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शीर्ष अदालत का पूर्व न्यायाधीश व मजिस्ट्रेट के बीच फोनवार्ता की जांच के आदेश पर रोक से इंकार

By भाषा | Updated: January 11, 2021 21:15 IST

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नयी दिल्ली, 11 जनवरी उच्चतम न्यायालय ने पूर्व न्यायाधीश वी ईश्वरैया और एक निलंबित मजिस्ट्रेट के बीच टेलीफोन पर हुयी कथित वार्ता की जांच के आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश पर सोमवार को रोक लगाने से इंकार कर दिया ।

न्यायमूर्ति ईश्वरैया ने स्वीकार किया है कि यह एक निजी बातचीत है, जो किसी अपराध का खुलासा नहीं करती है और इसलिए इसमें किसी प्रकार की जांच की आवश्यकता नहीं है। उनका यह भी कहना है कि इस वार्ता की लिपि थोड़ी बहुत गलत है।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने न्यायमूर्ति ईश्वरैया से कहा कि वह इस वार्ता और इसकी लिपि के बारे में हलफनामा दााखिल करें। पीठ ने कहा कि इस मामले में 18 जनवरी को विचार करके आदेश पारित किया जायेगा।

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के वकील इस वार्ता पर सवाल नहीं कर रहे हैं। वह इस वार्ता के बारे में याचिकाकर्ता का हलफनामा दाखिल करने की अनुमति चाहते हैं।

वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ईश्वरैया की ओर से उपस्थित अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सवाल उठाया, ‘‘एक निजी बातचीत को जांच का विषय कैसे बनाया जा सकता है? अगर यह उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण के बारे में है तो भी निजी बातचीत करना अपराध कैसे है? हमारा पक्ष सुने बगैर ही उच्च न्यायालय ने जांच का आदेश दे दिया? ऐसा कैसे हो सकता है?’’

उन्होंने इस मामले में नोटिस जारी करने और जांच के आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि इस जांच का कोई औचित्य नहीं है।

पीठ ने इस मामले में हस्तक्षेप करने वाले दलित बहुजन फ्रंट के महासचिव मेल्लम भाग्य राव की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से जानना चाहा कि इस विषय पर उनका क्या कहना है। सिब्बल ने कहा कि वह चाहते हैं कि उनके आवेदन पर नोटिस जारी किया जाये क्योंकि इस वार्ता के बारे में कुछ भी निजी नहीं है।

उन्होंने कहा, ‘‘यह व्यवस्था पर एक प्रेरित हमला है। इस बातचीत के बारे में निजी क्या है?’’

एक अन्य हस्तक्षेपकर्ता पी सैमुअल जॉन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और अधिवक्ता विपिन नायर ने कहा कि आंध्र प्रदेश की न्यायिक संस्थाओं पर सुनियोजित तरीके से हमलों को लेकर हस्तक्षेपकर्ता चिंतित है।

उन्होंने कहा कि राज्य में न्यायिक संस्थाओं और न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के प्रयास होने चाहिए।

भूषण ने कहा कि यह बातचीत दो व्यक्तियों के बीच है जबकि सिब्बल ने आरोप लगाया कि यह सोचा समझा हमला है।

पीठ ने भूषण से पूछा कि क्या वह स्वीकार करते हैं कि इस तरह की बातचीत हुयी थी। भूषण ने जवाब दिया कि इसकी लिपि में थोड़ी बहुत गलती है, लेकिन ऐसा हुआ था।

पीठ ने भूषण से कहा, ‘‘ आप सही लिपि दाखिल करें और फिर हम देखेंगे कि इस वार्ता के बारे में आप और आपका हलफनामा क्या कहता है।’’

शीर्ष अदालत ने सिब्बल से कहा कि इस मामले में अभी वह किसी भी हस्तक्षेपकर्ता को नहीं सुनेगी। न्यायमूर्ति ईश्वरैया ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि यह न्यायपालिका के खिलाफ ‘बहुत गंभीर साजिश’ की घटना है।

याचिका में उच्च न्यायालय के जांच के आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध करते हुये कहा गया है कि यह ‘अनावश्यक और गैरकानूनी ’था और न्यायमूर्ति ईश्वरैया का पक्ष सुने बगैर ही यह पारित किया गया है। इससे न्यायमूर्ति ईश्वरैया को अनावश्यक परेशानी हुयी है।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायााधीश आर वी रवीन्द्रन से इसकी जांच करने का अनुरोध किया था।

कहा जाता है कि टेलीफोन पर हुई यह वार्ता अमरावती भूमि घोटाले में भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित है।

पूर्व न्यायाधीश ने कहा है कि उच्च न्यायालय का आदेश अदालत की इमारत और परिसर में कोविड दिशानिर्देश लागू करने से संबंधित असम्बद्ध जनहित याचिका को फिर से खोलने और इसमें हस्तक्षेप करने के लिये निलंबित जिला मुंसिफ मजिस्ट्रेट (एस रामाकृष्ण) के आवेदन के आधार पर दिया गया है।

याचिका के अनुसार उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप के लिये दायर इस आवेदन पर पूर्व न्यायाधीश को नोटिस जारी किये बगैर ही इस बातचीत की जांच का आदेश दिया है।

अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा दायर इस याचिका में कहा गया है कि उच्च न्यायालय के 13 अगस्त के उस आदेश के खिलाफ यह विशेष अनुमति याचिका दायर की गयी है, जिसमें याचिकाकर्ता और आंध्र प्रदेश के निलंबित जिला मुंसिफ मजिस्ट्रेट के बीच फोन पर निजी बातचीत की जांच के आदेश दिये गये हैं।

अपील में कहा गया है कि इस बातचीत का विवरण आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय के एक पीठासीन वरिष्ठ न्यायाधीश के खिलाफ ‘गंभीर साजिश’ और इस तरह न्यायपालिका को अस्थिर करने का खुलासा करती है।

याचिका में कहा गया है कि उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ने फोन पर हुई इस कथित बातचीत में सिर्फ कदाचार के आरोपों के बारे में जानकारी होने का जिक्र किया था और इस बातचीत को साजिश बताना अनावश्यक है।

याचिका में कहा गया है कि रामकृष्ण द्वारा उपलबध कराई गयी इस कथित बातचीत की लिपि सही नहीं है और यह बातचीत के विभिन्न पहलुओं के बारे में गुमराह करती है।

इसमें कहा गया है कि इस बातचीत में आंध्र प्रदेश में पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में अनुचित तरीके से संपत्तियों के संदिग्ध सौदों के बारे में मंत्रिमंडल की उपसमिति द्वारा की जा रही जांच का जिक्र हुआ था।

उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में आंध्र प्रदेश सरकार की अपील पर एक अन्य मामले में अमरावती में भूमि के सौदों में कथित अनियमितताओं को लेकर दर्ज प्राथमिकी के बारे में खबरें प्रकाशित करने पर मीडिया पर लगाई गयी पाबंदी पर रोक लगा दी थी।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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