार से राज्यसभा की 5 सीटों के लिए 16 मार्च को चुनाव होना है। यह चुनाव एनडीए के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बनी हुई है क्योंकि पांचों सीटों को जीतने के लिए एनडीए ने पांच उम्मीदवार उतारे हैं। वहीं राजद भी एक सीट पर जीत हासिल करने लिए लड़ाई में उतरी है। ऐसे में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने अपने विधायकों को एकजुट रखने में जुटे हुए हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस बार मुकाबले में गणित काफी पेचीदा हो गया है। खासकर पांचवीं सीट को लेकर संशय बना हुआ है। इस चुनाव में सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्षी महागठबंधन दोनों की नजर उन विधायकों पर टिकी है जो किसी भी खेमे में खुलकर शामिल नहीं हैं। ऐसे विधायकों का रुख ही इस सीट का फैसला कर सकता है। सवाल यह कि-आखिर कौन किसे वोट देगा?
बता दें कि राज्यसभा चुनाव में एक उम्मीदवार को जीत के लिए 41 वोट की जरूरत होती है। बिहार विधानसभा में एनडीए के पास कुल 202 विधायकों का समर्थन बताया जा रहा है। इस संख्या के आधार पर गठबंधन चार सीटों पर जीत लगभग तय मान रहा है। लेकिन पांचवीं सीट पर मामला अटकता दिखाई दे रहा है। इस सीट के लिए एनडीए के पास करीब 38 वोट ही माने जा रहे हैं। ऐसे में उसे जीत के लिए कम से कम तीन अतिरिक्त वोट की जरूरत होगी। एनडीए खेमे एक एक विधायक जदयू के मोकामा से निर्वाचित अनंत सिंह जेल में हैं।
ऐसे में राज्यसभा चुनाव के दौरान उनके मतदान के लिए उन्हें जेल से बाहर आना होगा। इसे लेकर शुक्रवार को एमपी एमएलए कोर्ट ने फैसला दिया है कि अनंत सिंह राज्यसभा चुनाव में वोट डालेंगे। वे कस्टडी में विधानसभा आयेंगे और वोट डालकर वापस जेल जायेंगे। उधर, पटना में एनडीए विधायकों की एक अहम बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय पर्यवेक्षक और छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा और केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्होत्रा भी शामिल हुए।
भाजपा की ओर से यह बैठक उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सरकारी आवास पर आयोजित की गई, जहां देर रात तक रणनीति पर चर्चा चलती रही। विधायकों को खास तौर पर सतर्क रहने की सलाह दी गई। इसके साथ ही एनडीए के सभी विधायकों को 16 मार्च तक पटना में ही रहने का निर्देश दिया गया है। यानी मतदान होने तक कोई भी विधायक पटना नहीं छोड़ेगा। नेताओं ने साफ कहा कि अगर किसी तरह का अज्ञात फोन कॉल आए या कोई कहीं बुलाए तो उस पर ध्यान न दें और बिना जानकारी के कहीं न जाएं।
दरअसल, राजनीतिक गलियारों में क्रॉस वोटिंग की आशंका को लेकर भी चर्चा हो रही है। हालांकि एनडीए नेता खुले तौर पर इसे स्वीकार नहीं कर रहे, लेकिन एहतियात के तौर पर विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश की जा रही है। इसलिए सभी विधायकों से कहा गया है कि वे पार्टी की रणनीति का पूरी तरह पालन करें और मतदान तक सतर्क रहें। अगर विधानसभा के संख्या बल की बात करें तो एनडीए काफी मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है।
बिहार विधानसभा में एनडीए के कुल 202 विधायक हैं। इनमें भाजपा के 89, जदयू के 85, लोजपा (रामविलास) के 19, हिंदुस्तानी अवामी मोर्चा (हम) के 5 और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के 4 विधायक शामिल हैं। वहीं दूसरी ओर महागठबंधन अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में है। महागठबंधन में राजद के 25, कांग्रेस के 6, भाकपा (माले) के 2, सीपीआई के 1 और इंडियन इंक्लूसिव पार्टी के 1 विधायक हैं। लेकिन इन सबके बीच असली खेल पांचवीं सीट के गणित पर टिका हुआ है।
राजनीतिक आंकड़ों के मुताबिक इस सीट को जीतने के लिए एनडीए को 3 अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत है, जबकि महागठबंधन को 6 अतिरिक्त विधायकों का समर्थन जुटाना होगा। यही वजह है कि इस चुनाव में एआईएमआईएम और बसपा के विधायक बेहद अहम भूमिका में आ गए हैं। एआईएमआईएम के 5 विधायक और बसपा का 1 विधायक इस चुनाव में किंगमेकर की भूमिका निभा सकते हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि ये विधायक किसका साथ देते हैं।
उल्लेखनीय है कि एनडीए की ओर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, भाजपा नेता नितिन नवीन, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा, जदयू नेता रामनाथ ठाकुर और भाजपा नेता शिवेश राम को उम्मीदवार बनाया गया है। जबकि विपक्ष की ओर से राजद ने उद्योगपति और नेता अमरेंद्र धारी सिंह उर्फ एडी सिंह को उम्मीदवार बनाया है। उनका कहना है कि वे सिर्फ मुकाबले के लिए नहीं बल्कि जीत के लक्ष्य के साथ चुनाव लड़ रहे हैं।