क्या बिहार में भी हो गया ऑपरेशन लोटस?, नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने पर उठ रहे हैं सवाल?
By एस पी सिन्हा | Updated: March 5, 2026 20:10 IST2026-03-05T20:09:55+5:302026-03-05T20:10:50+5:30
स्लोगन लिखा गया था कि 2025 से 2030 तक नीतीश कुमार ही बिहार के मुख्यमंत्री बने रहेंगे।

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पटनाः नीतीश कुमार के बिहार का मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद उनका राज्य की राजनीति से हटने का फैसला कई सवाल खड़े कर रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब उन्होंने हाल ही में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तो फिर इतनी जल्दी पद छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला क्यों लिया? ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या बिहार में भी ऑपरेशन लोटस हो गया?
कारण कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जदयू से लेकर भाजपा और एनडीए ने “25 से 30, फिर से नीतीश” का नारा दिया था। पटना से लेकर जिला मुख्यालयों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तस्वीर के साथ पोस्टर लगाए गए थे, जिसपर यह स्लोगन लिखा गया था कि 2025 से 2030 तक नीतीश कुमार ही बिहार के मुख्यमंत्री बने रहेंगे।
हालांकि बिहार का सियासी ऊंट कब किस करवट बैठेगा, इसका अंदाजा कोई भी नहीं लगा सकता है। बिहार विधानसभा में भारी बहुमत के साथ चुनाव जीतने के बाद नीतीश कुमार लगातार 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री बनें लेकिन किसे पता था कि सिर्फ चार महीने में ही उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ेगी। लेकिन नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर राज्यसभा जा रहे हैं।
नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह उनकी सेहत को बताया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत ठीक नहीं चल रही है। इसी कारण पार्टी के भीतर भी इस बात पर चर्चा होने लगी थी कि उन्हें अब कम जिम्मेदारी वाले पद पर जाना चाहिए। सूत्रों के मुताबिक जदयू नेतृत्व को भी उनकी सेहत को देखते हुए फैसला लेना पड़ा।
कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी कई बार उनकी तबीयत को लेकर चिंता जताई गई थी। पिछले कुछ महीनों में उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों के कई वीडियो भी सामने आए थे, जिनमें उनकी सेहत को लेकर सवाल उठे थे। हालांकि पार्टी सूत्रों का कहना है कि उनके राज्यसभा जाने पर भी राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका जारी रहेगी, लेकिन बिहार में प्रशासनिक जिम्मेदारी किसी और नेता को दी जा सकती है। इससे उन्हें स्वास्थ्य के लिहाज से भी राहत मिल सकती है। नीतीश कुमार के इस फैसले के बाद बिहार में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा भी तेज हो गई है।
राजनीतिक गलियारों में मुख्यमंत्री पद के लिए कई नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं। हालांकि अभी तक इस पर आधिकारिक रूप से कुछ भी घोषित नहीं किया गया है। दूसरी ओर विपक्षी दल इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर मुख्यमंत्री को पद छोड़ना ही था, तो फिर कुछ महीने पहले ही शपथ क्यों ली गई?
विपक्ष इसे राजनीतिक रणनीति बता रहा है। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भाजपा पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि भाजपा ने नीतीश कुमार के साथ धोखा किया है और उन्हें जानबूझकर मुख्यमंत्री पद से हटाने की रणनीति बनाई गई है। हालांकि, जदयू के नेताओं का कहना है कि यह फैसला पूरी तरह परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया है।
उनका कहना है कि नीतीश कुमार का अनुभव और राजनीतिक समझ आगे भी पार्टी और देश की राजनीति में अहम भूमिका निभाएगा। फिलहाल बिहार की राजनीति में सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि नीतीश कुमार के बाद राज्य के नए मुख्यमंत्री कौन होंगे? आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और भी राजनीतिक हलचल देखने को मिल सकती है।
उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भारतीय राजनीति के उन नेताओं में हैं, जिन्होंने वैचारिक बदलावों, गठबंधनों और प्रशासनिक प्रयोगों के बीच लंबी पारी खेली है। उनका सियासी सफर छात्र राजनीति से शुरू होकर आज राज्यसभा तक पहुंचने की तैयारी में है। नीतीश कुमार ने पहली बार 1977 में हरनौत विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, हालांकि उस चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली।
इसके बाद 1985 में वे पहली बार बिहार विधानसभा के लिए हरनौत से निर्वाचित हुए। यह उनकी सक्रिय विधायी राजनीति की शुरुआत थी। लोकसभा में उनका प्रवेश 1989 में हुआ, जब वे बाढ़ संसदीय क्षेत्र से पहली बार सांसद चुने गए। इसके बाद वे 1991, 1996, 1998 और 1999 में भी बाढ़ से लोकसभा पहुंचे।
केंद्र की राजनीति में उन्होंने कृषि, रेल और सतह परिवहन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। विशेष रूप से रेल मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल को काफी चर्चा मिली। वहीं 2004 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार नालंदा संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए थे। वर्ष 2000 में पहली बार नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
वे 7 दिनों के लिए सीएम पद पर रहे। वहीं बिहार की राजनीति में निर्णायक मोड़ 2005 में आया। नवंबर 2005 में नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके बाद वे 2010, 2015, 2020 और 2025 में भी अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों के बीच मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री रहते हुए विधान परिषद के सदस्य के रूप में भी निर्वाचित हुए।
वहीं 2005 से 2025 के बीच कई मौकों पर नीतीश कुमार उलट-पुलट की राजनीति करते रहे, इसमें एनडीए के साथ ही लालू यादव की पार्टी राजद के साथ मिलकर भी नीतीश कुमार ने बिहार के सत्ता चलाई। अपने राजनीतिक जीवन में वे लोकसभा और विधानसभा दोनों सदनों के सदस्य रहे हैं,
साथ ही विधान परिषद की सदस्यता भी संभाली है। इस तरह वे तीनों विधायी सदनों का अनुभव रखने वाले विरले नेताओं में गिने जाते हैं। अब जब नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए नामांकन करने जा रहे हैं तो इसे उनके लंबे राजनीतिक सफर का एक नया अध्याय माना जा रहा है। छात्र राजनीति से लेकर मुख्यमंत्री पद और अब उच्च सदन की दहलीज तक पहुंचने की यह यात्रा बिहार की राजनीति के कई उतार-चढ़ावों की साक्षी रही है।