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भोपाल में जारी टीके ‘कोवैक्सीन’ के क्लीनिकल परीक्षण को अविलंब बंद किया जाए : गैस संगठन

By भाषा | Updated: January 10, 2021 18:46 IST

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भोपाल, 10 जनवरी भोपाल में यूनियन कार्बाइड गैस काण्ड के पीड़ितों के लिए काम कर रहे चार संगठनों ने रविवार को केन्द्र सरकार को पत्र लिखकर भोपाल में जारी स्वदेशी टीके ‘कोवैक्सीन’ के क्लीनिकल परीक्षण को अविलंब बंद करने की मांग की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को भेजे गये पत्र में इन संगठनों ने ‘कोवैक्सीन’ के क्लीनिकल परीक्षण में भाग ले रहे लोगों की सुरक्षा और उनके हकों को नजरअंदाज करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और संस्थाओं के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई और परीक्षण के प्रतिभागियों के सेहत को पहुँची नुकसान के लिए मुआवज़े की मांग भी की है।

1984 में हुए विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड के पीड़ितों के लिए काम कर रहे इन संगठनों ने इस पत्र की प्रति मीडिया से साझा की है।

इस पत्र में भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की अध्यक्ष रशीदा बी, भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एण्ड एक्शन की रचना ढींगरा, डाव कार्बाइड के खिलाफ बच्चे की नौशीन खान और भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा के नवाब खान ने हस्ताक्षर किये हैं।

रशीदा बी ने कहा, ‘‘इस टीके को, जिसके बारे में यह मालूम नहीं है कि यह कितनी सुरक्षित है, के परीक्षण में शामिल 1700 लोगों में से 700 लोग यूनियन कार्बाइड के जहर से ग्रस्त हैं। टीका लगने के 10 दिनों के अन्दर एक गैस पीड़ित की मौत हो चुकी है और बहुत लोग अभी भी गम्भीर तकलीफें झेल रहे हैं।’’

उन्होंने कहा कि करीब 12 साल पहले भोपाल मेमोरियल अस्पताल में विदेशी दवा कम्पनियों के दवाओं के क्लीनिकल परीक्षणों में 13 गैस पीड़ितों की मौत के लिए आज तक किसी को भी सज़ा नहीं दी गयी है।

रशीदा ने कहा, ‘‘हम लोग प्रधानमन्त्री को इस उम्मीद के साथ लिख रहे हैं कि फिर से वही इतिहास दोहराया न जाय। भोपाल गैस पीड़ितों के संगठनों की ओर से उन्होंने यह माँग की कि कोवैक्सीन के परीक्षण में शामिल गैस पीड़ित मृतक के परिवार को कोरोना योद्धाओं को दिया जाने वाला 50 लाख रुपए दिए जाए।’’

भोपाल में जारी इस क्लीनिकल परीक्षण में व्याप्त अनियमितताओं को रेखांकित करते हुए रचना ढींगरा ने कहा, ‘‘इस परीक्षण में ऐसे लोगों को शामिल किया गया है जिनका स्वास्थ्य यूनियन कार्बाइड के जहर से पहले ही बिगड़ा हुआ है और उन्हें बगैर जानकारी दिए और उनके सहमति के बगैर इस परीक्षण में शामिल किया गया है।’’

उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘टीका लगवाने के बाद परीक्षण में भाग ले रहे लोगों को हुई तकलीफों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा है और कई जब अपनी तकलीफों के लिए अस्पताल पहुँचे तो उन्हें उपचार देने बजाय वापस कर दिया गया। जो लोग परीक्षण में शामिल होकर हट गए हैं या जिन्हें हटा दिया गया है, उनके सेहत की कोई निगरानी रखी नहीं जा रही है और ना ही उनका इलाज किया जा रहा है।’’

भोपाल गैस पीड़ितों के संगठनों की माँगों पर बात करते हुए शहज़ादी बी ने कहा, ‘इस परीक्षण को तुरन्त बंद करने और परीक्षण में मरने वाले गैस पीड़ित के परिवार को राहत राशि देने के साथ हम यह माँग कर रहे हैं कि इस परीक्षण की निष्पक्ष जाँच की जाए, इस हादसे के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों और संस्थाओं को दण्डित किया जाय और टीकों से जिन्हें नुकसान पहुँचा है, उन्हें मुआवज़ा दिया जाय ।’’

वहीं, नौशीन खान ने कहा, ‘‘भोपाल में जारी कोवैक्सीन परीक्षण में आपराधिक अनियमितताओं को नजरअंदाज करके सरकार आने वाले 16 तारीख को एक बड़े चिकित्सीय हादसे की आशंका को मजबूत कर रही है।’’

इन संगठनों ने रविवार को भोपाल में एक संवाददाता सम्मेलन किया और उसमें भोपाल में स्वदेशी टीके ‘कोवैक्सीन’ के क्लीनिकल परीक्षण में शामिल कुछ प्रतिभागियों को भी लाये थे। इसमें इन प्रतिभागियों में से अधिकांश ने आरोप लगाया कि उन्हें यह कह कर इसमें शामिल किया गया कि यह कोरोना का टीका है। हमें यह नहीं बताया गया कि परीक्षण किया जा रहा है।

इन प्रतिभागियों ने बताया कि इस टीके के लगने के दो-तीन दिन बाद वे परेशानी महसूस करने लगे। उन्हें, बुखार, जुकाम, दर्द, उल्टी एवं सांस लेने में दिक्कतें आईं।

मालूम हो कि भोपाल के निजी पीपुल्स मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में 12 दिसंबर को कोरोना वायरस के स्वदेशी टीके ‘कोवैक्सीन’ के क्लीनिकल परीक्षण में शामिल 42 वर्षीय दीपक मरावी की नौ दिनों बाद 21 दिसंबर को मौत हो गई। हालांकि, चिकित्सकों को संदेह है कि उसकी मौत शरीर में जहर फैलने की वजह से हुई होगी। यह टीका बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक ने एक बयान में शनिवार को कहा कि प्रारंभिक समीक्षा में पता चला है कि यह व्यक्ति की मौत कोवैक्सीन से संबंधित नहीं है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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