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बिहार: आंगनबाड़ी के नाम पर लूट का खेल, मालामाल अधिकारी और केन्द्र संचालिका

By एस पी सिन्हा | Updated: February 9, 2020 07:38 IST

बिहार में आंगनबाड़ी केन्द्रों की देखभाल के लिए बाल विकास परियोजना से जुड़े अधिकारियों कर्मियों एवं एवं सेविका-सहायिका के वेतन-मानदेय पर सरकार करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन भ्रष्टाचार व्यवस्था को निगल रहा है.

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ठळक मुद्देबिहार में आंगनबाड़ी केंद्र के नाम पर घोटाला जारी है. हालात ये हैं कि आंगनबाड़ी केन्द्रों की सेहत कागज पर बेहतर, धरातल पर बेहद खस्ता है. सरकार भले ही बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए लाखों रुपये खर्च कर रही हो, लेकिन सच्चाई यह है कि इसका लाभ गरीब व कुपोषण के शिकार बच्चों तक नही पहुंच पा रहा है.

बिहार में आंगनबाड़ी केंद्र के नाम पर घोटाला जारी है. हालात ये हैं कि आंगनबाड़ी केन्द्रों की सेहत कागज पर बेहतर, धरातल पर बेहद खस्ता है. सरकार भले ही बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए लाखों रुपये खर्च कर रही हो, लेकिन सच्चाई यह है कि इसका लाभ गरीब व कुपोषण के शिकार बच्चों तक नही पहुंच पा रहा है. आंगनबाड़ी के नाम पर लूट का खेल जारी है. इसमें ऐसा नही है कि इसकी सच्चाई ऊपर तक के अधिकारियों-सरकार तक नही है, लेकिन लूट में सभी की बराबरी की हिस्सेदारी की चर्चायें आम हैं.

बिहार में आंगनबाड़ी केन्द्रों की देखभाल के लिए बाल विकास परियोजना से जुड़े अधिकारियों कर्मियों एवं एवं सेविका-सहायिका के वेतन-मानदेय पर सरकार करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन भ्रष्टाचार व्यवस्था को निगल रहा है. इसमें क्या प्रखंड बाल विकास पदाधिकारी और क्या जिला राज्य स्तर के अधिकारी सभी अपने-अपने हिस्से का हिसाब कर सरकारी खाजने को चूना लगाने में अधिक तत्पर दिखते हैं. हालात ये हैं कि कागज पर बच्चों का नामांकन चाहे जो हो मगर अधिकतर आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चे नदारद ही रहते हैं. गर्भवती एवं धातृ महिलाओं को पौष्टिक आहार देने के नाम पर भी काफी धन खर्च हो रहा है. आंगनबाड़ी केंद्रों पर बरती जा रही गड़बड़ी का स्थानीय लोगों द्वारा विरोध भी किया जाता है, मगर नतीजा सिफर. कारण कि सरकारी स्तर पर जनता की बातों की कोई तवज्जो नही दी जाती. विडंबना यह कि अधिकतर महिला सुपरवाइजर एवं सीडीपीओ की जांच में 'ऑल इज वेल’ दिखा दिया जाता है. स्थानीय लोगों की मानें तो पोषाहार एवं टीएचआर की राशि में बंटावारा सिस्टम चलता है. 

आंगनबाड़ी केन्द्रों का हाल यह है कि पोषाहार के नाम पर बच्चों को खिचड़ी खिला दी जा रही है, उसमें भी दाल की मात्रा न के बराबर और हल्दी पानी के सहारे चावल का घोल बच्चों क्से सामने परोस दिया जाता है. राज्य के भोजपुर जिले सहार प्रखंड अंतर्गत कोरणडीहरी पंचायत एवं बरूही पंचायत के अंतर्गत पतरिहां, कुंडवा टोला, नवादा आदि कई गां वों में आमगनबाडी केन्द्रों के नाम पर लूट की खुली खेल देखने लायक है. यहां तक कि इस संबंध में लोगों ने जब इसकी जानकारी निदेशक, आईसीडीएस को दी तो उन्होंने भी जांच के नाम पर खाना पूर्ति करवाकर ममले पर पर्दा डाल दिया. सूबे के शायद हीं किसी आंगनबाड़ी केन्द्रों की स्थिती ठीक हो.

आंगनबाड़ी केंद्र संख्या 291 माई स्थान बहलखाना में चल रहा है. यह केंद्र एक छोटे से कमरे में संचालित हो रहा है. सेविका ज्योति कुमारी व सहायिका संजू कुमारी मौजूद मिलीं. रजिस्टर पर 28 बच्चे नामांकित हैं, मगर यहां 12 बच्चे मौजूद थे. पूछने पर बताया गया कि ठंड की वजह से आज बच्चे कम आए हैं. उसी तरह से चकमोअज्जम मोहल्ला स्थित केंद्र संख्या 127 का संचालन बरामदे पर हो रहा है. सेविका शकीला बानो मौजूद थीं. यहां रजिस्टर पर 27 बच्चों का नामांकन है. मगर 17 बच्चे उपस्थित थे. बच्चों के पेयजल व शौचालय की व्यवस्था बेहतर नहीं है. केंद्र संख्या 128 का संचालन महाराजी पोखर में हो रहा है. सेविका सुशीला देवी मौजूद थीं. रजिस्टर पर 27 बच्चों का नामांकन है. मगर केंद्र पर 11 बच्चे मौजूद थे। यहां भी जगह की कमी से नियमों को अनदेखी की जा रही थी. यहां पोषाहार बनाने की व्यवस्था ठीक नहीं है. जगह की कमी से जैसे-तैसे संचालन हो रहा है. यह कुछ महज उदाहरण हैं. सूबे के सभी केन्द्रों का हाल कुछ ऐसा ही है.

नियमानुसार बच्चों के लिए निर्धारित पोषाहार इस प्रकार से तय किये गये हैं, सोमवार- खिचड़ी, मंगलवार- पुलाव, बुधवार- खिचड़ी, दूध, गुरुवार- हलवा, शुक्रवार- रसियाव, अंडा और शनिवार- खिचड़ी. इसके साथ हीं हर महिने छह माह से तीन वर्ष तक के कुपोषित बच्चों को ढाई किलो चावल व सवा किलो दाल देना है. जबकि अतिकुपोषित को हर माह तीन किलो 750 ग्राम चावल व एक किलो 750 दाल देना है. उसी तरह से गर्भवती व धातृ महिला को हर महिने साढ़े तीन किलो चावल व डेढ़ किलो दाल देने का प्रावधान है. वहीं, गर्भवती व प्रसूता महिलाओं में अंडा खाने वाली को सात अंडे मिलने का प्रावधान है. अंडा नहीं खाने वाली को सोयाबड़ी मिलेगी.

उसी तरह से छह माह से तीन साल के बच्चे जो अंडा खाते हैं, उन्हें हर महीना आठ अंडे देना है. अंडा नहीं खाने वाले बच्चों को सोयाबड़ी मिलेगी. वहीं, पोषाहर पर खर्च के रूप में छह से 72 माह के बच्चे के लिए आठ रुपये प्रत्येक दिन दिये जाने का प्रावधान है. जबकि अतिकुपोषित छह से 72 माह के बच्चे के लिए 10 रुपये दिया जाना है. जबकि गर्भवती व धातृ महिलाओं के लिए नौ रुपये दिये जाने का प्रावधान है. लेकिन गांव हो या शहर कहीं पर भी इन मापदंडों को पुरा नही किया जाता है. जानकारों की अगर मानें तो सरकार अगर इस मामले की सीबीआई या किसी अन्य किसी एजेंसी से जांच करा ले तो यह करोड़ों-अरबों के घोटाले के रूप में सामने आयेगा. लेकिन इसकी चिंता किसी को नही है और लूट का खेल छूट कर धड़ल्ले से चल रहा है. 

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