लड्डू की जगह ‘लाडू’, रोटी की जगह ‘रोटलो’, बड़े पापा की जगह ‘मोटो बापो’ और रुपया की जगह ‘पिया’ शामिल?, राजस्थान सरकारी विद्यालय में बदलेगा शिक्षा का अंदाज?

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 22, 2026 12:45 IST2026-03-22T12:45:07+5:302026-03-22T12:45:59+5:30

पहले चरण में नौ जिलों प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, चित्तौडगढ़़, राजसमंद, पाली, सिरोही और उदयपुर में यह सर्वेक्षण किया गया जिसमें 20,298 प्राथमिक विद्यालयों के पहली कक्षा के 2,43,532 विद्यार्थियों के शिक्षकों को शामिल किया गया।

bjp sarkar Ladu' replace Laddu, 'Rotlo' replace Roti, 'Moto Bapo' replace Bade Papa and 'Piya' replace Rupee style education change in Rajasthan government schools | लड्डू की जगह ‘लाडू’, रोटी की जगह ‘रोटलो’, बड़े पापा की जगह ‘मोटो बापो’ और रुपया की जगह ‘पिया’ शामिल?, राजस्थान सरकारी विद्यालय में बदलेगा शिक्षा का अंदाज?

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Highlightsआरएससीईआरटी ने शिक्षा में भाषायी अंतर को समझने के लिए दो चरण में बोलियों का सर्वेक्षण कराया था।सर्वेक्षण में इन जिलों में बोली जाने वाली 31 से अधिक बोलियों की पहचान की गई।वागड़ी और मेवाड़ी विद्यार्थियों द्वारा सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।

जयपुर: राजस्थान में स्थानीय भाषा को बढ़ावा देने के लिए सरकारी विद्यालयों में अब लड्डू की जगह ‘लाडू’, रोटी की जगह ‘रोटलो’, बड़े पापा की जगह ‘मोटो बापो’ और रुपया की जगह ‘पिया’ जैसे स्थानीय शब्दों को शामिल कर छात्रों के लिए पढ़ाई को अधिक रोचक और सहज बनाया जाएगा। राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (आरएससीईआरटी) की निदेशक श्वेता फगेड़िया ने बताया कि शिक्षा विभाग ने राजस्थान में बहुभाषी शिक्षा परियोजना शुरू की है जिसके तहत बच्चों को उनकी स्थानीय भाषा में पढ़ाया जाएगा। परियोजना को फिलहाल राज्य के 11 जिलों में क्रियान्वित करने की योजना है और बाद में इसे चरणबद्ध रूप से पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। निदेशक ने बताया कि आरएससीईआरटी ने शिक्षा में भाषायी अंतर को समझने के लिए दो चरण में बोलियों का सर्वेक्षण कराया था।

उन्होंने बताया कि पहले चरण में नौ जिलों प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, चित्तौडगढ़़, राजसमंद, पाली, सिरोही और उदयपुर में यह सर्वेक्षण किया गया जिसमें 20,298 प्राथमिक विद्यालयों के पहली कक्षा के 2,43,532 विद्यार्थियों के शिक्षकों को शामिल किया गया। सर्वेक्षण में इन जिलों में बोली जाने वाली 31 से अधिक बोलियों की पहचान की गई।

जिसमें सामने आया कि वागड़ी और मेवाड़ी विद्यार्थियों द्वारा सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। उन्होंने बताया कि दूसरे चरण में 24 जिलों में एक व्यापक सर्वेक्षण किया गया। इस सर्वेक्षण के लिए डेटा इन जिलों में कक्षा एक को हिंदी भाषा पढ़ाने वाले शिक्षकों ने भरा। सर्वेक्षण में इन जिलों के 250 खंड में 41,686 विद्यालयों के कक्षा एक में पढ़ने वाले 3,66,782 विद्यार्थियों को शामिल किया गया।

श्वेता ने बताया कि सर्वेक्षण का उद्देश्य विद्यालयों की सामाजिक भाषायी गतिशीलता को समझना और घर एवं विद्यालय के वातावरण के बीच भाषायी असमानताओं के कारण शिक्षा में पैदा होने वाली बाधाओं का आकलन करना था।आरएससीईआरटी की निदेशक ने बताया कि राज्य के भाषायी सर्वेक्षण के आधार पर प्रयोग के लिए डूंगरपुर और सिरोही का चयन किया गया।

क्योंकि इन जिलों में भाषायी विविधता सर्वाधिक तथा घरेलू भाषा और विद्यालय की भाषा के बीच अंतर अधिक है। यह परियोजना संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ), ‘रूम टू रीड’ और ‘लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन’ के सहयोग से संचालित की जा रही है।

अधिकारी ने बताया कि आरएससीईआरटी ने शुरुआत में बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम सिरोही जिले के आबूरोड ब्लॉक एवं डूंगरपुर जिले के बिछीवाड़ा ब्लॉक के 200 विद्यालयों में लागू किया और वहां पहले वर्ष कक्षा एक और दूसरे वर्ष कक्षा दो के विद्यार्थियों को स्थानीय भाषा में पढ़ाया गया। उन्होंने कहा कि इससे बच्चों के लिए पढ़ाई अधिक सहज हो गयी है।

सिरोही और डूंगरपुर के विद्यालयों में वागड़ी और गरासिया समुदाय की मातृभाषा के शब्दों का इस्तेमाल कर पढ़ाने से पढ़ाई में बच्चों की रुचि और समझ दोनों बढ़ी। उन्होंने बताया कि वागड़ी बोली के ‘पाणी’, ‘बापू’, ‘घरो’, ‘छोकरो’, ‘आवो’ और ‘रोटली’ जैसे शब्दों तथा गरासिया बोली के आई (मां), बापो (पिता), मितर (दोस्त) जैसे शब्दों को शिक्षण में शामिल किया गया।

अधिकारी ने बताया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से डूंगरपुर एवं सिरोही जिलों के विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति 58 प्रतिशत से बढ़कर 66 प्रतिशत हो गई तथा अक्षरों की पहचान कर सकने वाले बच्चों की संख्या छह प्रतिशत से बढ़कर 61 प्रतिशत हो गई। उन्होंने कहा, ‘‘जो विद्यार्थी एक भी शब्द नहीं पढ़ पाते थे, उनकी संख्या 96 प्रतिशत से घटकर 12 प्रतिशत रह गई।

जो विद्यार्थी एक भी शब्द नहीं लिख पाते थे, उनकी संख्या 97 प्रतिशत से घटकर 17 प्रतिशत रह गई और जो विद्यार्थी समझ-आधारित प्रश्रों के उत्तर नहीं दे पाते थे उनकी संख्या 32 प्रतिशत से घटकर 12 रह गई। इन परिणामों के बाद अब इन जिलों के समस्त विद्यालयों में वागड़ी और गरासिया भाषा के शब्दों को शामिल कर पढ़ाया जाएगा।

इसके बाद राज्य के अन्य जिलों को वहां की स्थानीय भाषा के अनुसार इस कार्यक्रम से जोड़ा जाएगा।’’ शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बताया कि इस सफलता के बाद अब राज्य में बोली जाने वाली 11 स्थानीय भाषाओं की सामग्री तैयार की गई है। इनमें कार्यपुस्तिका, कहानी पुस्तकें, चित्र चार्ट, कविता पोस्टर, स्थानीय भाषा के पहेलियां, खेल और बालगीत शामिल हैं।

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