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कोविड-19 की ड्यूटी कर रहे चिकित्सकों को अवकाश देने पर केन्द्र करे विचार : न्यायालय

By भाषा | Updated: December 15, 2020 18:47 IST

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नयी दिल्ली, 15 दिसंबर उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केन्द्र से कहा कि पिछले सात आठ महीने से कोविड-19 की ड्यूटी में लगे चिकित्सकों को अवकाश देने पर विचार किया जाये क्योंकि लगातार काम करते रहने से उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने अस्पतालों में कोविड-19 के मरीजों के ठीक से इलाज और शवों के साथ गरिमामय व्यवहार को लेकर स्वत: की जा रही सुनवाई के दौरान केन्द्र से कहा कि वह इस बारे में विचार करे।

पीठ ने सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि चिकित्सकों को अवकाश दिये जाने के सुझाव पर विचार किया जाये।

पीठ ने मेहता से कहा, ‘‘इन चिकित्सकों को पिछले सात आठ महीने से एक भी ब्रेक नहीं दिया गया है और वे लगातार काम कर रहे हैं। आप निर्देश प्राप्त कीजिये और उन्हें कुछ ब्रेक देने के बारे में सोचिए। यह बहुत ही कष्ठप्रद होगा और इससे उनका मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित हो सकता है।’’

मेहता ने पीठ को आश्वासन दिया कि सरकार कोविड-19 ड्यूटी में लगे स्वास्थ्य कर्मियों को कुछ अवकाश देने के पीठ के सुझाव पर विचार करेगी।

शीर्ष अदालत ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि गुजरात सरकार ने मास्क नहीं पहनने पर 90 करोड़ रूपए जुर्माना लगाया लेकिन कोविड-19 में उचित आचरण के बारे में दिशा निर्देशों को लागू नहीं करा सकी।

मामले की सुनवाई शुरू होते ही पीठ ने केन्द्र के हलफनामे का जिक्र करते हुये कहा कि इसमे यह कहीं नहीं है कि किन अस्पतालों में अग्निशमन का अनापत्ति प्रमाण पत्र है और उसने 2016 की सूचना इसमें दी है।

मेहता ने कहा कि तस्वीर इन आंकड़ों जैसी सुन्दर नहीं है लेकिन गुजरात सरकार ने आग से सुरक्षा के लिये सभी जरूरी कदम उठाये हैं।

इस पर न्यायमूर्ति शाह ने कहा, ‘‘नहीं, उन्होंने नहीं किये हैं।’’ उन्होंने कहा कि हलफनामे में यह भी नहीं है कि कोविड के किन अस्पतालों में आवश्यक सुरक्षा के उपाय हैं।

पीठ ने कहा कि राजकोट के एक अस्पताल को 16 नोटिस भेजे गये लेकिन इस बारे में कुछ नहीं किया गया और गुजरात में अनेक अस्पतालों में अग्निशमन सुरक्षा से संबंधित अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं है।

पीठ ने कहा कि गुजरात में 260 निजी अस्पतालों में से 61 अस्पतालों के पास अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं है। इस पर मेहता ने कहा कि इन सभी निजी अस्पतालों में नोडल अधिकारी के रूप में अब जिम्मेदार व्यक्तियों की नियुक्ति की गयी है।

गुजरात सरकार द्वारा मास्क नहीं लगाने वालों से जुर्माने के रूप में 90 करोड़ रूपए वसूल किये जाने पर न्यायालय ने कहा कि जुर्माने के बावजूद राज्य सरकार कोविड की उचित आचरण संबंधी दिशा निर्देश लागू नहीं कर पायी है।

मेहता ने कहा कि 500 रूपए का जुर्माना लोगों को इसका उल्लंघन करने से नहीं रोक पा रहा है। इस पर पीठ ने सवाल किया कि मास्क लगाने और उचित सामाजिक दूरी बनाने के उपाय के बारे में क्या कहना है।

पीठ ने इस मामले को 18 दिसंबर के लिये सूचीबद्ध कर दिया है। पीठ ने कहा कि वह कल कोविड से संबंधित, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली उप्र सरकार की याचिका पर विचार करेगी।

न्यायालय ने नौ दिसंबर को मास्क पहनने और सामाजिक दूरी के पालन जैसे कोविड-19 के दिशा-निर्देशों पर अमल तथा देश भर के अस्पतालों एवं नर्सिंग होम में अग्नि सुरक्षा दिशानिर्देशों के क्रियान्वयन समेत कई मुद्दों पर केंद्र और राज्यों को ‘‘विस्तृत’’ जवाब देने का निर्देश दिया था।

न्यायालय ने हाल ही में गुजरात के राजकोट में एक विशेष कोविड-19 अस्पताल में आग लगने की घटना का भी संज्ञान लिया था। इस अग्निकांड में कई मरीजों की मौत हो गई थी तथा इस हादसे के कारण देशभर के अस्पतालों में अग्नि सुरक्षा संबंधी उचित उपायों की कमी का मुद्दा उठा था।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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