मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की तैयारी के बीच भाजपा में RSS पृष्ठभूमि वाले कार्यकर्ताओं को भी आगे बढ़ाने की हो रही है पहल

By एस पी सिन्हा | Updated: March 8, 2026 16:42 IST2026-03-08T16:42:23+5:302026-03-08T16:42:23+5:30

इन चर्चाओं के बीच मंत्रियों एवं नेताओं की बेचैनी भी बढ़ी हुई है। इस बीच पार्टी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पृष्ठ भूमि वाले कार्यकर्ताओं को भी आगे बढ़ाने की पहल की जा रही है।

As Chief Minister Nitish Kumar prepares to enter the Rajya Sabha, the BJP is also moving to promote workers with RSS backgrounds | मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की तैयारी के बीच भाजपा में RSS पृष्ठभूमि वाले कार्यकर्ताओं को भी आगे बढ़ाने की हो रही है पहल

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की तैयारी के बीच भाजपा में RSS पृष्ठभूमि वाले कार्यकर्ताओं को भी आगे बढ़ाने की हो रही है पहल

पटना: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की तैयारियों के बीच भाजपा में मुख्यमंत्री पद को लेकर हलचल तेज हो गई है। पार्टी के भीतर कई संभावित दावेदारों की सक्रियता बढ़ने की चर्चा है। सत्ता एवं संगठन के गलियारों में यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार के पुनर्गठन की स्थिति में भाजपा कोटे के कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जा सकते हैं, जबकि कुछ को कैबिनेट से बाहर भी किया जा सकता है। इन चर्चाओं के बीच मंत्रियों एवं नेताओं की बेचैनी भी बढ़ी हुई है। इस बीच पार्टी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पृष्ठ भूमि वाले कार्यकर्ताओं को भी आगे बढ़ाने की पहल की जा रही है।

सियासी गलियारे में चर्चा है कि नई सरकार के गठन या बड़े फेरबदल की स्थिति में जातीय एवं क्षेत्रीय संतुलन को प्रमुख आधार बनाया जाएगा। साथ ही संगठन की नाराजगी, मंत्रियों के प्रदर्शन एवं रणनीति को ध्यान में रखते हुए कुछ नए चेहरों को भी मौका देने पर विचार हो सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर ही होना है। लेकिन संभावित समीकरणों को लेकर प्रदेश स्तर पर सक्रियता तेज हो गई है। पार्टी नेतृत्व इस बात पर भी नजर रखे हुए है कि संगठन के भीतर किस वर्ग या क्षेत्र की नाराजगी को संतुलित करना जरूरी है। 

ऐसे में मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में संगठन और सरकार दोनों स्तर के कुछ प्रमुख चेहरे सक्रिय माने जा रहे हैं। हालांकि नए चेहरों को जगह देने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। इनमें कुछ वर्तमान मंत्री हैं तो कुछ ऐसे नेता भी हैं जिनकी संगठन में मजबूत पकड़ मानी जाती है। हाल के दिनों में इन नेताओं की दिल्ली और पटना के बीच बढ़ी आवाजाही, कार्यकर्ताओं से संपर्क और राजनीतिक गतिविधियों में तेजी को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार प्रदेश स्तर पर चल रही सक्रियता को दावेदारी से अधिक संभावित राजनीतिक परिस्थितियों की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में सियासी गलियारों में नए समीकरणों और संभावित चेहरे को लेकर कयासों का दौर जारी है। वहीं, बिहार में जारी सियासी हलचल के बीच जिस एक नेता का नाम काफी चर्चा में है वो उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं। सम्राट चौधरी तारापुर विधानसभा क्शेत्र से विधायक हैं। उन्हें पार्टी ने विधायक दल का नेता भी बनाया है। भाजपा में सम्राट चौधरी का कद काफ़ी तेज़ी से बढ़ा है। कभी भाजपा के घोर विरोधी रहे सम्राट चौधरी ने पार्टी के कई बड़े नेताओं को पीछे छोड़ दिया है। 

सम्राट चौधरी साल 2017 में भाजपा में शामिल हुए थे। अगस्त 2022 में नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ने के करीब 6 महीने के बाद इसके बाद ही सम्राट चौधरी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बना दिए गए थे। उसके बाद से अब वह भाजपा के कोटे से बिहार सरकार में उप मुख्यमंत्री भी बन गए हैं। सम्राट चौधरी भाजपा के ऐसे नेताओं में से हैं जो आरएसएस की पृष्ठभूमि से नहीं आते हैं। वह ओबीसी समुदाय से आते हैं और कोइरी (कुशवाहा) वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। 

सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी ख़ुद समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। शकुनी चौधरी कभी नीतीश कुमार के काफी क़रीबी में से एक थे तो कभी लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद में भी रहे। शकुनी चौधरी का नाम कुशवाहा समाज के बड़े नेताओं में शुमार है और वो ख़ुद भी विधायक और सांसद रहे हैं। सम्राट चौधरी का प्रवेश सक्रिय राजनीति में 1990 में हुआ। बिहार विधान परिषद की वेबसाइट के मुताबिक़ 1995 में उन्हें एक राजनीतिक मामले में 89 दिन के लिए जेल जाना पड़ा था। शकुनी चौधरी ने साल 1999 में बिहार में राबड़ी देवी की सरकार का साथ दिया था। हालांकि वो ख़ुद उस वक़्त सांसद थे। 

शकुनी चौधरी के सहयोग की वजह से राजद की सरकार ने उनके बेटे राकेश कुमार को, जो अब सम्राट चौधरी के नाम से जाने जाते हैं, मंत्री बनाया था। उस वक़्त राकेश कुमार (सम्राट चौधरी) न तो विधानसभा के सदस्य थे और न ही विधान परिषद के। बाद में उनकी उम्र को लेकर विवाद पैदा हो गया था और उस वक्त भाजपा के दिग्गज नेता रहे सुशील कुमार मोदी ने इसकी शिकायत चुनाव आयोग तक की थी। यह अपने आप में एक अनोखा मामला था, जब राज्यपाल ने उम्र के विवाद में किसी मंत्री को उसके पद से हटाया था। उस वक़्त सम्राट चौधरी की उम्र मंत्री बनने के लिहाज से कम पाई गई थी। 

बता दें कि जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने 2025 में सम्राट चौधरी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने सम्राट चौधरी पर 1995 के तारापुर हत्याकांड में गलत उम्र का सर्टिफिकेट देकर जेल से छूटने का आरोप लगाते हुए बर्खास्त करने और गिरफ्तार करने की मांग की थी। इसके अलावा पीके ने सम्राट चौधरी का नाम शिल्पी-गौतम केस से जोड़ते हुए उनसे कुछ सवाल किए थे। दरअसल, जब बिहार में राजद की सरकार थी और राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं तब 1999 में शिल्पी जैन और गौतम सिंह की मौत ने राज्य ही नहीं पूरे देश को हिला कर रख दिया था। इस केस में राबड़ी देवी के भाई साधु यादव का नाम भी आ था। 

प्रशांत किशोर ने कहा कि सम्राट चौधरी हत्या के आरोपी हैं। वह कुशवाहा समाज के 7 लोगों की हत्या के अभियुक्त हैं। प्रशांत किशोर ने कहा कि चौधरी हत्या के अभियुक्त हैं, 44/1995 में सात लोगों की हत्या के मामले में वे अभियुक्त हैं। जिस स्कूल से उनका मैट्रिक का सर्टिफिकेट जारी हुआ था, उसमें उनके जन्म साल 1981 बताया गया है, जिससे उन्हें नाबालिग साबित कर दिया गया। अभियुक्त होने के बावजूद उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया था, जिसमें यह बताया गया कि वे नाबालिग थे। 

प्रशांत किशोर ने कहा था कि आज सम्राट चौधरी संवैधानिक पद पर बैठे हुए हैं, जबकि उन्हें जेल में होना चाहिए। वे वर्तमान में उपमुख्यमंत्री बने हुए हैं। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा था कि वह बचपन से बोरिंग रोड पर गुंडागर्दी करता था। मैंने उसे बचपन से देखा है। वह वहां लड़कियों को परेशान करता था। हालांकि सम्राट चौधरी ने सफाई देते हुए बताया कि 1997-98 में ही उन्हें कोर्ट से बरी कर दिया गया था।

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