बिहार राज्यसभा चुनावः किसके साथ रहेंगे असदुद्दीन ओवैसी के 5 विधायक?, अख्तरुल ईमान शाहीन ने कहा- समर्थन नहीं करेंगे एक सीट पर उतारेंगे प्रत्याशी
By एस पी सिन्हा | Updated: February 19, 2026 15:23 IST2026-02-19T15:23:05+5:302026-02-19T15:23:52+5:30
अख्तरुल ईमान शाहीन से जब मीडियाकर्मियों ने उनसे सवाल किया कि राज्यसभा में एआईएमआईएम किस गठबंधन को सपोर्ट करेगी?

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पटनाः राज्यसभा के खाली हो रहे सीटों के चुनाव की घोषणा चुनाव आयोग के द्वारा किए जाने के बाद बिहार में भी सियासी गोलबंदी शुरू हो गई है। बिहार की राज्यसभा में पांच सीटें खाली हो रही हैं। इन सभी सीटों पर चुनाव कराए जाने हैं। इस बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के पांच विधायक ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा सकते हैं। प्रदेश अध्यक्ष एवं विधायक अख्तरुल ईमान शाहीन ने राज्यसभा चुनाव को लेकर बड़ा बयान दिया है। विधानसभा परिसर में मीडिया से बात करते हुए अख्तरुल ईमान शाहीन ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी किसी को समर्थन देने के बजाय खुद अपना उम्मीदवार मैदान में उतारेगी। इस ऐलान के बाद बिहार के सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या ओवैसी का यह दांव विपक्ष के वोटों में सेंध लगाएगा या एनडीए के लिए राह और आसान कर देगा।
अख्तरुल ईमान शाहीन से जब मीडियाकर्मियों ने उनसे सवाल किया कि राज्यसभा में एआईएमआईएम किस गठबंधन को सपोर्ट करेगी? इस सवाल पर उन्होंने कहा कि मैं (एआईएमआईएम) समर्थन देने के लिए ही जन्म लिया हूं क्या? उन्होंने कहा कि एआईएमआईएम को कौन-कौन समर्थन करेगा उनसे जाकर पूछो। और दलों के तो राज्यसभा में सीट है, लेकिन हमारी पार्टी की एक भी सीट नहीं है।
हमारी पार्टी का उम्मीदवार भी राज्यसभा जाएगा। फिरकापरस्त सरकार के खिलाफ जो लोग लड़ना चाहते हैं, जो लोग दलितों की हित की रक्षा चाहते हैं। अख्तरुल ईमान शाहीन ने कहा कि पार्टी के प्रमुख ओवैसी जिस तरह से समाज के दबे कुचले लोगों की आवाज उठा रहे हैं। देश में कहीं भी सांप्रदायिकता का मामला हो सबसे पहले प्रहरी के तौर पर खड़े होते हैं।
उनके हाथों को मजबूत करना चाहिए और उन्हें एआईएमआईएम का साथ देना चाहिए। अख्तरुल ईमान शाहीन के इस बयान को एआईएमआईएम के राजनीतिक विस्तार की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर उन राज्यों में जहां पार्टी का आधार धीरे-धीरे बढ़ रहा है। उल्लेखनीय है कि बिहार विधानसभा में एआईएमआईएम के विधायकों की संख्या भले सीमित हो, लेकिन राज्यसभा चुनाव में हर वोट अहम होता है। यदि पार्टी अपना उम्मीदवार उतारती है, तो इससे विपक्षी दलों, खासकर राजद और सहयोगियों की रणनीति प्रभावित हो सकती है।
इससे वोटों का बंटवारा भी संभव है, जो चुनाव परिणाम पर असर डाल सकता है। दरअसल, राज्यसभा चुनाव आम तौर पर संख्या बल का खेल माना जाता है। लेकिन कई बार छोटे दलों की भूमिका निर्णायक बन जाती है। एआईएमआईएम के इस ऐलान ने साफ कर दिया है कि बिहार में इस बार चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि राजनीतिक पहचान और प्रभाव बढ़ाने की लड़ाई भी होगा।
बता दें कि बिहार की पांच सीटों पर होने वाले इस चुनाव में चार सीटों पर एनडीए की बढ़त मानी जा रही है, जबकि पांचवीं सीट पर संख्या बल, गठबंधन राजनीति और छोटे दलों की भूमिका मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना सकती है। इस चुनाव में जिन सांसदों का कार्यकाल खत्म हो रहा है, उनमें राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर, राजद के अमरेंद्र धारी सिंह व प्रेमचंद गुप्ता तथा रालोमो के उपेंद्र कुशवाहा शामिल हैं। चुनाव कार्यक्रम के अनुसार 26 फरवरी को अधिसूचना जारी होगी, पांच मार्च तक नामांकन दाखिल होंगे और 16 मार्च को मतदान होगा।
विधानसभा के मौजूदा समीकरणों को देखें तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन चार सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। भाजपा की कोई सीट खाली नहीं हो रही, लेकिन वह अतिरिक्त सीट जीतने की स्थिति में है। वहीं जदयू की दो सीटें खाली हो रही हैं, जिन्हें वह अपने संख्या बल के आधार पर सुरक्षित कर सकता है। इससे ऊपरी सदन राज्यसभा में एनडीए की ताकत और बढ़ सकती है।
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा रालोमो अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की सीट को लेकर है। चर्चा है कि लोजपा (रा) प्रमुख चिराग पासवान अपनी मां रीना पासवान को राज्यसभा भेजने के लिए अड़ सकते हैं। चूंकि चिराग पासवान की पार्टी के पास अब 19 विधायकों की ताकत है, ऐसे में एनडीए के भीतर सीट शेयरिंग का फॉर्मूला काफी अहम होगा।
यदि चिराग अपनी मांग पर कायम रहते हैं, तो उपेंद्र कुशवाहा के लिए दोबारा सदन पहुंचना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। ऐसे में सबसे दिलचस्प मुकाबला पांचवीं सीट को लेकर माना जा रहा है। बिहार विधानसभा में विपक्ष में सबसे ज्यादा विधायक राजद के पास हैं। लेकिन जीत के लिए उसे सहयोगियों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी।
कांग्रेस, वाम दलों और अन्य विपक्षी विधायकों को जोड़ने पर संख्या बढ़ती है, मगर निर्णायक भूमिका छोटे दल निभा सकते हैं। ऐसे में एआईएमआईएम के पांच विधायक विपक्ष के साथ आते हैं तो समीकरण सीधे मुकाबले में बदल सकता है। बसपा और अन्य छोटे दलों का समर्थन भी निर्णायक साबित हो सकता है, क्योंकि एक सीट जीतने के लिए कम से कम 41 मत जरूरी होंगे।
यही वजह है कि बिहार का यह राज्यसभा चुनाव सिर्फ संख्या का खेल नहीं, बल्कि रणनीति, गठबंधन और सामाजिक समीकरणों की परीक्षा माना जा रहा है। बिहार विधानसभा में मौजूदा समय में सर्वाधिक 89 विधायक भाजपा के हैं। वहीं जदयू के 85 और लोजपा (रा) के 19 हैं। इसके अतिरिक्त एनडीए के दो अन्य घटक दलों में हम के 5 और रालोमो के 4 विधायक हैं।
वहीं विपक्षी खेमे में राजद के 25, कांग्रेस के 6, वामदलों के 3 और आईआईपी के एक विधायक हैं। यानी महागठबंधन के सिर्फ 35 विधायक हैं। इनके अतिरिक्त एआईएमआईएम के 5 और बसपा के 1 विधायक किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। इसबीच राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने वाले चेहरों में इस बार बिहार से सबसे बड़ा नाम नितिन नबीन का होगा।
वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं, ऐसे में वे अब बिहार विधानसभा से विधायक पद से इस्तीफा देकर उच्च सदन में जा सकते हैं। भाजपा के 89 विधायक हैं तो उनका निर्वाचन आसानी से हो जाएगा। इसके अलावा जदयू के दो सांसदों का कार्यकाल खत्म हो रहा है। जदयू के फ़िलहाल 85 विधायक हैं तो उनके दो लोगों का निर्वाचन तय माना जा रहा है।
इसमें 75 साल के केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर और 69 वर्ष के राज्यसभा उप सभापति हरिवंश को फिर से भेजा जाएगा या नहीं इस पर फ़िलहाल पार्टी की ओर से कुछ नहीं कहा जा रहा है। इसबीच एनडीए से जुड़े सूत्रों की मानें तो बिहार विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने के बाद अब एनडीए की पहली कोशिश राज्यसभा चुनाव में राजद को झटका देने की है।
पांचवी सीट के लिए अगर महागठबंधन में क्रॉस वोटिंग कराने में एनडीए सफल रहा या फिर एआईएमआईएम की सदन से अनुपस्थिति रही तो एनडीए को पांचों सीट पर जीत मिल सकती है। माना जा रहा है कि राज्यसभा चुनाव में कुछ ऐसी ही रणनीति के साथ एनडीए उतरेगा।