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दिल्ली की अदालत ने संपत्ति का झूठा मुकदमा दायर करने पर व्यक्ति पर दो लाख रु का जुर्माना लगाया

By भाषा | Updated: October 13, 2021 14:09 IST

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नयी दिल्ली, 13 अक्टूबर दिल्ली की एक अदालत ने अपने भाई के खिलाफ संपत्ति विवाद का कथित रूप से झूठा मुकदमा दायर करने के लिए एक शख्स पर दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।

अदालत ने कहा है कि अगर इस तरह के दावे दायर करके न्याय व्यवस्था को दूषित करने की इजाजत दी गई तो यह ‘बड़ी सार्वजनिक आपदा’ होगी।

अतिरिक्त वरिष्ठ दीवानी न्यायाधीश किशोर कुमार ने व्यक्ति को नोटिस जारी करके पूछा कि झूठा दावा करने के लिए उसके खिलाफ क्यों शिकायत दर्ज नहीं की जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उसने अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है और इसके कदाचार से सख्ती से निपटा जाना चाहिए।

व्यक्ति ने मुकदमा दायर करके के दावा किया था कि उसके पिता के 1989 में निधन के बाद उनके कानूनी वारिसों में मौखिक रूप से संपत्ति का बंटवारा हुआ था। दिल्ली के मोती नगर इलाके में एक संपत्ति उसकी मां के नाम पर स्थानांतरित हुई थी और यह सहमति बनी थी कि उनके निधन के बाद यह संपत्ति व्यक्ति के नाम पर हो जाएगी।

बहरहाल, उसने आरोप लगाया कि उसके भाई ने उनकी मां के निधन के बाद 2017 में संपत्ति को खाली करने से इनकार कर दिया और एक साल बाद उसे मालूम चला कि उसका भाई दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड के अधिकारियों के संग मिलकर फर्जी दस्तावेजों के जरिए संपत्ति को अपने नाम पर करवाने की कोशिश कर रहा है।

मुकदमे को खारिज करते हुए, न्यायाधीश ने कहा कि वादी ने अदालत में बिल्कुल झूठा मुकदमा दायर किया है और उसने शपथ पर यह दावा किया कि उसके पिता के निधन के बाद संपत्ति का मौखिक विभाजन हुआ और इसके मुताबिक, जिस संपत्ति पर मुकदमा किया गया है, वह उसके हिस्से में आई।

न्यायाधीश ने कहा, “ अदालत में झूठे दावे दाखिल करने का मकसद कानून के शासन पर प्रहार करना है और कोई भी अदालत ऐसे कदाचार को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती है जिसमें न्यायिक संस्थान में लोगों के विश्वास को हिलाने की प्रवृत्ति हो। अगर इस तरह के दावे दायर करके न्याय व्यवस्था को दूषित करने की इजाजत दी गई तो यह बड़ी सार्वजनिक आपदा होगी।

व्यक्ति के भाई ने मुकदमे के जवाब में कहा कि उनकी मां ने दो सितंबर 2000 को यह संपत्ति उसे बेच दी थी और 2005 में उनका निधन हो गया। उसने आरोप लगाया कि वादी ने कहानी गढ़ी है। अदालत ने मुकदमे का फैसला प्रतिवादी (उसके भाई) के हक में दिया है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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