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बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के खाता खोलने के निकाले जाने लगे हैं कई मायने, पक्ष-विपक्ष के बीच वार-पलटवार शुरू

By एस पी सिन्हा | Updated: October 26, 2019 06:12 IST

ओवैसी की राजनीति कट्टरता की मानी जाती है. ठीक वैसे ही जैसी दूसरी जमात में है. इस उपचुनाव में उनके उम्मीदवार को 70 हजार वोट मिले. इसके बाद उपचुनाव के परिणामों को आने के बाद पक्ष-विपक्ष के बीच वार-पलटवार, आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है.

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ठळक मुद्देबिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के खाता खोलने के निहितार्थ अब तलासे जाने लगे हैं.पिछले चुनाव से ही वह अपनी जोर आजमाइश कर रहे थे. शुरू में उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था. लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता उनके जोशीले भाषणों ने युवाओं को अपनी ओर खींचना शुरू किया. 

बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के खाता खोलने के निहितार्थ अब तलासे जाने लगे हैं. पिछले चुनाव से ही वह अपनी जोर आजमाइश कर रहे थे. शुरू में उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था. लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता उनके जोशीले भाषणों ने युवाओं को अपनी ओर खींचना शुरू किया. 

ओवैसी की राजनीति कट्टरता की मानी जाती है. ठीक वैसे ही जैसी दूसरी जमात में है. इस उपचुनाव में उनके उम्मीदवार को 70 हजार वोट मिले. इसके बाद उपचुनाव के परिणामों को आने के बाद पक्ष-विपक्ष के बीच वार-पलटवार, आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है.

वहीं, सियासी जानकारों की नजर में इसका असर सीमांचल की राजनीति पर साफ देखा जाएगा. अब इसे भाजपा बिहार में सामाजिक समरसता के लिए खतरा बता रही है तो जदयू इसे बिहार में धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए शुभ नहीं मान रही है. 

ऐसे में यह माना जा रहा है कि इसका सीधा असर जदयू और राजद के वोट बैंक पर पड़ेगा. सत्ताधारी जदयू ओवैसी की पार्टी की जीत को बिहार के लिए शुभ नहीं मान रही है तो बिहार में कोई एक सीट कांग्रेस के लिए सबसे अधिक सेफ मानी जाती थी तो वह किशनगंज की सीट थी. 

यही नहीं धर्मनिरपेक्ष राजनीति करने का दावा करने वाली कोई भी पार्टी इसे अपने लिए सबसे सुरक्षित मानती थी. लेकिन यहां के बिहार विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने सारे सियासी समीकरण ध्वस्त कर दिए और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन ने अब बिहार विधानसभा में प्रवेश पाने में सफलता हासिल कर ली है. इस चुनाव नतीजे की सबसे खास बात ये रही कि इस सीट पर राजद-कांग्रेस एक साथ थी तो भाजपा-जदयू की संयुक्त ताकत थी. बावजूद इसके अकेले एआईएमआईएम ने दोनों ही गठबंधन दलों को धराशायी कर दिया.

जदयू के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने किशनगंज में एआईएमआईएम की पार्टी की जीत पर सवाल उठाते हुए कहा, 'ओवैसी की पार्टी अतिवादी विचारों के लिए जानी जाती है, उसका जीतना धर्मनिरपेक्ष दलों की गलत राजनीति का नतीजा है और बिहार की धर्म निरपेक्ष राजनीति के लिए ये शुभ नहीं है.' 

दरअसल, भाजपा की जीत लायक उसके विरोधी वोटों का विभाजन कांग्रेस और एआईएमआईएम के बीच नहीं हो पाया. संभव है कि कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति और टिकट बंटवारे में एक परिवार को तवज्जो देना उसके लिए भारी पड गया. दिवंगत कांग्रेस सांसद के बेटे टिकट की चाह में थे. लेकिन पार्टी ने विधायक से सांसद बने मोहम्मद जावेद की माता सइदा बानो को उम्मीदवार बनाया. ऐसी हालत तब हुई जब इस साल हुए लोकसभा चुनाव में एनडीए को 40 में से 39 सीटें मिली थीं और किशनगंज की एकमात्र सीट कांग्रेस को. 

इस उपचुनाव में कांग्रेस तीसरे स्थान पर पहुंच गई. दूसरा पक्ष इससे कहीं अधिक गंभीर है. बिहार में मुसलमानों का रूझान मध्यमार्गी पार्टियों के बीच रहा है. नब्बे के दशक में कांग्रेस के जनाधार में व्यापक क्षरण और मध्यमार्गी दलों के उभार के उस दौर ने नये सामाजिक-राजनीतिक समीकरण गढ़े. 

यहां बता दें कि राजद की असली ताकत ‘माई’ (मुसलिम-यादव) समीकरण मानी जाती रही. लेकिन नीतीश कुमार के राजनीतिक दावेदारी की लंबी लड़ाई के बाद ‘माई’ समीकरण दरकना शुरू हुआ. 2005 से 2010 तक आते-आते मुसलमानों का बडा हिस्सा नीतीश कुमार के साथ जुड़ गया. 

राज्य में मुसलमानों की आबादी करीब 16 फीसदी है. 2010 में राजद को केवल 22 सीटें मिली थीं. और जदयू के साथ भाजपा को दो तिहाई से भी ज्यादा सीटें. जदयू के साथ भाजपा की उस ऐतिहासिक जीत में नये सामाजिक समीकरण की बड़ी भूमिका थी. नब्बे के पहले कांग्रेस के मूल सामाजिक आधार में मुसलमान वोट ठोस स्तंभ की तरह था. अब जबकि ओवैसी की पार्टी को एक सीट पर फतह मिली है, उससे कोई बडा उलट-फेर भले न हो, पर सीमाचंल के अंदर इसे नयी किस्म की मुसलिम राजनीति की आहट मानी जा सकती है. 

फिलहाल इस जीत व उसकी वैचारिकी का प्रभाव अब सीमांचल तक में होना माना जा रहा है. ऐसे हालात में समाज के असली मुद्दों को राजनीति के केंद्र में लाना सबसे अहम सवाल बन जाता है. वैसे जदयू नेता केसी त्यागी ने दावा किया कि इससे उनकी पार्टी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि जब ओवैसी की पार्टी लड़ रही थी तो 2015 में हमने उसे नगण्य किया था और आने वाले 2020 चुनाव में वैसा ही होगा. उन्होंने कहा कि ये कांग्रेस और राजद जैसी पार्टियों के लिए गंभीर चुनौती बनेगा.

इस बीच, केंद्रीय मंत्री व भाजपा के फॉयर ब्रांड नेता गिरिराज सिंह ने बिहार के किशनगंज से एआईएमआईएम के उम्मीदवार के जीत पर ट्वीट कर गिरिराज सिंह ने कहा है कि 'बिहार के उपचुनाव में सबसे खतरनाक परिणाम किशनगंज से उभर के आया है. ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम जिन्ना की सोच वाले हैं. ये वंदे मातरम् से नफरत करते हैं. इनसे बिहार की सामाजिक समरसता को खतरा है. 

बिहारवासियों को अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए. हालांकि कांग्रेस इसे भाजपा-ओवैसी की मिलीभगत बता रही है. पार्टी के प्रवक्ता प्रेमचंद्र मिश्र ने कहा, गिरिराज और ओवैसी दोनों में अंडरस्टैंडिंग है. दोनों ही जहरीले भाषण करते हैं. दोनों उन्मादी ध्रुवीकरण चाहते हैं. 

यहां बता दें कि किशनगंज सीट पर एआईएमआईएम के उम्मीदवार कमरुल होदा ने परिणाम में शानदार प्रदर्शन करते हुए सभी अनुमानों को खारिज कर दिया. उन्होंने यहां भाजपा की प्रत्याशी स्वीटी सिंह को मात दे दी थी. 

उल्लेखनीय है कि सीमांचल के चार जिले अररिया, कटिहार, किशनगंज और पूर्णिया से चार सांसद और करीब 30 विधायक चुन कर आते हैं. ऐसे में ओवैसी की पार्टी की इंट्री मिल जाने से इस पूरे इलाके में खास तरह की राजनीति को जगह मिल सकती है.

टॅग्स :उपचुनावअसदुद्दीन ओवैसीबिहारभारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)
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