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उत्तराखंड में जीना विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति निरस्त

By भाषा | Updated: November 15, 2021 14:49 IST

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देहरादून, 15 नवंबर उत्तराखंड में एक के बाद एक विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति में नियमों के कथित उल्लंघन के मामले सामने आ रहे हैं और पिछले सप्ताह उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एसएस जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के प्रथम कुलपति प्रोफेसर एनएस भंडारी की नियुक्ति इस आधार पर निरस्त कर दी कि वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियमों के विरूद्ध थी।

प्रो. भंडारी की नियुक्ति को अदालत में चुनौती देने वाले समाजसेवी एवं पृथक राज्य आंदोलनकारी रवींद्र जुगरान ने 'पीटीआई-भाषा' से बातचीत में दावा किया कि यूजीसी द्वारा निर्धारित अर्हता पूरी न होने के अलावा पूर्व में उत्तराखंड लोक सेवा आयोग में सदस्य रहने के कारण भी वह पद के लिए अयोग्य थे।

जुगरान ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 319 के अनुसार, संघ लोक सेवा आयोग या राज्य के लोक सेवा आयोग में सदस्य रह चुका व्यक्ति केंद्र या राज्य सरकार के अधीन किसी सेवा में नहीं आ सकता।

प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री धनसिंह रावत ने कहा कि इस मसले पर कानूनी राय ली जा रही है।

इससे पहले, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2019 में दून विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति चंद्रशेखर नौटियाल को आवश्यक योग्यता पूरी नहीं होने और उनकी नियुक्ति यूजीसी नियमों के विरूद्ध होने के आधार पर हटा दिया था।

जुगरान ने बताया कि उच्च न्यायालय में उनकी दो और जनहित याचिकाएं लंबित हैं जिनमें उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति एनके जोशी और हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति अन्नपूर्णा नौटियाल की नियुक्ति को चुनौती दी है।

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रोफेसर जोशी न केवल पद के लिए निर्धारित मानदंड पूरा नहीं करते बल्कि उनके द्वारा अपने रिज्यूमे में डाले गए आधे से ज्यादा विवरण झूठे और फर्जी हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि हेमवंती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति बनाई गयीं प्रोफेसर अन्नपूर्णा ने तो पद के लिए आवेदन ही नहीं किया था और इन्हीं आरोपों को लेकर उन्होंने उच्च न्यायालय से नियुक्तियां निरस्त करने की प्रार्थना की है।

जुगरान ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने पिछले पांच-छह साल में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रदेश का बुरा हाल कर दिया है और आयुर्वेद विश्वविद्यालय, तकनीकी विश्वविद्यालय, जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय, संस्कृत विश्वविद्यालय जैसे कई दूसरे विश्वविद्यालयों में भी लगभग यही हाल है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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