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दिल्ली के आनंद विहार में प्रवासी मजदूरों की भयानक भीड़, कोरोना संक्रमण की चिंता किए बिना घर जाने को जुटे हजारों लोग, देखें वीडियो

By अनुराग आनंद | Updated: March 28, 2020 21:49 IST

कोरोना संक्रमण की चिंता किए बिना ही हजारों की संख्या में मजदूर यहां घर जाने के लिए जमा हो गए हैं।

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ठळक मुद्देयूपी सरकार की बसों द्वारा इन्हें अलग-अलग जगहों पर ले जाकर छोड़ा जा रहा है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल द्वारा भोजन का व्यवस्था किए जाने के बाद कई जगहों पर भोजन के लिए कतारों में लगी सैकड़ों की भीड़ लग रही है।

नई दिल्ली:दिल्ली के आनंद विहार में भारी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने घर वापस लौटने के लिए जमा हो गए हैं। कोरोना वायरस को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा देश भर में लगाए गए लॉकडाउन का इनपर जरा भी असर नहीं है।

कोरोना संक्रमण की चिंता किए बिना ही हजारों की संख्या में मजदूर यहां जमा हो गए हैं।  किसी दूसरे को संक्रमित कर देने का अंदेशा भी नहीं है। इन्हें घर जाना है, और इसीलिए बस में कैसे भी टिक जाने की बेताबी है।

आनंद बिहार बस बड्डे पर भी मजदूरों का ऐसा ही रेला है। जो मजदूर दिल्ली शहर को सुंदर बनाने के लिए अपना पसीना बहाता था, बड़े आलीशान महलों पर रस्सी के सहारे चढ़कर उन्हें सतरंगी बनाता था, आज वो सभी मजदूर वापस अपने घर जाने के लिए सिर पर बोरा और कंधे पर बच्चा लिए आनंद विहार में जमा हो गया है। यहां से यूपी सरकार की बसों द्वारा इन्हें अलग-अलग जगहों पर ले जाकर रखा जा रहा है। 

कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए केंद्र सरकार की ओर से लॉकडाउन का ऐलान किया गया, साथ ही लोगों से घरों में रहने की अपील की गई। हालांकि, सरकार के इस फैसले से दिहाड़ी मजदूरों और गरीबों की मुश्किलें बढ़ गई।

उनके सामने रोजी-रोटी की मुश्किल खड़ी हुई तो उन्हें अपने गांव याद आने लगा। दिल्ली समेत देशभर से मजदूरों के अपने गांवों को पलायन की खबरें सामने आ रही हैं।

दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर करीब 10 हजार से ज्यादा संख्या में मजदूर अपने घरों को जाने के लिए उमड़ पड़े। धौलाकुआं की भी स्थिति ज्यादा अलग नहीं थी, यहां भी हजारों की संख्या में मजदूर सड़क पर हैं।

इसके अलावा, बता दें कि लॉकडाउन संकट के बीच महामारी पर भारी भूख है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल द्वारा भोजन का व्यवस्था किए जाने के बाद कई जगहों पर भोजन के लिए कतारों में लगी सैकड़ों की भीड़ लग रही है। रामपाल प्रतिदिन अपना रिक्शा दिल्ली के निगमबोध घाट के नजदीक सड़क किनारे खड़ी कर देता है और सरकार की तरफ से संचालित एक आश्रय स्थल पर भोजन के लिए सैकड़ों लोगों की कतार में खड़ा हो जाता है। यहां कोरोना वायरस के खतरे और सामाजिक दूरी बनाए रखने की जरूरत पर गरीबों की भूख भारी पड़ रही है।

उत्तरप्रदेश के जौनपुर के रहने वाले रिक्शाचालक ने कहा, ‘‘किसी बीमारी से पहले भूख हमें मार डालेगी।’’वह उन हजारों लोगों की तरह महानगर में फंसा हुआ है जो दूसरी जगहों से यहां रोजगार की तलाश में आए हैं और 21 दिनों के बंद के समय में न तो वे अपने घर लौट सकते हैं न ही कुछ उपार्जन कर सकते हैं। भूख और बेरोजगारी से जूझ रहे रामपाल को कोरोना वायरस और इसके खतरे के बारे में जानकारी है लेकिन वह इसकी शायद ही परवाह करता है और यमुना पुश्ता में दैनिक मजदूरों, बेघर लोगों और भिखारियों की भीड़ के साथ भोजन का इंतजार करता है।

अधिकारियों ने बताया कि शुक्रवार को आश्रय स्थल के बाहर पांच हजार लोग इकट्ठा हुए और पेट की भूख में वे कम से कम एक मीटर की सामाजिक दूरी बनाने और संक्रमण के खतरे की परवाह भी नहीं करते। इनमें से अधिकतर लोगों ने मास्क नहीं लगाया है जिससे वे बीमारी का आसानी से शिकार बन सकते हैं जिसके कारण पूरी दुनिया में पांच लाख 90 हजार लोग संक्रमित हुए हैं और 27 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। भारत में अभी तक 820 से अधिक लोग इस वायरस से संक्रमित हुए हैं और 19 लोगों की मौत हो चुकी है।

करीब एक घंटे से प्रतीक्षारत रामपाल ने कहा, ‘‘मेरे पास क्या विकल्प है? मैं क्या कर सकता हूं? मैं दो दिनों से कुछ भी नहीं कमा पाया।’’ दूसरे आश्रय गृहों में भी यही हालात हैं। दिल्ली सरकार ने दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) से कहा है कि बेघरों प्रवासी मजदूरों को मुफ्त में भोजन मुहैया कराई जाए जो लॉकडाउन से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। डीयूएसआईबी राष्ट्रीय राजधानी में 234 रात्रि आश्रय गृहों का संचालन करता है।

डीयूएसआईबी के सदस्य ए के गुप्ता के मुताबिक वे प्रतिदिन 18 हजार लोगों को भोजन मुहैया करा सकते हैं लेकिन कभी-कभी इससे दोगुने लोगों को भोजन देना पड़ता है। सरकार भोजन पर प्रति व्यक्ति 20 रुपये खर्च करती है जिसमें चार रोटी या पुरी, चावल और दाल होता है।जंगपुरा में फुट ओवर ब्रिज पर बैठे भिखारी काशी ने कहा कि वह दयालु राहगीरों पर निर्भर है जिनकी संख्या बंद के कारण काफी कम गई है। पुलिस की कार्रवाई के खतरे के बीच चिट्टू यादव (55) ने अपना रिक्शा बाहर निकाला है ताकि कुछ पैसे कमा सके। उसने कहा, ‘‘मेरे बच्चे भूखे हैं और मेरे पास पैसे नहीं हैं।’’

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