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विधायक विधानसभा में रिवॉल्वर तान दे तो क्या उस पर मामला दर्ज नहीं होगा? : न्यायालय

By भाषा | Updated: July 15, 2021 20:11 IST

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नयी दिल्ली, 15 जुलाई उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि अगर कोई विधायक राज्य विधानसभा में रिवॉल्वर तान दे तो क्या उस पर मुकदमा चलाने की आवश्यकता नहीं होगी और क्या कोई कह सकता है कि उस पर मामला दर्ज नहीं किया जा सकता क्योंकि यह सदन के अंदर की घटना थी।

शीर्ष अदालत ने केरल सरकार की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह सवाल किया, जिसमें 2015 में विधानसभा के अंदर अभद्र व्यवहार के लिए वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के छह सदस्यों के खिलाफ दर्ज मुकदमा रद्द करने का अनुरोध किया गया। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने याचिका पर सुनवाई पूरी करते हुए केरल सरकार से पूछा कि क्या सदन के सदस्यों के खिलाफ मामलों को वापस लेने का अनुरोध करना सार्वजनिक न्याय है, जिन्होंने लोकतंत्र के पवित्र स्थान पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया था।

पीठ ने कहा, ‘‘सदन के भीतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन एक अतिवादी मामला लें जहां एक विधायक राज्य विधानसभा के अंदर रिवॉल्वर निकाल लेता है। क्या इससे उस सदस्य पर मुकदमा चलाने की आवश्यकता नहीं होगी? क्या कोई कह सकता है कि उस पर मामला दर्ज नहीं किया जा सकता क्योंकि यह घटना सदन के भीतर हुई और यह एक तरह का विरोध था? हम समझते हैं कि इन दिनों किए गए सुरक्षा उपायों के कारण ऐसा नहीं होगा, लेकिन यह एक उदाहरण है।’’

हालांकि, पीठ ने कहा कि जांच की जाने वाली बात यह है कि क्या आवेदन वापस लेने से कोई सार्वजनिक हित आगे बढ़ रहा था, क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष के आसन सहित सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा था और सरकार सार्वजनिक संपत्ति की संरक्षक है। लंबी सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने कहा कि घटना 2015 की है जब राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे और वित्त मंत्री सदन में बजट पेश करने वाले थे।

उन्होंने कहा, ‘‘विरोध प्रदर्शन हुए और धक्का-मुक्की में कुछ महिला सदस्य घायल हो गईं और उन्हें स्ट्रेचर पर ले जाया गया। एक प्राथमिकी विधायी सचिव द्वारा सदन के तत्कालीन सदस्यों के खिलाफ कथित रूप से हंगामे में शामिल होने के खिलाफ दर्ज करायी गयी थी और दूसरी प्राथमिकी महिला सदस्यों द्वारा दर्ज करायी गयी थी। महिला सदस्यों द्वारा दर्ज कराई गयी प्राथमिकी से शुरू मामला उच्च न्यायालय में लंबित है जबकि सचिव द्वारा दर्ज करायी गयी प्राथमिकी के मामले में वर्तमान सरकार ने उसे वापस लेने का आवेदन दिया है।’’

पीठ ने कहा कि अदालतों में भी कई बार दो वकीलों या यहां तक कि न्यायाधीशों और वकीलों के बीच तीखी बहस होती है, लेकिन क्या इससे संपत्ति के नुकसान को सही ठहराया जा सकता है। कुमार ने कहा कि यह राजनीतिक अभिव्यक्ति का मामला है क्योंकि यह एक विरोध था और विरोध का अधिकार भी एक तरह की अभिव्यक्ति है जिसे सदन में मान्यता प्राप्त है, जिसके अपने नियम हैं। उन्होंने कहा कि विधायी सचिव द्वारा दर्ज करायी गयी प्राथमिकी का कोई संवैधानिक आधार नहीं है क्योंकि अध्यक्ष ने कोई मंजूरी नहीं दी और मामले को शांत करने के लिए वर्तमान सरकार ने मुकदमा वापस लेने के लिए एक आवेदन दिया है।

कुछ आरोपी विधायकों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने कहा कि अब नयी सरकार है और अगर सरकारी वकील को लगता है कि यह एक राजनीतिक मुद्दा था तो यह वापसी का आधार हो सकता है। हस्तक्षेप करने वाले की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने मुकदमा वापस लेने का विरोध किया और कहा कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए विशेषाधिकार का दावा नहीं किया जा सकता है।

शीर्ष अदालत ने पांच जुलाई को कहा था कि उसे संसद और विधानसभाओं में सदस्यों के अनियंत्रित व्यवहार के बारे में ‘‘सख्त’’ दृष्टिकोण रखना होगा क्योंकि इस तरह की घटनाएं ‘‘आजकल बढ़ रही हैं’’ और इस तरह के आचरण को माफ नहीं किया जा सकता है।

केरल सरकार द्वारा दाखिल एक याचिका में 2015 में राज्य विधानसभा के अंदर हंगामे के संबंध में दर्ज एक आपराधिक मामले को वापस लेने के अनुरोध वाली उसकी याचिका को खारिज करने के उच्च न्यायालय के 12 मार्च के आदेश को चुनौती दी गई है। राज्य विधानसभा में 13 मार्च 2015 को अभूतपूर्व नजारा देखने को मिला था, जब (उस समय विपक्ष के) एलडीएफ सदस्यों ने तत्कालीन वित्त मंत्री के एम मणि को राज्य का बजट पेश करने से रोकने की कोशिश की थी। मणि बार रिश्वत घोटाले में आरोपों का सामना कर रहे थे।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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