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दिल्ली की अदालत ने जातिवादी टिप्पणियों के संबंध में डीयू के प्राचार्य के खिलाफ दायर याचिका खारिज की

By भाषा | Updated: October 29, 2021 13:32 IST

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नयी दिल्ली, 29 अक्टूबर दिल्ली की एक अदालत ने एक बर्खास्त प्रोफेसर की वह याचिका खारिज कर दी है, जिसमें उसके बारे में कथित जातिवादी टिप्पणियों को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज के प्राचार्य एवं प्रोफेसरों के खिलाफ एससी-एसटी (अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति) कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध किया गया था।

अदालत ने कहा कि यह मामला ‘‘व्यक्तिगत प्रतिशोध’’ के कारण दायर किया गया।

बर्खास्त अतिरिक्त प्रोफेसर ने आरोप लगाया था कि कॉलेज के चार प्रोफेसर और प्राचार्य ने उसकी जाति के कारण उसे जानबूझकर अपमानित एवं परेशान करके, फर्जी दस्तावेज बनाकर और झूठे रिकॉर्ड एवं सबूत पैदा करके उसे सेवा से बर्खास्त करने का षड्यंत्र रचा।

याचिकाकर्ता ने प्राचार्य एवं चार प्रोफेसर के खिलाफ एससी-एसटी (अत्याचार रोकथाम) कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज किए जाने का आग्रह किया था। उसने उसकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज नहीं करने के पर थाना प्रभारी और संबंधित थाना प्रभारी के खिलाफ कानूनी कदम नहीं उठाने के लिए पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) पर कार्रवाई करने का भी अनुरोध किया था।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एएसजे) चारू अग्रवाल ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद संपूर्ण सामग्री स्पष्ट दर्शाती है कि जिन आरोपों का जिक्र किया गया है, उन्हें बाद में सोचकर लगाया गया।

न्यायाधीश ने 26 अक्टूबर के अपने इस आदेश में दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष हुई इस मामले की सुनवाई का कोई जिक्र नहीं किए जाने को लेकर भी शिकायतकर्ता को फटकार लगाई।

एएसजे अग्रवाल ने कहा, ‘‘वह पहले की सभी कार्रवाईयों मे असफल रही, इसलिए अपना व्यक्तिगत प्रतिशोध लेने के लिए उसने मौजूदा मामला दर्ज किया और वही पुराने आरोप लगाए, जो दिल्ली उच्च न्यायालय में लगाए गए थे।’’

न्यायाधीश ने आदेश दिया, “भारतीय दंड संहिता और एससी/एसटी कानून के तहत प्रथमदृष्टया कोई अपराध नहीं बनता है। तदनुसार, संबंधित पुलिस ने शिकायतकर्ता की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज नहीं करके उचित किया। यह अदालत भी संज्ञान लेने से इनकार करती है क्योंकि शिकायतकर्ता द्वारा दायर शिकायत के संबंध में उपलब्ध कराई गई सामग्री के अनुसार कोई अपराध नहीं बनता है।’’

दिल्ली पुलिस ने नौ सितंबर को अदालत में दाखिल की गई कार्रवाई रिपोर्ट (एटीआर) में कहा था कि अधिनियम के तहत कोई अपराध नहीं बनता है।

शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि उसे अगस्त से दिसंबर 2019 तक चार महीने की अवधि के लिए तदर्थ आधार पर सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया था और इस अवधि को बाद में बढ़ा दिया गया था।

याचिका में यह दावा भी किया गया था कि 10 अगस्त, 2020 को उसे कॉलेज अधिकारियों ने सूचित किया कि अब उसकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं है, जिसके बाद वह इसका कारण जानने के लिए प्राचार्य से मिली लेकिन उसे अपमानित किया गया, धमकाया गया और उसके खिलाफ जाति आधारित टिप्पणियां की गईं।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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