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न्यायालय ने कहा ‘सभी भावनाएं’ जीवन के अधिकार के अधीन, उप्र सरकार से कांवड़ यात्रा पर पुनर्विचार करने को कहा

By भाषा | Updated: July 16, 2021 20:33 IST

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नयी दिल्ली, 16 जुलाई उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि धार्मिक सहित सभी भावनाएं जीवन के अधिकार के अधीन हैं, साथ ही न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को 19 जुलाई तक उसे यह सूचित करने के लिए कहा कि क्या वह राज्य में “सांकेतिक” कांवड़ यात्रा आयोजित करने के अपने फैसले पर फिर से विचार करेगी।

उत्तराखंड सरकार ने इस हफ्ते की शुरुआत में इस वार्षिक यात्रा को रद्द कर दिया था जिसमें हजारों शिव भक्त पैदल चलकर गंगाजल लेने जाते हैं और फिर अपने कस्बों, गांवों को लौटते हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार इसे थोड़ा हल्का करते हुए “प्रतीकात्मक” स्वरूप के रूप में आयोजित कर रही है।

न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार सर्वोपरि है और उत्तर प्रदेश सरकार बताए कि क्या वह यात्रा आयोजित करने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने को तैयार है।

पीठ ने कहा, ‘‘हमारा दृष्टिकोण है कि यह एक ऐसा मामला है जो हम सभी को चिंतित करता है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के केंद्र में है जिसे हमारे संविधान के मौलिक अधिकारों के अध्याय में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है। भारत के नागरिकों का स्वास्थ्य और जीवन का अधिकार सर्वोपरि है और धार्मिक सहित सभी अन्य भावनाएं, इस मौलिक अधिकार में निहित हैं।”

शीर्ष अदालत ने यह निर्देश तब दिया जब उत्तर प्रदेश सरकार ने पीठ को बताया कि उसने संबंधित विचार-विमर्श के बाद उचित कोविड पाबंदियों के साथ ‘प्रतीकात्मक’ कांवड़ यात्रा निकालने का फैसला किया है।

केंद्र का पक्ष रख रहे सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्य सरकारों को कोविड महामारी के मद्देनजर कांवड़ यात्रा की अनुमति नहीं देनी चाहिए और टैंकरों के जरिए गंगा जल की व्यवस्था निर्दिष्ट स्थानों पर की जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि प्राचीन परंपराओं एवं धार्मिक भावनाओं को देखते हुए राज्य सरकारों को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए ताकि श्रद्धालु पवित्र ‘गंगाजल’ लेकर पास के शिव मंजिर में चढ़ा सकें।

मेहता ने कहा कि प्राचीन परंपराओं और धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकारों को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि श्रद्धालु ‘गंगाजल’ प्राप्त कर सकें और पास के शिव मंदिरों में जल चढ़ा सकें।

उन्होंने कहा कि सरकारों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि श्रद्धालुओं के बीच ‘गंगाजल’ के वितरण का यह तरीका तथा अन्य परंपराएं कोविड संबंधी उचित व्यवहार और कोविड स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का पालन करते हुए अपनाई जाएं।

पीठ ने मेहता से कहा, “एक बात साफ है, हम उत्तर प्रदेश सरकार को कोविड के मद्देनजर कांवड़ यात्रा आयोजित करने की अनुमति नहीं दे सकते हैं।”

उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने अदालत से कहा, “यात्रा पर पूर्ण प्रतिबंध अनुचित होगा।”

अधिवक्ता ने कहा कि उन्होंने एक हलफनामा दायर किया है कि श्रद्धालुओं की कम उपस्थिति और धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्रतीकात्मक यात्रा आयोजित की जाएगी।

उन्होंने कहा कि उचित प्रतिबंध लगाए जाएंगे, टैंकरों के माध्यम से ‘गंगाजल’ उपलब्ध कराया जाएगा, कोविड जांच की जाएंगी और शारीरिक दूरी संबंधी नियम समेत अन्य एहतियात बरते जाएंगे।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि क्या प्रत्यक्ष रूप से कांवड़ यात्रा आयोजित करने पर पुनर्विचार किया जा सकता है, इस पर वैद्यनाथन ने सकारात्मक उत्तर दिया है और 19 जुलाई तक अतिरिक्त हलफनामा जमा करने के लिए समय मांगा है।

शीर्ष अदालत ने सभी हलफनामों को रिकॉर्ड में लिया और न्यायालय की चिंता पर तत्काल जवाब देने के लिए सॉलिसीटर जनरल तथा मामले में पेश अन्य वकीलों का आभार जताया। पीठ ने मामले में अगली सुनवाई के लिए 19 जुलाई, सोमवार की तारीख तय की।

उत्तराखंड सरकार की तरफ से पेश अधिवक्ता अभिषेक अत्रे ने कहा कि उन्होंने एक हलफनामा दायर किया है और कोविड के चलते यात्रा प्रतिबंधित करने का फैसला किया गया है तथा इसे अधिसूचित कर दिया गया है।

शीर्ष अदालत ने कोविड महामारी के बीच 'कांवड़ यात्रा' की अनुमति देने के उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले पर मीडिया की खबरों का 14 जुलाई को स्वत: संज्ञान लिया था और मामले पर “अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रिया को देखते हुए” राज्य के साथ-साथ केंद्र से जवाब मांगा था।

शीर्ष अदालत ने कहा था कि वह यह जानकर “थोड़ा दु:खी’’ है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने “कांवड़ यात्रा” जारी रखना चुना है जबकि उत्तराखंड ने इसके खिलाफ फैसला किया है।

योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कोविड-19 की संभावित तीसरी लहर की शुरुआत में इस तरह की घटनाओं से उत्पन्न जोखिम पर विभिन्न वर्गों द्वारा जताई गई चिंताओं के बावजूद 25 जुलाई से ‘‘यात्रा” आयोजित करने की 13 जुलाई को अनुमति दी थी।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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